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सेवानिवृत्त नौकरशाह भी बन सकेंगे कुलपति

Haldwani Bureau हल्द्वानी ब्यूरो
Updated Sun, 27 Sep 2020 11:18 PM IST
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Retired bureaucrats will also be chancellors
अल्मोड़ा। 23 सितंबर को राज्य विधानसभा में पारित उत्तराखंड राज्य विश्वविद्यालय विधेयक-2020 में कुलपति पद के लिए योग्यता को बदल दिया गया है। विधेयक में कहा गया है कि कुलपति विवि के अध्ययन क्षेत्र में प्रतिष्ठित शिक्षाविद्, वरिष्ठ वैज्ञानिक या प्रशासक होना चाहिए। इसमें यूजीसी के प्रावधानों को परे रखते हुए राज्य सरकार में 10 वर्ष तक अपर मुख्य सचिव ग्रेड और केंद्र सरकार में सचिव पद का अनुभव रखने वाले अधिकारी को भी कुलपति पद के योग्य घोषित कर दिया गया है। नियमों में किए गए इस बदलाव पर राज्यपाल की मुहर लगते ही सेवानिवृत्त नौकरशाहों के भी कुलपति बनने का रास्ता साफ हो जाएगा।
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23 सितंबर को राज्य विधानसभा में उत्तराखंड राज्य विवि विधेयक 2020 पारित किया गया। इसमें कुलपति पद के लिए आयु 65 वर्ष से बढ़ाकर 70 वर्ष करने के साथ ही कुलपति की योग्यता को लेकर भी बदलाव किया गया है।
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विधेयक का अध्ययन करने के बाद डॉ. राजेंद्र प्रसाद विधि संस्थान कुमाऊं विवि नैनीताल के निदेशक और विधि विशेषज्ञ प्रो.एसडी शर्मा ने बताया कि यदि इस विधेयक को राज्यपाल की हरी झंडी मिल गई और यह लागू हो गया तो सेवानिवृत्त नौकरशाह भी 70 साल की आयु तक कुलपति पद पर नियुक्त हो सकते हैं।
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विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की अधिसूचना में कुलपति पद के रूप में नियुक्त किए जाने वाले व्यक्ति के पास एक विवि में कम से कम दस वर्ष के लिए आचार्य के रूप में अनुभव होना चाहिए। या वह एक प्रतिष्ठित अनुसंधान या शैक्षणिक प्रशासनिक संगठन में शैक्षणिक नेतृत्व के साक्ष्य के साथ 10 वर्षों के अनुभव के साथ ही एक विशिष्ट शिक्षाविद् होना चाहिए।
प्रो. शर्मा के मुताबिक विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने कुलपति की योग्यता में शैक्षणिक प्रशासनिक शब्द लिखा है, जिसे नए उत्तराखंड विश्वविद्यालय विधेयक में केवल प्रशासक कर दिया गया है। नए विधेयक में यह भी है कि राज्य सरकार में अपर मुख्य सचिव अथवा केंद्र सरकार में सचिव के ग्रेड पर या उच्च ग्रेड के पद पर 10 साल तक कार्य कर चुके व्यक्ति भी कुलपति पद के योग्य होंगे। प्रो. शर्मा का मानना है कि इससे छात्र के हित भी प्रभावित होने की संभावना है।
यूजीसी के पास है कुलपति की योग्यता निर्धारित करने की शक्ति : प्रो. शर्मा
अल्मोड़ा। विधि विशेषज्ञ प्रोफेसर एसडी शर्मा के मुताबिक, विवि अनुदान आयोग 1956 की धारा 26 के अंतर्गत विवि के शिक्षकों, कुलपति तथा अन्य पदों की अर्हता निर्धारित करने की शक्ति विवि अनुदान आयोग के पास है। इसलिए उत्तराखंड राज्य विवि विधेयक में कुलपति की योग्यता में बदलाव करने का निर्णय वैधानिक तौर पर सही नहीं है। इस विधेयक में पारित नियमों के तहत कुलपति की नियुक्ति होने पर वैधानिक विवाद की स्थिति आ सकती है और इसे सक्षम न्यायालय में चुनौती मिलने की संभावना रहेगी। उन्होंने बताया कि कुलपति की योग्यता विवि अनुदान आयोग के नियमों के विपरीत होने पर पूर्व में उच्च न्यायालय नैनीताल ने यज्ञभूषण शर्मा के वाद में दून विवि के कुलपति की नियुक्ति को निरस्त कर दिया था।

कुलपति की नियुक्ति में कुलाधिपति के अधिकार भी होंगे सीमित
अल्मोड़ा। प्रो.एसडी शर्मा के मुताबिक नए विधेयक में कुलाधिपति के अधिकार भी सीमित कर दिए गए हैं। अभी कुलपति की नियुक्ति राज्यपाल करते हैं लेकिन उत्तराखंड विश्वविद्यालय विधेयक-2020 में पारित नियमों के मुताबिक अब कुलपति के चयन के लिए अनुवीक्षण समिति तीन लोगों का चयन करके राज्य सरकार को भेजेगी और सरकार इन व्यक्तियों के नामों को पुनर्विचार के लिए वापस भी भेज सकेगी। इसके बाद इन नामों को राज्य सरकार कुलाधिपति के पास भेजेगी, जबकि वर्तमान में तीन नामों का पैनल कुलाधिपति (राज्यपाल) के पास भेजा जाता है और कुलाधिपति ही उनमें से एक को कुलपति नियुक्त करता है।
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