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Almora: 51 साल बाद कोठरी की कैद से छूटेंगी कत्यूरों की कलाकृतियां, संग्रहालय में रखा जाएगा; बनाया जाएगा कक्ष

Tue, 22 Jul 2025 01:18 PM IST
हीरा मेहरा अमर उजाला नेटवर्क, अल्मोड़ा
अमर उजाला नेटवर्क, अल्मोड़ा Published by: हीरा मेहरा Updated Tue, 22 Jul 2025 01:18 PM IST
सार

कुमाऊं की स्थापत्य और वास्तुकला में कत्यूरी शासनकाल में काफी प्रगति हुई। इस दौरान कई मंदिर, मूर्तियां और उत्कृष्ट शिल्प वाले भवन बनाए गए। बैजनाथ मंदिर समूह परिसर में कत्यूरीकाल की 128 दुर्लभ मूर्तियां हैं। 

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Rare idols in Baijnath temple will soon be kept in a museum
Baijnath temple - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

कभी सिक्किम से लेकर काबुल तक लोहा मनवाने वाले कत्यूरी राजाओं की विरासत पिछले 51 साल से कोठरी में कैद है। इस राजवंश की राजधानी रहे बैजनाथ के ऐतिहासिक मंदिर समूह की 128 दुर्लभ मूर्तियों का वनवास खत्म होने वाला है। एक संग्रहालय बनाकर इनको देश-दुनिया के सैलानियों और आम लोगों के देखने के लिए उपलब्ध कराया जाएगा।

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कुमाऊं की स्थापत्य और वास्तुकला में कत्यूरी शासनकाल में काफी प्रगति हुई। इस दौरान कई मंदिर, मूर्तियां और उत्कृष्ट शिल्प वाले भवन बनाए गए। ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार उत्तराखंड के अधिकतर प्राचीन मंदिर इस राजवंश के संरक्षण में अस्तित्व में आए। जागेश्वर धाम में लकुलेश, महिषासुरमर्दिनी, नवदुर्गा और नटराज मंदिर कत्यूरी राजाओं द्वारा निर्मित किए गए थे। बैजनाथ के मंदिर समूह, कटारमल सूर्य मंदिर, जोशीमठ में वासुदेव मंदिर, बदरीनाथ मार्ग पर कई आश्रय और छोटे देवालय विरासत के रूप में आज भी मौजूद हैं।

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बागेश्वर जिले की गरुड़ तहसील में स्थित बैजनाथ मंदिर समूह परिसर में कत्यूरीकाल की 128 दुर्लभ मूर्तियां हैं। केंद्रीय पुरातत्व विभाग ने 1974 तक इन्हें मंदिर परिसर में रखा था। उस साल मंदिर परिसर से मूर्तियों की चोरी का प्रयास हुआ। सुरक्षा की दृष्टि से इसे गंभीर खतरा माना गया। तब पुरातत्व विभाग ने इन अमूल्य कलाकृतियों को कत्यूरी शासनकाल में बनी ऐतिहासिक बंद कोठरी में रखवा दिया और इनका वनवास शुरू हो गया।

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अब मंदिर परिसर में संग्रहालय का निर्माण कार्य शुरू हो गया है। 30 लाख रुपये की लागत से बन रहे कक्ष में कलाकृतियों को सुरक्षित रखने के लिए सभी आधुनिक सुविधाएं मुहैया कराने का प्रस्ताव है। 

मध्यकाल की दुर्लभ विरासत
मध्यकाल में कत्यूरी राजवंश ने उत्तराखंड (कुमाऊं और गढ़वाल) और पश्चिमी नेपाल के कुछ हिस्सों में 7वीं से 12वीं शताब्दी तक शासन किया था। उसने समूचे क्षेत्र में स्थापत्य और सांस्कृतिक छाप छोड़ी। कत्यूरों ने अलकनंदा घाटी में जोशीमठ से शासन चलाया और बाद में उन्होंने अपनी राजधानी बैजनाथ स्थानांतरित कर दी। 12वीं शताब्दी में एक वक्त ऐसा भी आया जब कुमाऊं से संचालित यह साम्राज्य पूर्वोत्तर में सिक्किम से लेकर अफगानिस्तान के काबुल तक फैला था। संवाद

कुमाऊं के मूल निवासी माने जाते हैं कत्यूरी
कत्यूरी उत्तराखंड का सबसे पुराना ज्ञात शासक राजवंश था। इतिहासकार और लेखक एडविन टी. एटकिंसन ने अपनी पुस्तक द हिमालयन गजेटियर के पहले खंड में कत्यूरों के कुमाऊं का मूल निवासी होने का दावा किया है और उनकी जड़ें गोमती नदी के तट पर करवीरपुर के खंडहर शहर में खोजी हैं। माना जाता है कि उस दौर में कुमाऊं का नाम कूर्मांचल था।

लंबे समय से कक्ष के निर्माण की मांग की जा रही थी। मूर्ति कक्ष का कार्य शुरू हो गया है। जल्द ही संग्रहालय का निर्माण कार्य पूरा कर मंदिर परिसर की कोठरी में बंद मूर्तियों को यहां रखवाया जाएगा। - नीरज मैठानी, पुरातत्व अधिकारी

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