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Almora News: निरंतर कमजोर हो रही हैं उत्तराखंड में सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाएं
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अल्मोड़ा। जन स्वास्थ्य संघर्ष मोर्चा की ओर से राजकीय संग्रहालय में रविवार को स्व. मंजू तिवारी की 12वीं पुण्य तिथि मनाई गई। इस दौरान जन स्वास्थ्य विषय पर हुए जनसंवाद में वक्ताओं ने कहा कि मंजू की मृत्यु कोई प्राकृतिक अथवा नियतिजन्य घटना नहीं थी, बल्कि यह त्रुटिपूर्ण चिकित्सा उपचार का परिणाम थी, जो वर्तमान स्वास्थ्य व्यवस्था की गंभीर खामियों को उजागर करती है।
उन्होंने कहा कि चिकित्सकों के बाहर से दवाइयां लिखने की प्रथा पर पूर्ण रोक लगाई जाए। सरकारी अस्पतालों को निजीकरण से बचाए जाने की मांग की। सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं पूर्णतः निशुल्क, गुणवत्तापूर्ण और सर्वसुलभ होनी चाहिए। उन्होंने स्वास्थ्य सेवाओं के बढ़ते व्यवसायीकरण और व्यापारीकरण को जनविरोधी बताते हुए इसे समाप्त करने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड में सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाएं निरंतर कमजोर होती जा रही हैं, जिसके कारण राज्य के कई नागरिक बेहतर उपचार की तलाश में मैदानी क्षेत्रों की ओर पलायन करने को मजबूर हैं। आयुष्मान भारत योजना की आड़ में निजी चिकित्सालयों में मरीजों का आर्थिक शोषण बढ़ गया है। स्वास्थ्य सेवाओं के साथ-साथ उच्च शिक्षा भी आम जनता की पहुंच से निरंतर दूर होते जा रही है। उन्होंने कहा कि चिकित्सा शिक्षा को सरकारी क्षेत्र में निशुल्क किया जाए। उत्तराखंड में कार्यरत चिकित्सकों के लिए एक निश्चित अवधि तक सरकारी सेवा अनिवार्य की जानी चाहिए। स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली के कारण आज भी ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में प्रसूता महिलाओं और गंभीर रूप से बीमार रोगियों की समय पर उपचार न मिलने से असमय मृत्यु हो जाती है।
मोर्चा समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर जन स्वास्थ्य को मौलिक अधिकार के रूप में स्थापित करने के लिए संघर्ष जारी रखेगा। संचालन विनोद तिवारी ने किया। वहां मोर्चा के संयोजक और उपपा के अध्यक्ष पीसी तिवारी, उक्रांद जिलाध्यक्ष दिनेश जोशी, आनंदी वर्मा, शिवराज बनौला, विनय किरौला, भूपेंद्र बल्दिया, जीवन चंद्र आदि मौजूद रहे।
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उन्होंने कहा कि चिकित्सकों के बाहर से दवाइयां लिखने की प्रथा पर पूर्ण रोक लगाई जाए। सरकारी अस्पतालों को निजीकरण से बचाए जाने की मांग की। सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं पूर्णतः निशुल्क, गुणवत्तापूर्ण और सर्वसुलभ होनी चाहिए। उन्होंने स्वास्थ्य सेवाओं के बढ़ते व्यवसायीकरण और व्यापारीकरण को जनविरोधी बताते हुए इसे समाप्त करने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड में सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाएं निरंतर कमजोर होती जा रही हैं, जिसके कारण राज्य के कई नागरिक बेहतर उपचार की तलाश में मैदानी क्षेत्रों की ओर पलायन करने को मजबूर हैं। आयुष्मान भारत योजना की आड़ में निजी चिकित्सालयों में मरीजों का आर्थिक शोषण बढ़ गया है। स्वास्थ्य सेवाओं के साथ-साथ उच्च शिक्षा भी आम जनता की पहुंच से निरंतर दूर होते जा रही है। उन्होंने कहा कि चिकित्सा शिक्षा को सरकारी क्षेत्र में निशुल्क किया जाए। उत्तराखंड में कार्यरत चिकित्सकों के लिए एक निश्चित अवधि तक सरकारी सेवा अनिवार्य की जानी चाहिए। स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली के कारण आज भी ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में प्रसूता महिलाओं और गंभीर रूप से बीमार रोगियों की समय पर उपचार न मिलने से असमय मृत्यु हो जाती है।
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मोर्चा समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर जन स्वास्थ्य को मौलिक अधिकार के रूप में स्थापित करने के लिए संघर्ष जारी रखेगा। संचालन विनोद तिवारी ने किया। वहां मोर्चा के संयोजक और उपपा के अध्यक्ष पीसी तिवारी, उक्रांद जिलाध्यक्ष दिनेश जोशी, आनंदी वर्मा, शिवराज बनौला, विनय किरौला, भूपेंद्र बल्दिया, जीवन चंद्र आदि मौजूद रहे।
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