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प्रेम का उद्गम स्थान है मां
अमर उजाला ब्यूरो अल्मोड़ा।
Updated Fri, 27 Apr 2018 10:37 PM IST
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बीएचयू में व्याख्यान देते कथावाचक मुरारी बापू।
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श्री कल्याणिका हिमालय देवस्थानम कनरा डोल आश्रम में सातवें दिन श्री राम कथा सुनाते हुए प्रसिद्ध रामकथा वाचक संत मुरारी बापू ने कहा कि प्रेम शब्द को बदनाम कर दिया है। प्रेम करना चाहिए यह सहज है। प्रेम सभी रोगों की औषधि भी है और समाधान भी है। प्रेम का उद्गम स्थान माता है। सबसे पहले प्यार माता से ही प्रकट होता है। दूसरा पड़ाव महात्मा है। तीसरा पड़ाव प्रेम का परमात्मा से मिलता है।
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उन्होंने कहा कि रामचरित मानस के बालकांड में पार्वती के रूप में श्री के दर्शन होते हैं। अयोध्या कांड में राज लक्ष्मी के रुप मे श्री, अन्य कांडों में महालक्ष्मी अनुसुईया के रुप में उपलब्ध हैं। बालक भूल करे तो पिता उसे सजा देता है, मां शिक्षा देती है। एक सूत्र में कहा जाए तो माता माली है। पिता मालिक का काम करता है। स्कंधकांड भी श्री है। मानस श्री के सातों सोपानों में श्री के दर्शन होते हैं।
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उन्होंने कहा कि पंच तत्व यानि पृथ्वी की श्री गंध है। पृथ्वी की श्री धैर्य, क्षमा, सहन करना है। पृथ्वी का ऐश्वर्य भी धैर्य है। अग्नि की श्री तेज है। आकाश की श्री असंगता है। जल की श्री मधुरता, शीतलता, स्वच्छता है। इस मौके पर मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री बाबू लाल गौर, विधायक और पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल, गणेश जोशी आदि थे।
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किसी काम को करने के लिए स्वाध्याय और चिंतन जरूरी
श्री कल्याणिका हिमालय देवस्थानम कनरा डोल आश्रम में संत सम्मेलन में संतों ने कहा कि भारतीय संत अपने लिए नहीं बल्कि देश और समाज के लिए जीते हैं। जीवन में सबसे महत्वपूर्ण संस्कृत और संस्कार हैं। बिना संस्कृत और संस्कार के जीवन व्यर्थ हो जाता है। फौज में भर्ती होने पर सबसे पहले ट्रेनिंग दी जाती है संस्कार सिखाए जाते हैं तब जाकर उन्हें हथियार दिए जाते हैं। किसी भी काम को करने के लिए स्वाध्याय और चिंतन बहुत जरूरी है।
उन्होंने कहा कि बिना जाने और पूछे तप करना ठीक नही है। पैैदा होने में केवल शरीर ही पैदा नहीं होता बल्कि माता पिता के विचार, संस्कृति, आकृति पैदा होती है। पहला पायदान मजबूत होगा तो आगे सब कुछ ठीक होता जाएगा। संस्कार का असर मन और बुद्धि पर रहेगा तो जीवन सफल हो जाएगा।
शरीर और इसे चलाने वाले आत्मा सभी के अंदर है। जहां-जहां मन लगाओं वैसे ही विचार आएंगे। आहार और संस्कार को शुद्ध करो। संतों ने कहा कि बाबा कल्याणदास जी संत समाज के मुकुट हैं। राष्ट्र को युवा संतों की भी जरूरत है ताकि वह दुनिया और समाज को सही राह दिखा सकें। सम्मेलन में इलाहाबाद, हरिद्वार, राजस्थान, छतीसगढ़, मथुरा, वृदावन, अयोध्या, काशी, बनारस, लखनऊ समेत देश के विभिन्न हिस्सों से संत पहुंचे हुए हैं।