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Almora News: चंपावत जिले के फोर्ती गांव में कीटों पर आश्रित परजीवी ततैया की हुई खोज

Haldwani Bureau हल्द्वानी ब्यूरो
Updated Sun, 07 Jun 2026 11:16 PM IST
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Insect-dependent parasitic wasps discovered in Forti village, Champawat district
अल्मोड़ा। हिमालय की दुर्गम वादियों और घने जंगलों में आज भी जैव विविधता का भंडार छिपा है। अब तक विज्ञान भी हिमालय के कई रहस्यों से अनजान है। सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय के शोधार्थियों ने चंपावत जिले में हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र का अध्ययन कर परजीवी ततैया की नई प्रजाति खोजी है। शोधार्थियों ने इस प्रजाति को नियानास्टेटस इंडिगोफेरम नाम दिया है। इस प्रजाति का अब तक कोई वैज्ञानिक रिकॉर्ड मौजूद नहीं है। यह खोज हिमालय में छिपे अनगिनत जीव-जंतुओं और पारिस्थितिक रहस्यों को जानने का ठोस माध्यम बन सकती हैं।
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एसएसजे विश्वविद्यालय के जंतु विज्ञान विभाग के शोधार्थियों ने चंपावत जिले के लोहाघाट के फोर्ती गांव मे हिमालयी वनस्पतियाें पर शोध किया। शोधार्थियों ने यहां औषधीय पौंधे इंडिगोफेरा हेटेरैंथा पर बनने वाली गांठों (गॉल) पर अध्ययन किया। पाया कि इन गांठों में रहने वाले सूक्ष्म गॉल मिज कीटों पर छोटी परजीवी ततैया आश्रित है। वर्गिकी और सूक्ष्म संरचनात्मक अध्ययन के बाद यह स्पष्ट हुआ कि यह ततैया की एक नई प्रजाति है। शोधार्थियों ने बताया कि यह नई प्रजाति चैल्सिडोइडिया परजीवी ततैयों के परिवार से संबंध रखती है। चैल्सिडोइडिया समूह के परजीवी ततैयां प्रकृति में हानिकारक कीटों की संख्या को नियंत्रित करने में कारगर हैं। खोजी गई नई प्रजाति नियानास्टेटस कुल से संबंधित है। पूरे विश्व में अब तक इस प्रजाति की केवल 47 प्रजातियां ही ज्ञात हैं। वर्गिकी अध्ययन के बाद स्पष्ट हुआ कि यह ततैया अब तक दुनिया के लिए रहस्य बनी हुई थी। शोध में पाया कि इंडिगोफेरा हेटेरैंथा, उस पर गांठ बनाने वाला गॉल मिज कीट और उस कीट पर निर्भर नई परजीवी ततैया तीनों एक दूसरे से गहराई से जुड़े हैं। शोधार्थियों के मुताबिक ये परजीवी ततैया हानिकारक कीटों की संख्या को प्राकृतिक रूप से नियंत्रित करने में सहायक हो सकती हैं। भविष्य में इस प्रकार के परजीवी कीटों का उपयोग पर्यावरण अनुकूल जैविक कीट नियंत्रण के लिए हो सकता है।
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ततैया के जीवनचक्र पर हुआ गहन अध्ययन

- शोधार्थियों ने प्रयोगशाला में गॉल का पालन-पोषण कर ततैया की संरचना उसके जीवनचक्र के साथ ही अन्य प्रजातियों से इसकी भिन्नताओं का सूक्ष्म अध्ययन किया। शोध मेें औषधीय पौधों, कीटों और परजीवी जीव के बीच मौजूद जटिल पारिस्थितिक संबंधों की पहचान की गई।
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हिमालय की जैव विविधता वैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण



- शोधार्थियों के मुताबिक हिमालयी क्षेत्र में अभी भी अनेक सूक्ष्म जीव और कीट प्रजातियां मौजूद है। यह शोध इस बात का प्रमाण है कि उत्तराखंड की समृद्ध जैव विविधता न केवल वैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि भविष्य में कृषि, वन संरक्षण और जैव विविधता प्रबंधन के लिए भी नई उम्मीद बन सकती है। यह खोज हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र में छिपी अनदेखी प्रजातियों और उनके पारिस्थितिक महत्व को समझने में सहायक साबित हो सकती है।

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रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भरता होगी कम



- हिमालयी क्षेत्र में नई सूक्ष्म जीव और कीट प्रजातियों की खोज से रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भरता कम होगी। यह खोज प्राकृतिक जैव नियंत्रण करने और कृषि को अधिक सुरक्षित और पर्यावरण-अनुकूल बनाने अहम भूमिका निभा सकती है।



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- यह शोध अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिका इंटरनेशनल जर्नल ऑफ ट्रॉपिकल इंसेक्ट साइंस में प्रकाशित हो चुका है। इस उपलब्धि ने हिमालयी जैव विविधता पर एसएसजे विश्वविद्यालय के शोध को वैश्विक पहचान दिलाई है। जो किसी उपलिब्ध से कम नहीं है।



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कोट



- नई प्रजाति की खोज उत्तराखंड की समृद्ध जैव विविधता का वैज्ञानिक प्रमाण है। परजीवी ततैया की यह प्रजाति हानिकारक कीटों की संख्या को प्राकृतिक रूप से नियंत्रित करने में सहायक हो सकती हैं। वर्तमान में कई विकसित देशों में परजीवी कीटों का प्रयोग हानिकारक कीट को नियंत्रण करने में उपयोग किया जा रहा है


- डॉ. संदीप कुमार मुख्य अन्वेषक, जंतु विज्ञान विभाग, एसएसजे विवि अल्मोड़ा
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- हिमालय की जैव विविधता में अभी भी कई प्रकार के अनजाने जीव छिपे हुए हैं। यह शोध भविष्य में जैव विविधता संरक्षण और पर्यावरण-अनुकूल कीट नियंत्रण की नई संभावनाओं को मजबूत करेगा

- सुमन उपाध्याय, शोधार्थी जंतु विज्ञान विभाग एसएसजे विवि अल्मोड़ा


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फोटो-06एएलएम03पी- औषधीय पौधे इंडिगोफेरा हेटेरैंथा पर गॉल मिज मादा कीट के अंड़ा देने से बनी गांठे। संवाद



फोटो-06एएलएम04पी- गॉल के अंदर मौजूद गॉल मिज का लार्वा। संवाद

फोटो-06एएलएम05पी- गाॅल के अंदर लार्वा से प्यूपा बना परजीवी ततैया। संवाद
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