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सरकारी खाद खा गई रमाड़ी के रसीले संतरे
गणेश उपाध्याय/अमर उजाला ब्यूरो, बागेश्वर
Updated Wed, 18 Mar 2015 11:29 PM IST
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कपकोट ब्लाक मुख्यालय से करीब 40 किमी दूर तेजम मार्ग से सटा गांव है रमाड़ी। पांच साल पूर्व तक यह गांव मीठे और रसीले संतरों के लिए जाना जाता था। 200-250 ग्राम वजनी इन संतरों की डिमांड दिल्ली तक थी। लेकिन अब हालात एकदम उलट हैं। सैकड़ों पेड़ सूख चुके हैं, जो बचे हैं, उनमें संतरों का साइज घट गया है, मिठास भी पहले जैसी नहीं रही। उद्यान विभाग इसका कारण नहीं खोज पाया, लेकिन ग्रामीणों का तर्क है कि पांच साल पूर्व एनपीके खाद डालने से यह स्थिति पैदा हुई।
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विषम भौगोलिक स्थिति वाले रमाड़ी में डेढ़ सौ से भी अधिक संतरा उत्पादक हैं। काश्तकार संतरा बेचने के लिए शामा, बागेश्वर, थल, नाचनी, पिथौरागढ़ और दिल्ली तक जाते थे। उद्यान विभाग भी बाजार हस्तक्षेप योजना के तहत अन्य एजेंसियों से संतरे खरीदवाता था। हर साल ढाई हजार क्विंटल उत्पादन होता था। अब बमुश्किल 20 क्विंटल उत्पादन हो पाता है।
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ग्रामीण बताते हैं कि पांच साल से उद्यान विभाग ने एनपीके खाद मुहैया करा रहा है, तभी से पेड़ लगातार सूख रहे हैं। उन्हें बचाने की हर कोशिश नाकाम साबित हो रही है और इसका कारण भी नहीं पता चल रहा। जिस काश्तकार के पास डेढ़ से ढाई सौ पेड़ थे उसके पास अब 40 से 65 पेड़ ही रह गए हैं। बचे पेड़ों पर निकलने वाले फलों का साइज और मिठास भी कम हो गई है। यही वजह है कि अब यहां के काश्तकारों को बाजार में न खास तवज्जो मिलती है और न दाम। जिससे उनके समक्ष आर्थिक संकट गहराने लगा है।
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हार्टीकल्चर मिशन के तहत होगा जीर्णोद्धार : डीएचओ
जिला उद्यान अधिकारी डा. नरेंद्र कुमार का कहना है कि रासायनिक खाद डालने के बाद सिंचाई की जरूरत पड़ती है। गांव में पानी की भारी कमी है। सिंचाई नहीं होने से जो पेड़ सूख चुके हैं उनका अब कोई इलाज नहीं हैं। जिनके सूखने की संभावना है, उनका सूक्ष्म तत्व, वर्मीकंपोस्ट और रोगनाशक दवाइयों से जीर्णोद्धार संभव है। हार्टीकल्चर मिशन के तहत पहले चरण में 10 हेक्टेयर क्षेत्र में 30 काश्तकारों को बरसात में 2500 पौधे दिए जाएंगे। प्रत्येक चार काश्तकारों को 500 लीटर की एक पानी की टंकी भी उपलब्ध कराई जाएगी। पेड़ोें की कटाई-छंटाई के लिए पैसा दिया जाएगा।