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Almora News: पारंपरिक ऐपण पर चढ़ा आधुनिकता का रंग

Fri, 10 Nov 2023 11:52 PM IST
हल्द्वानी ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, अल्मोड़ा
संवाद न्यूज एजेंसी, अल्मोड़ा Updated Fri, 10 Nov 2023 11:52 PM IST
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Cultural programme orgnised in district.
अल्मोड़ा। उत्तराखंड में शुभ मुहूर्त और त्योहारों पर पारंपरिक ऐपण कला विशेष पहचान रखती है। लेकिन बदलते दौर के साथ इस पारंपरिक कला पर भी आधुनिकता का रंग चढ़ने लगा है। चावल के विस्वार से तैयार किए जाने वाले पारंपरिक ऐपण धीरे-धीरे गायब होने लगे हैं और इनकी जगह रेडीमेड ऐपण ने ली है, जिसके प्रति लोगों का भी रुझान बढ़ रहा है। ऐसे में गौरवशाली परंपरा का प्रतीक ऐपण कला का अस्तित्व खतरे में है, इससे कला और संस्कृति प्रेमियों की चिंता भी बढ़ने लगी है।
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दिवाली पर हर घर की दहलीज और आंगन ऐपण से सजाए जाते हैं। उत्तराखंड के गांवों में चावल के आटे के विस्वार से ऐपण बनाने की परंपरा समृद्ध रही है जो पारंपरिक कला का प्रतीक माना जाता है। आम तौर पर महिलाएं शुभ मुहूर्त और त्योहारों पर चावल को पीसकर इसके आटे से ऐपण बनाती थीं। अब यह परंपरा धीरे-धीर विलुप्त हो रही है और इस पर आधुनिकता हावी होने लगी है। आधुनिक दौर में बाजार में रेडीमेड ऐपण स्टीकर के रूप में आसानी से उपलब्ध हैं। अब यही ऐपण लगभग हर घर की दहलीज और आंगन में नजर आ रहे हैं और पारंपरिक ऐपण अपनी पहचान खोने लगे हैं। हालांकि कई महिलाएं अब भी पारंपरिक तरीके से ऐपण बनाकर इस परंपरा को सहेजे हैं, लेकिन ऐसे कला प्रेमियों की संख्या भी सिमट रही है। संवाद
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पांच से 300 रुपये कीमत में उपलब्ध हैं रेडिमेड ऐपण
अल्मोड़ा। अल्मोड़ा के बाजारों में रेडीमेड ऐपण की भरमार है। इनकी कीमत पांच से 300 रुपये तक हैं। लक्ष्मी के पैर और चौकी आकर्षक कलाकारी में उपलब्ध हैं, इसकी खरीदारी के लिए लोगों की भीड़ उमड़ रही है ।ं
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विस्वार की जगह ले पी पेंट ने



अल्मोड़ा। चावल के आटे के घोल और गेरू से पारंपरिक ऐपण बनाए जाते हैं। लेकिन अब इस कला पर पेंट का प्रचलन बढ़ गया है। चावल के आटे की जगह अब पेंट से ऐपण बनाए जा रहे हैं।




बोलीं महिलाएं

हाथ से ऐपण बनाने में काफी समय लगता है। घरेलू और अन्य कार्यों की वजह से इसे बनाने के लिए समय नहीं मिल पाता है और रेडीमेड ऐपण खरीदना मजबूरी बन गया है।



रश्मि जोशी, धारानौला।



रेडीमेड ऐपण सस्ते होते हैं। हाथ से ऐपण बनाने में पूरा दिन लगता है। यदि मकान दो मंजिला हो तो कम से कम तीन चार दिन चाहिए। समय की कमी के चलते रेडीमेड ऐपण का प्रचलन बढ़ा है।



गीता डालाकोटी, चीनाखान।




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