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माधवानंद जोशी जी की निराली बगिया
Almora
Updated Fri, 20 Jul 2012 12:00 PM IST
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अल्मोड़ा। एक तरफ तमाम फलों की दर्जनों किस्में, बेमौसमी सब्जियां तो वहीं पर मछली पालन का तालाब भी। साथ ही बकरियां, गाय, भैंस, खरगोश भी चर रहे हैं। बरसाती पौधशाला में जंगली पेड़ों की तमाम किस्म की पौध है तो चाय बागान की महक भी यहां महसूस की जा सकती है। मशरूम उत्पादन भी इस उद्यान का एक हिस्सा है। उद्यान के क्षेत्र में काम करने वालों के लिए तो यह जगह जैसे शोध करने के लिए बिल्कुल ठीक है। यह है सल्ला रौतेला में माधवानंद जोशी जी की अनोखी बगिया।
जन्म के दो वर्ष बाद पिता का साया सिर से हटने के बाद मां ने मजदूरी कर जिंदगी बसर की तो माधवानंद तब पढ़ाई का ककहरा नहीं सीख सके। बढ़े हुए तो खेतों में काम किया और फिर उसमें ऐसे रम गए कि उनका सल्ला रौतेला में बनाया उद्यान आज पूरी कहानी बयां करता है। 1980 में राष्ट्रीय कार्यक्रमों से जुड़े के लिए उन्होंने 2500 रुपये का कर्ज लेकर फलदार वृक्ष लगाना शुरू किया। 1985 में मध्य हिमालय संस्था खुलगाड़ के साथ पर्यावरण कार्यों से जुड़े जिसका संचालन प्रसिद्ध वैज्ञानिक शंकर लाल साह कर रहे थे जिनके संपर्क में वह विभागों से जुड़े। उधर, सल्ला रौतेला में उनकी बगिया लगातार महक रही थी।
बगिया में ककड़िया, गोला, ओलंपियर, मरचिया नाशपाती, रट डेलीसस, गोल्डन डेलीसस, ग्रीन डेलीसस और अर्ली सनोरी की सेब की किस्में, जामुन, नीबू, नारंगी, माल्टा, किन्नू, कीवी के पेड़। अशाड़िया, दोनापरी, रैड जून किस्म के आड़ू, बरसाती पौधशाला में खड़क, भीमल, उतीस, बांज, रीठा, बकैल की पौध, चाय बागान में 2800 पौधे जिसका स्वाद वह पंतनगर विवि, विवेकानंद कृषि अनुसंधान के माध्यम से बढ़ाते हैं, बाग में इन दिनों बेमौसमी खीरा, लौकी अलग लदी है। इसी बाग में सात बकरियां, छह खरगोश जहां हैं वहीं मछली पालन के लिए पांच तालाब भी बने हैं। इसमें सिल्वर कार्प, कामन कार्प, ग्रास कार्प के पांच सौ बीज पड़े हैं। अस्सी साल के माधवानंद जोशी बोले, उमर का लिहाज नहीं है, हरे पौधे देखता हूं तो शरीर में जान आ जाती है..।
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जन्म के दो वर्ष बाद पिता का साया सिर से हटने के बाद मां ने मजदूरी कर जिंदगी बसर की तो माधवानंद तब पढ़ाई का ककहरा नहीं सीख सके। बढ़े हुए तो खेतों में काम किया और फिर उसमें ऐसे रम गए कि उनका सल्ला रौतेला में बनाया उद्यान आज पूरी कहानी बयां करता है। 1980 में राष्ट्रीय कार्यक्रमों से जुड़े के लिए उन्होंने 2500 रुपये का कर्ज लेकर फलदार वृक्ष लगाना शुरू किया। 1985 में मध्य हिमालय संस्था खुलगाड़ के साथ पर्यावरण कार्यों से जुड़े जिसका संचालन प्रसिद्ध वैज्ञानिक शंकर लाल साह कर रहे थे जिनके संपर्क में वह विभागों से जुड़े। उधर, सल्ला रौतेला में उनकी बगिया लगातार महक रही थी।
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बगिया में ककड़िया, गोला, ओलंपियर, मरचिया नाशपाती, रट डेलीसस, गोल्डन डेलीसस, ग्रीन डेलीसस और अर्ली सनोरी की सेब की किस्में, जामुन, नीबू, नारंगी, माल्टा, किन्नू, कीवी के पेड़। अशाड़िया, दोनापरी, रैड जून किस्म के आड़ू, बरसाती पौधशाला में खड़क, भीमल, उतीस, बांज, रीठा, बकैल की पौध, चाय बागान में 2800 पौधे जिसका स्वाद वह पंतनगर विवि, विवेकानंद कृषि अनुसंधान के माध्यम से बढ़ाते हैं, बाग में इन दिनों बेमौसमी खीरा, लौकी अलग लदी है। इसी बाग में सात बकरियां, छह खरगोश जहां हैं वहीं मछली पालन के लिए पांच तालाब भी बने हैं। इसमें सिल्वर कार्प, कामन कार्प, ग्रास कार्प के पांच सौ बीज पड़े हैं। अस्सी साल के माधवानंद जोशी बोले, उमर का लिहाज नहीं है, हरे पौधे देखता हूं तो शरीर में जान आ जाती है..।
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