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पर्यटन रूप में विकसित नहीं हो पाई राजकोट की सुरंग
Updated Sun, 21 Oct 2018 11:59 PM IST
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अल्मोड़ा। पंतत्यूड़ा गांव में स्थित राजकोट की सुरंग को पर्यटन की दृष्टि से विकसित नहीं किया जा सका है। सामरिक और पर्यटन की दृष्टि से जिले में इसे सबसे महत्वपूर्ण और पुरातात्विक महत्व की सुरंग माना जाता है। कुछ साल पहले पुरातत्व विभाग ने इस सुरंग को पर्यटन की दृष्टि से विकसित करने के लिए भारत सरकार की देहरादून स्थित पुरातत्व इकाई को पत्र भेजा था। उसके बाद सर्वेक्षण विभाग की टीम ने आकर सुरंग का निरीक्षण भी किया, लेकिन उसके बाद इस दिशा में काम आगे नहीं बढ़ सका।
कत्यूरकालीन ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व की यह सुरंग अल्मोड़ा से करीब 18 किमी दूर कोसी-सोमेश्वर मार्ग पर नदी के मुहाने पर बनी है। कत्यूरकालीन सुरंग करीब 200 मीटर लंबी है। जिसमें सात मुहाने बने हैं। अंग्रेजों ने गुफा को आपरेशन एंड पेट्रोलिंग नाम दिया था। कुमाऊं में अंग्रेजों के शासनकाल में इस सुरंग को व्यापक उपयोग में लाया जाता था। ऊंची चट्टान में बनी इस सुरंग से कई गांव एक साथ दिखाई देते हैं।
पहाड़ी के अंदर चट्टान को तराशकर तैयार की गई इस सुरंग के बारे में पुरातत्व विभाग का मानना है कि यह सुरंग तब शायद दुश्मनों पर नजर रखने के लिए बनाई गई होगी। सुरंग के अंदर रोशनी जाने के लिए सात मुहाने बने हैं और प्रत्येक मुहाने में 15 से 18 सीढ़ियां बनी हैं। सुरंग का एक मुहाना दो साल पूर्व स्थानीय लोगों द्वारा पत्थर निकालने के कारण बंद हो गया था। देखभाल नहीं होने के कारण इसके अन्य मुहाने भी बंद होने लगे हैं।
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पुरातत्व विभाग ने सर्वे कर सुरंग को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने का प्रस्ताव तैयार कर भारत सरकार के देहरादून स्थित निदेशक संस्कृति विभाग को पत्र भेजा था जिसके बाद ढाई माह पहले भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग देहरादून की टीम ने राजकोट आकर सुरंग का सर्वेक्षण किया था, लेकिन उसके बाद कार्रवाई आगे नहीं बढ़ सकी है। क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी चंद्र सिंह चौहान ने बताया कि देहरादून से पहुंची टीम ने सर्वेक्षण किया था आगे इस दिशा में क्या कार्रवाई हुई है इस बारे में कोई पत्र उनके पास नहीं पहुंचा है।
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कत्यूरकालीन ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व की यह सुरंग अल्मोड़ा से करीब 18 किमी दूर कोसी-सोमेश्वर मार्ग पर नदी के मुहाने पर बनी है। कत्यूरकालीन सुरंग करीब 200 मीटर लंबी है। जिसमें सात मुहाने बने हैं। अंग्रेजों ने गुफा को आपरेशन एंड पेट्रोलिंग नाम दिया था। कुमाऊं में अंग्रेजों के शासनकाल में इस सुरंग को व्यापक उपयोग में लाया जाता था। ऊंची चट्टान में बनी इस सुरंग से कई गांव एक साथ दिखाई देते हैं।
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पहाड़ी के अंदर चट्टान को तराशकर तैयार की गई इस सुरंग के बारे में पुरातत्व विभाग का मानना है कि यह सुरंग तब शायद दुश्मनों पर नजर रखने के लिए बनाई गई होगी। सुरंग के अंदर रोशनी जाने के लिए सात मुहाने बने हैं और प्रत्येक मुहाने में 15 से 18 सीढ़ियां बनी हैं। सुरंग का एक मुहाना दो साल पूर्व स्थानीय लोगों द्वारा पत्थर निकालने के कारण बंद हो गया था। देखभाल नहीं होने के कारण इसके अन्य मुहाने भी बंद होने लगे हैं।
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पुरातत्व विभाग ने सर्वे कर सुरंग को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने का प्रस्ताव तैयार कर भारत सरकार के देहरादून स्थित निदेशक संस्कृति विभाग को पत्र भेजा था जिसके बाद ढाई माह पहले भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग देहरादून की टीम ने राजकोट आकर सुरंग का सर्वेक्षण किया था, लेकिन उसके बाद कार्रवाई आगे नहीं बढ़ सकी है। क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी चंद्र सिंह चौहान ने बताया कि देहरादून से पहुंची टीम ने सर्वेक्षण किया था आगे इस दिशा में क्या कार्रवाई हुई है इस बारे में कोई पत्र उनके पास नहीं पहुंचा है।