{"_id":"5ed948f08ebc3e9026270877","slug":"varanasi-environment-day-city-news-vns5284012143","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"विश्व पर्यावरण दिवसः लॉकडाउन में काशी में कम हुआ प्रदूषण, 50 सालों में गंगा का जल हुआ सबसे शुद्ध, हवा और पानी का मिजाज भी बदला","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
विश्व पर्यावरण दिवसः लॉकडाउन में काशी में कम हुआ प्रदूषण, 50 सालों में गंगा का जल हुआ सबसे शुद्ध, हवा और पानी का मिजाज भी बदला
Fri, 05 Jun 2020 10:18 AM IST
वाराणसी ब्यूरो
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
Published by: वाराणसी ब्यूरो
Updated Fri, 05 Jun 2020 10:18 AM IST
विज्ञापन
वाराणसी में बीएचयू परिसर का खूबसूरत दृश्य।
- फोटो : अमर उजाला।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विश्व पर्यावरण दिवस पर बनारसियों को बदली-बदली काशी नजर आई है। हवा, पानी और वातावरण के निखार से हर कोई चकित है। बात गंगा की करें तो पिछले 50 सालों में गंगा का जल सबसे अधिक शुद्ध हुआ है। वहीं विश्व के सबसे प्रदूषित शहरों में शुमार काशी अब तो पूरी तरह ग्रीन जोन में है। जहां हवा, पानी और ध्वनि का प्रदूषण नदारद है।
बनारसियों के लिए लॉकडाउन अब तक का सबसे मुश्किल भरा दौर था लेकिन प्रकृति ने इतनी शुद्ध हवा और पानी कभी नहीं दिया था। पिछले 50 सालों में भी गंगा भी इतनी निर्मल कभी नहीं बहीं। पानी का मटमैला रंग अब साफ हो गया है। रंग बदल गया है। वो जलचर भी अब दिखने लगे हैं जिन्हें लुप्त मान लिया गया था।
आंकड़े बताते हैं कि बनारस में गंगा 25 से 30 फीसदी साफ हो चुकी हैं। गंगा के वो जलचर, जो प्रदूषण की भेंट चढ़ते जा रहे थे, सीढि़यों पर तैरने लगे हैं। बीएचयू के नदी वैज्ञानिक प्रो. बीडी त्रिपाठी कहते हैं कि गंगा का पानी साफ हुआ है। लॉकडाउन के बाद गंगा जल में हुए बदलाव का उन्होंने गहन अध्ययन किया है। शायद 50 साल पहले भी बनारस में गंगा इतनी निर्मल नहीं रही होंगी।
विज्ञापन
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय प्रबंधक कालिका सिंह ने बताया कि 15 मार्च को अप स्ट्रीम में पीएच 8.19 और डिजाल्व आक्सीजन की मात्रा 8.8 प्रति मिलीलीटर थी। बीओडी 2.8 और फीकल कॉलीफार्म 2600 एमपीएन प्रति सौ मिलीलीटर था। जबकि डाउन स्टीम में पानी काफी गंदा था।
पीएच 8.34 और डिजाल्व आक्सीजन की मात्रा 8.2 प्रति मिली लीटर और बीओडी की मात्रा 3.7 मिली ग्राम प्रति मिली लीटर और टोटल कालीफार्म 24000 एमपीएन प्रति 100 मिली लीटर रही। इस हद तक निर्मल हो गईं गंगा गंगा जल का ताजा आंकड़ा अप स्टीम में पीएच 8.35 और डिजाल्व आक्सीजन की मात्रा 9.1 प्रति मिली लीटर थी। बीओडी की मात्रा 2.4 मिली ग्राम प्रति मिली लीटर और टोटल कालीफार्म 1300 एमपीएन प्रति 100 मिली लीटर रही। डाउन स्ट्रीम में स्थिति अब काफी बदल गई है।
पूरी तरह बदल गया नदी का रंग
गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण के विशेषज्ञ प्रो. बीडी त्रिपाठी के अनुसार सामान्य दिनों में बनारस में हमेशा करीब एक लाख तीर्थयात्री रहते हैं। लॉकडाउन में भीड़ कम है। काशी में शवों के जलने में 40 प्रतिशत से ज्यादा कमी आई है। काशी में सिल्क फैब्रिक और आइवरी वर्क्स की करीब 1200 फैक्ट्रियां हैं। ये फैक्ट्रियां करीब 25 एमएलडी गंदा पानी छोड़ती थीं।
लॉकडाउन की वजह से केमिकलयुक्त पानी अब गंगा में नहीं मिल रहा है। 500 से अधिक मोटर के कारखाने भी बंद हैं। काशी के कई गंगा घाटों को धोबियों ने अपना बना लिया था। कपड़ा धुलाई भी बंद है। पानी का उपयोग और दोहन कम हुआ है। इससे गंगा का प्रवाह बढ़ गया है। इसी वजह से एक मीटर की गहराई तक मछलियां दिख रही हैं। गंगा में गिरने वाले नालों को छोड़ दिया जाए तो बाकी स्थानों पर गंगा 30 फीसदी से अधिक साफ हो गई है।
जलीय जीवों के लिए हुआ अनुकूल
बनारस में करीब 35 नालों से हर रोज 350 मिलियन लीटर गंदा पानी गंगा में जाता है। इसके बावजूद गंगा जल की गुणवत्ता में काफी सुधार हुआ है। गंगाजल में आक्सीजन की मात्रा बढ़ी है और कार्बन डाई आक्साइड की मात्रा कम हुई है। इस वजह से गंगा जल अब मछलियों और अन्य जलीय जीवों के लिए अनुकूल है।
गंगाजल के निर्मलीकरण का पैमाना
विज्ञापन
बनारसियों के लिए लॉकडाउन अब तक का सबसे मुश्किल भरा दौर था लेकिन प्रकृति ने इतनी शुद्ध हवा और पानी कभी नहीं दिया था। पिछले 50 सालों में भी गंगा भी इतनी निर्मल कभी नहीं बहीं। पानी का मटमैला रंग अब साफ हो गया है। रंग बदल गया है। वो जलचर भी अब दिखने लगे हैं जिन्हें लुप्त मान लिया गया था।
विज्ञापन
आंकड़े बताते हैं कि बनारस में गंगा 25 से 30 फीसदी साफ हो चुकी हैं। गंगा के वो जलचर, जो प्रदूषण की भेंट चढ़ते जा रहे थे, सीढि़यों पर तैरने लगे हैं। बीएचयू के नदी वैज्ञानिक प्रो. बीडी त्रिपाठी कहते हैं कि गंगा का पानी साफ हुआ है। लॉकडाउन के बाद गंगा जल में हुए बदलाव का उन्होंने गहन अध्ययन किया है। शायद 50 साल पहले भी बनारस में गंगा इतनी निर्मल नहीं रही होंगी।
विज्ञापन
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय प्रबंधक कालिका सिंह ने बताया कि 15 मार्च को अप स्ट्रीम में पीएच 8.19 और डिजाल्व आक्सीजन की मात्रा 8.8 प्रति मिलीलीटर थी। बीओडी 2.8 और फीकल कॉलीफार्म 2600 एमपीएन प्रति सौ मिलीलीटर था। जबकि डाउन स्टीम में पानी काफी गंदा था।
पीएच 8.34 और डिजाल्व आक्सीजन की मात्रा 8.2 प्रति मिली लीटर और बीओडी की मात्रा 3.7 मिली ग्राम प्रति मिली लीटर और टोटल कालीफार्म 24000 एमपीएन प्रति 100 मिली लीटर रही। इस हद तक निर्मल हो गईं गंगा गंगा जल का ताजा आंकड़ा अप स्टीम में पीएच 8.35 और डिजाल्व आक्सीजन की मात्रा 9.1 प्रति मिली लीटर थी। बीओडी की मात्रा 2.4 मिली ग्राम प्रति मिली लीटर और टोटल कालीफार्म 1300 एमपीएन प्रति 100 मिली लीटर रही। डाउन स्ट्रीम में स्थिति अब काफी बदल गई है।
पूरी तरह बदल गया नदी का रंग
गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण के विशेषज्ञ प्रो. बीडी त्रिपाठी के अनुसार सामान्य दिनों में बनारस में हमेशा करीब एक लाख तीर्थयात्री रहते हैं। लॉकडाउन में भीड़ कम है। काशी में शवों के जलने में 40 प्रतिशत से ज्यादा कमी आई है। काशी में सिल्क फैब्रिक और आइवरी वर्क्स की करीब 1200 फैक्ट्रियां हैं। ये फैक्ट्रियां करीब 25 एमएलडी गंदा पानी छोड़ती थीं।
लॉकडाउन की वजह से केमिकलयुक्त पानी अब गंगा में नहीं मिल रहा है। 500 से अधिक मोटर के कारखाने भी बंद हैं। काशी के कई गंगा घाटों को धोबियों ने अपना बना लिया था। कपड़ा धुलाई भी बंद है। पानी का उपयोग और दोहन कम हुआ है। इससे गंगा का प्रवाह बढ़ गया है। इसी वजह से एक मीटर की गहराई तक मछलियां दिख रही हैं। गंगा में गिरने वाले नालों को छोड़ दिया जाए तो बाकी स्थानों पर गंगा 30 फीसदी से अधिक साफ हो गई है।
जलीय जीवों के लिए हुआ अनुकूल
बनारस में करीब 35 नालों से हर रोज 350 मिलियन लीटर गंदा पानी गंगा में जाता है। इसके बावजूद गंगा जल की गुणवत्ता में काफी सुधार हुआ है। गंगाजल में आक्सीजन की मात्रा बढ़ी है और कार्बन डाई आक्साइड की मात्रा कम हुई है। इस वजह से गंगा जल अब मछलियों और अन्य जलीय जीवों के लिए अनुकूल है।
गंगाजल के निर्मलीकरण का पैमाना
- डीओ यानी डिजाल्व आक्सीजन की मात्रा नदी के पानी में पांच मिलीग्राम प्रति लीटर से ज्यादा होनी चाहिए।
- बीओडी यानी बायोकेमिकल आक्सीजन डिजाल्व की मात्रा नदी के पानी में तीन मिलीग्राम प्रति लीटर से कम होनी चाहिए।
- टीडीएस यानी टोटल डीसॉल्व सॉलिड्स की मात्रा नदी के पानी में 600 मिलीग्राम प्रति लीटर से कम होनी चाहिए।
छंट गए धूल के बादल, गायब हुआ हवा का जहर, एयर क्वालिटी इंडेक्स पहुंचा 68 पर
वाराणसी का दशाश्वमेध घाट।
- फोटो : अमर उजाला।
विश्व के सबसे प्रदूषित शहर बनारस की हवा अब जहरीली नहीं रही। लॉकडाउन ने विश्व के सबसे प्रदूषित शहर का तमगा भी बनारस से छीन लिया। शहर के लोग अब सुकून भरी नींद ले रहे हैं। पर्यावरण सुधरा तो रोगी घटे और लोग कोरोना से लड़ने में भी सक्षम हुए।
बनारस में लॉकडाउन से पहले और मौजूदा समय के आंकड़ों पर गौर किया जाए तो वायु गुणवत्ता में अभूतपूर्व सुधार हुआ है। बृहस्पतिवार को एयर क्वालिटी इंडेक्स 68, तीन जून को 74, दो जून को 79 और एक जून को 82 दर्ज किया गया। उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़ों के अनुसार तीन और दस मार्च को बनारस में एयर क्वालिटी इंडेक्स 216 और 254 था।
एक महीने पहले तीन अप्रैल और 16 अप्रैल को जब प्रदूषण मापा गया तो इसमें तीन अप्रैल को एक्यूआई घटकर 59 हो गई। 16 अप्रैल 2020 को एक्यूआई सिर्फ 84 दर्ज की गई। अभी बनारस में वाहनों की आवाजाही शुरू हो गई है। बावजूद इसके एयर क्वालिटी सौ के नीचे ही है।
पीएम मैटर था सबसे अधिक लॉकडाउन से पहले शहर की हवा में पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) सामान्य से चार से पांच गुना अधिक थे। पीएम महीन धूल के वो कण होते हैं जो आसानी से सांस के माध्यम से शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। पहली मार्च को पीएम 2.5 का अधिकतम स्तर 362 प्रति क्यूबिक मीटर दर्ज किया गया था, जबकि इसकी सामान्य मात्रा 50 प्रति क्यूबिक मीटर होना चाहिए। इसी तरह पीएम 10 का सामान्य स्तर 100 प्रति क्यूबिक मीटर हैए जबकि इसका स्तर 410 प्रति क्यूबिक मीटर रहा।
बनारस में वायु प्रदूषण बढने के पीछे वाहनों के जाम को प्रमुख कारण माना है। निर्माण कार्य व सफ ाई के दौरान मानक का पालन न करने से प्रदूषण बढ़ गया था। हवा का पैमाना एक्यूआई का स्तर शून्य से 50 होने पर हवा की गुणवता अच्छी मानी जाती है। 51 से 100 एक्यूआई वाली हवा संतोषजनक, 101 से 201 वाली मध्यम स्तर की खराब, 201 से 301 वाली खराब, 301 से 400 बेहद खराब और 401 से 500 एक्यूआई वाली हवा को पूरी तरह खतरनाक और जहरीला माना जाता है।
थम गया शोर, मिल रहा सुकून
ध्वनि प्रदूषण के मामले में भी मिली राहत अमर उजाला ब्यूरो वाराणसी। लॉकडाउन के कारण शहर में ध्वनि प्रदूषण का स्तर भी बेहद कम हुआ है। शोर थमने से लोगों ने सुकून की सांस भी ली है। ध्वनि प्रदूषण के खिलाफ अभियान चला रहे चेतन उपाध्याय भी बेहद खुश हैं। चेतन उपाध्याय की ध्वनि प्रदूषण के खिलाफ जागरूकता की मुहिम को लॉकडाउन में कामयाबी मिल गई है।
उतर प्रदेश नियंत्रण बोर्ड के आंकड़ों की मानें तो शहर में शोर में करीब 25 फीसदी कमी आई है। हालांकि उन्होंने योगी सरकार को खत भेजा है और नाराजगी जताई है कि शहर को शोर से मुक्ति दिलाने के लिए आज तक मंदिरों.मस्जिदों से माइक नहीं उतरवाई जा सकी है। इन्हें लगता है कि लाकडाउन टूटेगा तो शोर का ग्राफ वहीं पहुंच जाएगाए जहां पहला था।
बनारस में लॉकडाउन से पहले और मौजूदा समय के आंकड़ों पर गौर किया जाए तो वायु गुणवत्ता में अभूतपूर्व सुधार हुआ है। बृहस्पतिवार को एयर क्वालिटी इंडेक्स 68, तीन जून को 74, दो जून को 79 और एक जून को 82 दर्ज किया गया। उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़ों के अनुसार तीन और दस मार्च को बनारस में एयर क्वालिटी इंडेक्स 216 और 254 था।
एक महीने पहले तीन अप्रैल और 16 अप्रैल को जब प्रदूषण मापा गया तो इसमें तीन अप्रैल को एक्यूआई घटकर 59 हो गई। 16 अप्रैल 2020 को एक्यूआई सिर्फ 84 दर्ज की गई। अभी बनारस में वाहनों की आवाजाही शुरू हो गई है। बावजूद इसके एयर क्वालिटी सौ के नीचे ही है।
पीएम मैटर था सबसे अधिक लॉकडाउन से पहले शहर की हवा में पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) सामान्य से चार से पांच गुना अधिक थे। पीएम महीन धूल के वो कण होते हैं जो आसानी से सांस के माध्यम से शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। पहली मार्च को पीएम 2.5 का अधिकतम स्तर 362 प्रति क्यूबिक मीटर दर्ज किया गया था, जबकि इसकी सामान्य मात्रा 50 प्रति क्यूबिक मीटर होना चाहिए। इसी तरह पीएम 10 का सामान्य स्तर 100 प्रति क्यूबिक मीटर हैए जबकि इसका स्तर 410 प्रति क्यूबिक मीटर रहा।
बनारस में वायु प्रदूषण बढने के पीछे वाहनों के जाम को प्रमुख कारण माना है। निर्माण कार्य व सफ ाई के दौरान मानक का पालन न करने से प्रदूषण बढ़ गया था। हवा का पैमाना एक्यूआई का स्तर शून्य से 50 होने पर हवा की गुणवता अच्छी मानी जाती है। 51 से 100 एक्यूआई वाली हवा संतोषजनक, 101 से 201 वाली मध्यम स्तर की खराब, 201 से 301 वाली खराब, 301 से 400 बेहद खराब और 401 से 500 एक्यूआई वाली हवा को पूरी तरह खतरनाक और जहरीला माना जाता है।
थम गया शोर, मिल रहा सुकून
ध्वनि प्रदूषण के मामले में भी मिली राहत अमर उजाला ब्यूरो वाराणसी। लॉकडाउन के कारण शहर में ध्वनि प्रदूषण का स्तर भी बेहद कम हुआ है। शोर थमने से लोगों ने सुकून की सांस भी ली है। ध्वनि प्रदूषण के खिलाफ अभियान चला रहे चेतन उपाध्याय भी बेहद खुश हैं। चेतन उपाध्याय की ध्वनि प्रदूषण के खिलाफ जागरूकता की मुहिम को लॉकडाउन में कामयाबी मिल गई है।
उतर प्रदेश नियंत्रण बोर्ड के आंकड़ों की मानें तो शहर में शोर में करीब 25 फीसदी कमी आई है। हालांकि उन्होंने योगी सरकार को खत भेजा है और नाराजगी जताई है कि शहर को शोर से मुक्ति दिलाने के लिए आज तक मंदिरों.मस्जिदों से माइक नहीं उतरवाई जा सकी है। इन्हें लगता है कि लाकडाउन टूटेगा तो शोर का ग्राफ वहीं पहुंच जाएगाए जहां पहला था।
आयुर्वेद से करें प्रदूषण का मुकाबला
Superfood
- फोटो : Pixabay
प्रदूषण के कारण लोगों के फेफड़ों में सबसे ज्यादा संक्रमण होने की संभावना रहती है। खांसी, सांस लेने में परेशानी, गले में खरखराहट और गंभीर स्थिति में अस्थमा जैसी बीमारियों के होने की भी संभावना अधिक रहती है। धूल के कणों से त्वचा में जलन, चकते, आंखों में जलन आदि भी रोग उत्पन्न होने का खतरा बढ़ जाता है। इन रोगों से बचने के लिए आयुर्वेद में क्या क्या उपाय है इसे बता रहे है चौकाघाट स्थित राजकीय स्नातकोतर आयुर्वेद महाविद्यालय एवं चिकित्सालय के कायचिकित्सा एवं पंचकर्म विभाग के डॉ. अजय कुमार.
- प्रतिदिन तुलसी, अदरक की चाय पीने से श्वास संबंधित रोगों से बचाव में मदद मिलती है तथा रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती है।
- हल्दी रसोई में मौजूद सबसे महत्वपूर्ण आयुर्वेदिक औषधि है। एक गिलास गर्म दूध में एक चम्मच हल्दी मिलाकर रात को सोने से पहले इसका सेवन करने से लाभ मिलता है।
- प्रतिदिन अदरक, लहसुन, तुलसी, नीम, काली मिर्च, पीपली जैसी चीजें का सेवन करना चाहिए।
- गले में खराश महसूस होने पर अदरक के साथ 4-5 पते तुलसी और 2-3 दाने काली मिर्च के मिलाकर दो कप पानी में उबालकर पीना चाहिए।
- काली मिर्च को पीसकर शहद के साथ लेने से सीने में जमा कफ दूर होता है तथा सांस संबंधी समस्या से राहत मिलती है।
- नीम की पत्तियों को पानी में उबालकर नहाने के पानी में मिलाकर नहाएं। यह त्वचा पर जमे प्रदूषकों को हटाता है और त्वचा को डिटॉक्सिफाई करता है।
- त्रिफला का पाउडर रातभर एक गिलास में भिगो कर रख दें, सुबह छान कर इस पानी से आंखें धोने से आंखों को आराम मिलेगा।
- प्रदूषण से आंखों में होने वाले सूखेपन या जलन से बचने के लिए आंखों को बार-बार ठंडे पानी से या गुलाबजल से धोना चाहिए।
- नासा मार्ग को साफ रखने के लिए गाय के शुद्ध घी का नस्य लेना चाहिए। इससे सांस की नली साफ हो जाती है, जिससे सांस लेने में दिक्कत नहीं होती और हानिकारक तत्व फेफड़ों तक नही पहुंचते।