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केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान बोले: संस्कृति और विरासत के दो प्राचीन केंद्रों को जोड़ेगा काशी-तमिल संगमम

Fri, 04 Nov 2022 07:38 PM IST
उत्पल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Published by: उत्पल कांत Updated Fri, 04 Nov 2022 07:38 PM IST
सार

काशी और तमिलनाडु के बीच भले ही दूरी हजारों किलोमीटर हो, लेकिन दोनों ही भारतीय सनातन संस्कृति और आध्यात्म के बड़े प्राचीन पौराणिक केंद्र भी हैं। इसी महान धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्रों को प्रगाढ़ करने के लिए काशी तमिल संगमम का आयोजन होने जा रहा है।

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Union Minister Dharmendra Pradhan said Kashi-Tamil Sangamam will connect two ancient centers
प्रेस वार्ता करते केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान, बीएचयू कुलपति और मंत्री रविंद्र जायसवाल - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

वाराणसी दौरे पर पहुंचे केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने शुक्रवार को 17 नवंबर से शुरू होने वाले काशी-तमिल संगमम की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति में सभी भाषा को महत्व दिया गया है।  इसी महत्व को समझते हुए काशी में एक महीने काशी-तमिल संगमम का आयोजन किया जा रहा है।

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सर्किट हाउस में मीडिया से बात करते हुए केंद्रीय मंत्री ने कहा कि एक भारत, श्रेष्ठ भारत की समग्र रूपरेखा और भावना के तहत आयोजित होने वाला ये संगमम प्राचीन भारत और समकालीन पीढ़ी के बीच एक सेतु का निर्माण करेगा। उन्होंने कहा कि काशी संगमम ज्ञान, संस्कृति और विरासत के इन दो प्राचीन केंद्रों के बीच की कड़ी को फिर से जोड़ेगा। 
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 तमिलनाडु से काशी आएंगे 2500 लोग
एक महीने तक आयोजित होने वाले इस कार्यक्रम में तमिलनाडु के तीन केंद्र से 12 समूहों में कुल 2500 लोगों को आमंत्रित किया जा रहा है। बताया कि तमिलनाडु से आए समूह काशी की ऐतिहासिक महत्ता को समझेंगे। इस दौरान तमिलनाडु की विभिन्न सांस्कृतिक टोली काशी में अपना सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन करेंगे।

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इसके अलावा तमिलनाडु के छोटे व्यवसायी काशी में अपना स्टॉल लेकर आएंगे और अपने व्यापारिक गतिविधियों को आगे ले जाएंगे। उन्होंने बताया कि समूह काशी के अलावा प्रयागराज और अयोध्या भी जाएगा जहां की संस्कृति के बारे में जान सकेंगे। 

इन विषयों पर केंद्रित होगा काशी तमिल संगमम
केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने बताया कि एक महीने तक चलने वाले काशी तमिल संगमम कार्यक्रम में भारतीय संस्कृति की इन दो प्राचीन अभिव्यक्तियों के विभिन्न पहलुओं पर विशेषज्ञों/विद्वानों के बीच अकादमिक आदान-प्रदान- सेमिनार, चर्चा आदि आयोजित किए जाएंगे। इसमें दोनों के बीच संबंधों और साझा मूल्यों को आगे लाने पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा।

इसका व्यापक उद्देश्य ज्ञान और संस्कृति की इन दो परंपराओं को करीब लाना, हमारी साझा विरासत की एक समझ निर्मित करना और इन क्षेत्रों लोगों के बीच पारस्परिक संबंधों को मजबूत करना है।

काशी-तमिल संगमम ज्ञान के विभिन्न पहलुओं-साहित्य, प्राचीन ग्रंथों, दर्शन, आध्यात्मिकता, संगीत, नृत्य, नाटक, योग, आयुर्वेद, हथकरघा, हस्तशिल्प के साथ-साथ आधुनिक  नवाचार, व्यापारिक आदान-प्रदान, एजुटेक एवं अगली पीढ़ी की अन्य प्रौद्योगिकी आदि जैसे विषयों पर केंद्रित होगा। इन विषयों पर विचार- गोष्ठी, चर्चा, व्याख्यान, कार्यशाला आदि आयोजित किए जाएंगे, जिसके लिए संबंधित विषयों के विशेषज्ञों को आमंत्रित किया जाएगा। 

काशी तमिल संगमम होगा एक अनूठा अनुभव

धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि यह आयोजन छात्रों, विद्वानों, शिक्षाविदों, पेशेवरों आदि के लिए भारतीय ज्ञान प्रणाली, शिक्षा एवं प्रशिक्षण से संबंधित कार्यप्रणालियों, कला एवं संस्कृति, भाषा, साहित्य आदि से जुड़े विभिन्न पहलुओं के बारे में सीखने का एक अनूठा अनुभव होगा।

 इन चर्चाओं का लाभ ज्ञान के क्षेत्रों से जुड़े वास्तविक साधकों को मिलना चाहिए। इसे सुनिश्चित करने के लिए यह प्रस्ताव किया गया है कि विशेषज्ञों के अलावा, तमिलनाडु के विभिन्न हिस्सों से विभिन्न समूहों के आम साधकों को वाराणसी और इसके आसपास के क्षेत्र की 8 दिवसीय यात्रा के लिए लाया जाए। 

काशी तमिल संगमम के लिए विशेष लोगों की पहचान

संभावित तौर पर छात्रों, शिक्षकों, साहित्यकारों (लेखकों, कवियों, प्रकाशकों), सांस्कृतिक विशेषज्ञों, पेशेवरों (कला, संगीत, नृत्य, नाटक, लोक कला, योग, आयुर्वेद), उद्यमियों, (एसएमई, स्टार्ट-अप) व्यवसायी, (सामुदायिक व्यवसाय समूह, होटल व्यवसायी,) कारीगर, विरासत संबंधी विशेषज्ञ (पुरातत्वविद, टूर गाइड, ब्लॉगर आदि) आध्यात्मिक, ग्रामीण, विभिन्न संप्रदाय से जुड़े संगठन) सहित 12 ऐसे समूहों की पहचान की गई है। ये लोग शैक्षणिक कार्यक्रमों में भाग लेंगे, उसी क्षेत्र से जुड़े वाराणसी के लोगों के साथ बातचीत करेंगे और वाराणसी एवं उसके आसपास के दर्शनीय स्थलों का भ्रमण करेंगे।

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