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धूमिल की स्मृतियां सहेज रहे शिक्षक
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
Updated Wed, 09 Nov 2016 02:50 AM IST
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जनकवि सुदामा पांडेय ‘धूमिल’ ने भतसार गांव में ब्रिटिश काल के जिस भवन में प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण की थी, इसी स्कूल के शिक्षक आज भी उनकी इस स्मृति को संरक्षित कर रहे हैं। समय-समय पर मरम्मत और रंगाई-पुताई का खर्च उठाने के साथ ही इसकी देखरेख की जिम्मेदारी शिक्षक निभा रहे हैं।
भतसार में 127 वर्ष पुराने प्राथमिक विद्यालय के भवन को जर्जर होने पर कई साल पहले कंडम घोषित कर दिया गया था। इसके बगल में प्राथमिक स्कूल का नया भवन शासन ने बनवा दिया था। इसके बाद स्कूल के प्रधानाध्यापक वीरेंद्र कुमार मिश्र ने जर्जर भवन को धूमिल के नाम समर्पित करते हुए उसे संवारने का जिम्मा उठाया। विद्यालय के सहायक अध्यापक धीरेंद्र कुमार सिंह, उमाशंकर सिंह, अंकुर सिंह, सुशीला देवी, संगीता ठाकुर, ममता भी इस काम में पूरे समर्पण के साथ मदद करते हैं। नए भवन में स्कूल चलने के बाद भी जनकवि के सम्मान में धूमिल स्मृति भवन के एक कक्ष में भी बच्चों को पढ़ाया जाता है। प्रधानाध्यापक वीरेंद्र वीरेंद्र का कहना है कि इस भवन में पुस्तकालय और वाचनालय खुल जाता तो आने वाली पीढ़ियों को जनकवि के बारे में जानने-समझने और शोध करने में आसानी होती।
धूमिल का गांव खेवली की शासन स्तर पर की जा रही उपेक्षा से गांव के लोग आहत हैं। 22 साल पहले चुनाव का बहिष्कार करने के बाद तो गांव में सड़क बन पाई थी। आज तक इसका नामकरण धूमिल के नाम पर नहीं किया गया।
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वर्ष 1996 में धूमिल जन संपर्क समिति के अध्यक्ष स्व. भगेलू सिंह, सचिव देवी शंकर सिंह और अजय कुमार सिंह की अगुवाई में पूरे गांव के लोगों ने लोकसभा चुनाव का बहिष्कार कर दिया था। उस चुनाव में भाजपा प्रत्याशी शंकर प्रसाद जायसवाल ने गांव के लोगों की काफी मान-मनौवल की लेकिन कोई भी मतदान के लिए राजी नहीं हुआ। इसके बाद लहिया से खेवली तक पिच रोड तो बनवाई गई लेकिन धूमिल के घर तक सड़क नहीं पहुंच पाई।
सुदामा पांडेय बचपन से ही अक्खड़ी और स्वाभिमानी थे। शुरू से ही उनमें परिवर्तन का जुनून दिखता था। ताउम्र उन्होंने अपने सम्मान, सिद्धांत और विचारों से समझौता नहीं किया। यह कहना है धूमिल के बाल सखा और खेवली गांव निवासी, गंगापुर इंटर कॉलेज के पूर्व प्रधानाचार्य राजनाथ सिंह का। बताया कि धूमिल ने गरीबों, मजदूरों और कमजोर लोगों पर किसी भी तरह के अत्याचार का हमेशा विरोध किया। भतसार में प्राथमिक शिक्षा ग्रहण करने के बाद जूनियर हाईस्कूल की पढ़ाई के लिए छह किमी पैदल हरहुआ जाते थे। गांव के अशोक सिंह का कहना है कि सरकारी उपेक्षा के साथ ही धूमिल की प्रतिभा को दबाने का प्रयास किया जा रहा है।
मैं कोई ठंडा आदमी नहीं हूं
मुझमें भी आग है -
मगर वह
भभककर बाहर नहीं आती
क्योंकि उसके चारों तरफ चक्कर काटता हुआ
एक ‘पूंजीवादी’ दिमाग है
जो परिवर्तन तो चाहता है
मगर आहिस्ता-आहिस्ता
कुछ इस तरह कि चीजों की शालीनता बनी रहे।
कुछ इस तरह कि कांख भी ढकी रहे
और विरोध में उठे हुए हाथ की
मुट्ठी भी तनी रहे...
और यही वजह है कि बात
फैलने की हद तक आते-आते रुक जाती है
क्योंकि हर बार
चंद टुच्ची सुविधाओं के लालच के सामने
अभियोग की भाषा चुक जाती है...।
(धूमिल की लंबी कविता ‘पटकथा’ से)
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भतसार में 127 वर्ष पुराने प्राथमिक विद्यालय के भवन को जर्जर होने पर कई साल पहले कंडम घोषित कर दिया गया था। इसके बगल में प्राथमिक स्कूल का नया भवन शासन ने बनवा दिया था। इसके बाद स्कूल के प्रधानाध्यापक वीरेंद्र कुमार मिश्र ने जर्जर भवन को धूमिल के नाम समर्पित करते हुए उसे संवारने का जिम्मा उठाया। विद्यालय के सहायक अध्यापक धीरेंद्र कुमार सिंह, उमाशंकर सिंह, अंकुर सिंह, सुशीला देवी, संगीता ठाकुर, ममता भी इस काम में पूरे समर्पण के साथ मदद करते हैं। नए भवन में स्कूल चलने के बाद भी जनकवि के सम्मान में धूमिल स्मृति भवन के एक कक्ष में भी बच्चों को पढ़ाया जाता है। प्रधानाध्यापक वीरेंद्र वीरेंद्र का कहना है कि इस भवन में पुस्तकालय और वाचनालय खुल जाता तो आने वाली पीढ़ियों को जनकवि के बारे में जानने-समझने और शोध करने में आसानी होती।
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धूमिल का गांव खेवली की शासन स्तर पर की जा रही उपेक्षा से गांव के लोग आहत हैं। 22 साल पहले चुनाव का बहिष्कार करने के बाद तो गांव में सड़क बन पाई थी। आज तक इसका नामकरण धूमिल के नाम पर नहीं किया गया।
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वर्ष 1996 में धूमिल जन संपर्क समिति के अध्यक्ष स्व. भगेलू सिंह, सचिव देवी शंकर सिंह और अजय कुमार सिंह की अगुवाई में पूरे गांव के लोगों ने लोकसभा चुनाव का बहिष्कार कर दिया था। उस चुनाव में भाजपा प्रत्याशी शंकर प्रसाद जायसवाल ने गांव के लोगों की काफी मान-मनौवल की लेकिन कोई भी मतदान के लिए राजी नहीं हुआ। इसके बाद लहिया से खेवली तक पिच रोड तो बनवाई गई लेकिन धूमिल के घर तक सड़क नहीं पहुंच पाई।
सुदामा पांडेय बचपन से ही अक्खड़ी और स्वाभिमानी थे। शुरू से ही उनमें परिवर्तन का जुनून दिखता था। ताउम्र उन्होंने अपने सम्मान, सिद्धांत और विचारों से समझौता नहीं किया। यह कहना है धूमिल के बाल सखा और खेवली गांव निवासी, गंगापुर इंटर कॉलेज के पूर्व प्रधानाचार्य राजनाथ सिंह का। बताया कि धूमिल ने गरीबों, मजदूरों और कमजोर लोगों पर किसी भी तरह के अत्याचार का हमेशा विरोध किया। भतसार में प्राथमिक शिक्षा ग्रहण करने के बाद जूनियर हाईस्कूल की पढ़ाई के लिए छह किमी पैदल हरहुआ जाते थे। गांव के अशोक सिंह का कहना है कि सरकारी उपेक्षा के साथ ही धूमिल की प्रतिभा को दबाने का प्रयास किया जा रहा है।
मैं कोई ठंडा आदमी नहीं हूं
मुझमें भी आग है -
मगर वह
भभककर बाहर नहीं आती
क्योंकि उसके चारों तरफ चक्कर काटता हुआ
एक ‘पूंजीवादी’ दिमाग है
जो परिवर्तन तो चाहता है
मगर आहिस्ता-आहिस्ता
कुछ इस तरह कि चीजों की शालीनता बनी रहे।
कुछ इस तरह कि कांख भी ढकी रहे
और विरोध में उठे हुए हाथ की
मुट्ठी भी तनी रहे...
और यही वजह है कि बात
फैलने की हद तक आते-आते रुक जाती है
क्योंकि हर बार
चंद टुच्ची सुविधाओं के लालच के सामने
अभियोग की भाषा चुक जाती है...।
(धूमिल की लंबी कविता ‘पटकथा’ से)