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पंडित बिरजू महाराज: बहुआयामी प्रतिभा का अनकहा संसार, कलाकारों ने दी श्रद्धांजलि; किया नमन

Thu, 05 Feb 2026 01:21 PM IST
अमन विश्वकर्मा अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: अमन विश्वकर्मा Updated Thu, 05 Feb 2026 01:21 PM IST
सार

Varanasi News: पंडित बिरजू महाराज केवल गुरु नहीं थे, बल्कि एक ऐसी जीवंत पाठशाला थे, जहाँ से सीखने वाला हर व्यक्ति कुछ नया लेकर लौटता था। पंडित बिरजू महाराज का जीवन इस बात का प्रमाण है कि सच्ची प्रतिभा एक नहीं, अनेक रूपों में प्रकट होती है। काशी के कलाकारों ने उन्हें अपने-अपने तरीके से नमन किया।

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Pandit Birju Maharaj untold world of multifaceted talent artists pay tribute and offer their respects
अपने शिष्यों के साथ कथक सम्राट पंडित बिरजू महाराज। - फोटो : संवाद

विस्तार

Kathak: पंडित बिरजू महाराज केवल कथक के महान सम्राट ही नहीं थे, बल्कि बहुआयामी प्रतिभा के अद्भुत उदाहरण भी थे। आमतौर पर लोग उन्हें मंच पर थिरकते पैरों, भावपूर्ण नेत्रों और ताल की सटीक पकड़ के लिए जानते हैं, लेकिन उनके व्यक्तित्व का एक कम चर्चित पहलू यह भी था कि उन्हें गाड़ियां बनाने और सुधारने का गहरा शौक था। 

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वे किसी कुशल मैकेनिक की तरह मशीनों की बनावट समझते थे। कहा जाता है कि अगर नृत्य में नहीं होते, तो शायद वे एक बेहतरीन इंजीनियर या मैकेनिक होते। संगीत उनके जीवन की आत्मा था। कथक के साथ-साथ उन्हें सितार वादन का भी अच्छा ज्ञान था। सरोद, तबला, नाल जैसे वाद्य यंत्रों की बारीकियों को वे न सिर्फ समझते थे, बल्कि स्वयं बजाकर कलाकारों को सिखाते भी थे।
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ताल, लय और सुर की समझ उनके भीतर स्वाभाविक रूप से विराजमान थी। यही कारण था कि उनके नृत्य में केवल अंग संचालन नहीं, बल्कि संपूर्ण संगीतात्मकता झलकती थी। पंडित बिरजू महाराज की कला की सीमा केवल शास्त्रीय मंच तक नहीं रही। 

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कलाकारों ने दी श्रद्धांजलि

उन्होंने सिनेमा के माध्यम से भी भारतीय शास्त्रीय नृत्य को जन-जन तक पहुंचाया। फिल्म दिल तो पागल है में उनका कोरियोग्राफ किया गया नृत्य आज भी दर्शकों के मन में ताजा है, जहां शास्त्रीयता और आधुनिकता का अद्भुत संगम देखने को मिला। देवदास में उनकी कोरियोग्राफी ने कथक को भव्यता और भावनात्मक गहराई दी, वहीं बाजीराव मस्तानी में उन्होंने कथक के शुद्ध स्वरूप को ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में जीवंत कर दिया।

फिल्म विश्व रूपम में भी उनकी रचनात्मकता और तकनीकी समझ साफ दिखाई दी, जहां कथक को नए संदर्भ में प्रस्तुत किया गया। पंडित बिरजू महाराज मानते थे कि कला कभी बंधनों में नहीं रहनी चाहिए, बल्कि समय के साथ संवाद करती रहनी चाहिए। उनके भीतर छिपी ये तमाम कलाएं (नृत्य, संगीत, तकनीकी समझ और रचनात्मक सोच) उन्हें एक संपूर्ण कलाकार बनाती थीं। 

Pandit Birju Maharaj untold world of multifaceted talent artists pay tribute and offer their respects
कथक करते आशीष सिंह। - फोटो : अमर उजाला

कथक कलाकर आशीष सिंह 'नृत्य मंजरी दास' ने बताया कि मैं अपने आप को बहुत भाग्यशाली मानता हूं कि कथक कार्यशाला के माध्यम से कथक के भगवान पद्म विभूषण पंडित बिरजू महाराज से नृत्य सीखने का शुभ अवसर प्राप्त हुआ। उनसे कथक नृत्य सीखना मेरे लिए एक सपना जैसा था। जब मैंने पहली बार बॉम्बे नेहरू सेंटर (वर्ली) 2008 में महाराज से मिला तो देखता ही रह गया।

मृदु भाषी सरल स्वभाव, व्यक्तित्व के धनी और उनका कथक को लेकर जो सौंदर्य भाव व सोच थी...वह आज भी बात करने पर ताजा लगती है। महाराजजी कथक कार्यशाला में मुझे 'बनारसी' कहकर संबोधित करते थे। उनका आशीर्वाद आज भी हमें आगे कुछ करने के लिए प्रेरित करता है। महाराजजी ने अपनी सोच व कला को आशीर्वाद स्वरूप में अपने बच्चों और शिष्यों में प्रदान किया। समय-समय पर हम लोग आगे की शिक्षा लेने की कोशिश करते हैं। 

आशीष ने कहा कि मैं उस लायक तो नहीं हूं, बस उनको देखकर जो थोड़ा-बहुत सीखा। आज उसी तालिम को बच्चों तक पहुंचाने की कोशिश कर रहा हूं।

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बिरजू महाराज को किया याद। - फोटो : संवाद

बनारस घराने की कथक नृत्यांगना सरला नारायण सिंह ने बताया कि स्व. पंडित बिरजू महाराज मेरे आदर्श हैं। वो बेहद सरल इंसान थे। वैसे तो महराजजी का नृत्य मैंने कई बार देखा है। जब मैं 10 वर्ष की थी तब पहली बार उन्हें देखा। वह बनारस आए थे और मेरे गुरुजी से कहा भी था कि इस बच्ची को दिल्ली लेकर आना, मैं इसे कथक सिखाऊंगा। पढ़ाई के कारण मैं नहीं जा पाई। 

गुरुजी के साथ बहुत ही सुखद स्मृति है। 2010 में जब वे बनारस आए थे, बीएचयू में ही ठहरे थे। मैंने कथक डांसर आशीष से कहा कि मेरी बहुत इच्छा है कि महराजजी के पांव छूकर उनका दर्शन करूं। इसके बाद बिना देर किए मुझे बुलवा लिया। गुरुजी के सामने मैं कुछ बोल ही नहीं पा रही थी। मेरी आंखें सजल थीं। उन्होंने मुझे आशीर्वाद दिया। कुछ दिनों बाद ही मैं डीपीएस काशी में कथक नृत्य की शिक्षिका के पद पर कार्यरत हुई महाराजजी को कोटि-कोटि नमन।

कथक नृत्यांगना उर्वशी श्रीवास्तव बताती हैं कि मेरी बॉडीगार्ड...'यह कह कर महाराजजी मुझे बुलाया करते थे। मैं खुद को सौभाग्यशाली मानती हूं कि मुझे उनसे आशीर्वाद, प्रेम और शिक्षा प्राप्त हुई। मेरे गुरु और मां संगीता सिन्हा के कारण मैं गुरुजी के सानिध्य में रह पाई। मुझे याद है जब सबसे पहले मैंने साढ़े तीन साल की उम्र में दिल्ली में गुरु वंदना किया था। तब से ही मुझे उनका आशीर्वाद मिलता रहा है। उनके सामने नृत्य करना मेरे लिए सौभाग्य की बात रही। हर दिन मैं उनकी स्मरण करके इसी उद्देश्य में रहती हूं कि मैं उनकी तालीम को आगे बढ़ा सकूं। महाराजजी जैसा प्रसिद्ध कलाकार होने के बाद भी वह काफी सरल थे। उनके जैसा शायद ही मैंने किसे को देखा था। बस यही सिख हमेशा मेरा साथ रहती है।

पद्मविभूषण कथक सम्राट बिरजू महाराज की शिष्या संगीता सिन्हा ने गुरुजी मुझे 'काशी-बाबू' कह कर महाराजजी मुझे बुलाया करते थे। किसी शिष्य के लिए अपने गुरु के मुंह से यह सुनना कि “संगीता तो परिवार की सदस्य है, इसके माध्यम से बनारस में मेरी सिखाई हुई कला का चिराग जलता है। 

यह बहुत सौभाग्य की बात होती है। मैं खुद को बहुत सौभाग्यशाली मानती हूं कि मुझे पंडित किशन महाराजजी ने कथक सीखने के लिए मेरे गुरु पंडित बिरजू महाराज जी के पास दिल्ली भेजा। सन 1984 में मैं महाराजजी के पास गई थी तब मैं मात्र 18 वर्ष की थी। जब मेरा उनकी क्लास में चयन हुआ था तो मैं काफी उत्साहित थी। महज 11 वर्ष बाद किसी छात्र का सीधा प्रवेश महाराज जी की क्लास में हुआ था। क्लास देख मुझे लगा मैं किसी समुंदर में आ गई हूं फिर मुझे लगा अब मुझे सही मार्गदर्शन प्राप्त होगा।

महाराजजी से मैंने मात्र तीन साल शिक्षा ली। इन वर्षों में महाराजजी से कई चीज सीखने को मिली, महाराजजी की क्लास में मेरे सारे सीनियर्स नीलिमा अजीम दी। रानी खानम दी, यह सब रहती थी और मैं सबसे छोटी, मेरा 'लय', में खूब विशेषता थी, तो जब कभी महाराज जी कठिन लय की चीजें सिखाते थे तो मुझे लय नजर आती थी। हर बार महाराजजी भी मुझे लय की चीजों में खड़ा कर देते थे। 1986 में जब महाराजजी को पद्मविभूषण मिलने वाला था तो हम सब उसके गवाह रहे हैं।

अभी नवंबर में जब हम उन्हें कलाश्रम दिल्ली मिले थे तो वह सबको यही बता रहे थे कि 'संगीता की तालीम में मैं दिखता हूं,, एक गुरु का यह कहना शिष्य को और कार्य करने की ओर प्रेरित करता है। यही कारण है कि इतने दिनों निरंत प्रयास बनारस का हर कथक सीखने वालों बच्चों को उनसे मिलवाने में मैं एक माध्यम रही हूं। ऐसे गुरु को मेरा सादर प्रणाम...।

कथक नृत्यांगना वसुंधरा शर्मा ने कहा कि पंडित बृजमोहन मिश्रा यानी बिरजू महाराज, एक ऐसे दिव्यात्म हैं, जिन्होंने संपूर्ण कथक जगत को ब्रजमंडल बना दिया। मोहन स्वरूप लिए न जाने कितने रसिकों को तार दिया। चाहे वह गुरु के रूप में ज्ञान के माध्यम से हो या कलासाधक के रूप में श्रोताओं को उस परमानंद की अनुभूति करने के माध्यम से हो।

मुझे उनका सर्वप्रथम दर्शन कथक महोत्सव में हुआ। उसके बाद मैंने कई कार्यशालाओं में भाग लिया। महाराजजी मानो भगवान कृष्ण की प्रिय बंसी की तरह थे, जो जब कभी भी बजी तो भक्तों तार दिया। आज वह प्रत्यक्ष रूप से हमारे साथ नहीं हैं, परंतु उनका लगाया हुआ कथक का वट वृक्ष संपूर्ण जगत फैला है। महाराजजी वास्तव में युग पुरुष थे। आपने इतनी आकृतियां तैयार की हैं, जिसको सदियों तक याद किया जाएगा। आप हम सभी के हृदय हमेशा रहेंगे। अंत में यही कहूंगी- बाजी रे बाजी फिर बाजी बृजश्याम सो...।

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