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संकटमोचन संगीत समारोह: अमेरिका के महेश काले के आलाप मुर्की, ठुमरी से जागे प्रभु आंजनेय; 78 मिनट दी प्रस्तुति

Fri, 10 Apr 2026 03:10 PM IST
Pragati Chand अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: Pragati Chand Updated Fri, 10 Apr 2026 03:10 PM IST
सार

संकटमोचन संगीत समारोह में अमेरिका से आए महेश काले की प्रस्तुति से महावीर भक्तों की तालियों की गड़गड़ाहट पूरे परिसर में गूंज उठी। 78 मिनट के आलाप, मुर्की और ठुमरी के बाद आंजनेय जागे। 

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Mahesh Kale from US performed at Sankat Mochan Music Festival in Varanasi
संकटमोचन संगीत समारोह - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

संकटमोचन संगीत समारोह की तीसरी निशा के बाद अमेरिका से आए महेश काले के 78 मिनट के आलाप, मुर्की और ठुमरी के बाद आंजनेय जागे। बेस्ट प्लेबैक सिंगर का राष्ट्रीय पुरस्कार पा चुके महेश काले की मुर्कियां पवनसुत की मंगला आरती शुरू होने तक चलती ही रही। वहीं मारुतिनंदन के आंगन में पहली बार गांधर्वी वीणा की गांधर्वी साज से ब्रह्म मुहूर्त की शुरुआत हुई। महावीर के आंगन में पहली हाजिरी लगाने आए कोलकाता के पंडित देवाशीष भट्टाचार्य ने 26 साल पहले स्वरचित गांधर्वी साज में राग हनुमंत से संकट मोचन की साधना की। 

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42 साल बाद बनारस में प्रस्तुति दे रहे पंडित देवाशीष ने राग हनुमंत में मल्हार कान्हड़ा को भी मिक्स करके सुनाया। आलाप जोड़, झाला सुनाते हुए विरासत की रचनाओं को संगीत के नवांकुरों के सामने रखा। तबले पर पंडित संजू सहाय ने तबले पर और बेटे ने वीणा पर संगत किया।
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पंडित देवाशीष ने कहा, जब पहली बार बनारस आया था तो बाल पके नहीं थे। 80 दशक में दादा गुरु किशन महाराज के घर आया था। दुर्गाबाड़ी में दादा के साथ पहला कॉन्सर्ट किया। इसके बाद कई बार बनारस आया मगर आज हनुमान जी से माफी चाहूंगा कि कई बार बुलाया गया और आ नहीं पाया।

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40 मिनट नीचे के सुर, फिर रुकी ही नहीं मुर्कियां

निशा की चौथी प्रस्तुति शास्त्रीय गायन की रही। सैन फ्रांसिस्को से आए और प्ले बैक सिंगिंग के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त कर चुके पंडित महेश काले ने राग रागेश्री में गायन शुरू किया। 78 मिनट की प्रस्तुति में करीब 40 मिनट तक नीचे के सुरों में ही आलाप लेते रहे। फिर बाकी के 15 मिनट का लंबा आलाप और अंत के 23 मिनट उनके आसमानी सुर और मुर्कियां ही दरबार में गूंजती रहीं और श्रोताओं पर भोर का जादू सा सवार होने लगा।

ब्रह्म मुहूर्त में ठुमरी सुनकर हर कोई संगीत की शुद्धता का एहसास कर रहा था। विलंबित झुमरा ताल की पारंपरिक बंदिशों,तराना, संत एकनाथ की रचना सुनाते हुए जब उन्होंने ऊंचे सुरों को लिया तो संकट मोचन दरबार की आध्यात्मिकता वातावरण में घुल गई। गायन का समापन ऊंचे सुर में जय सियाराम भजन से किया तो पूरा आंगन तालियों के साथ उनका संगत करने लगा। फिर महेश काले ने कहा कि विश्व के सबसे प्राचीन नगर में इतने युवा श्रोताओं के साथ ब्रह्म मुहूर्त में संकट मोचन के सामने गायन करने से अद्भुत कुछ नहीं हो सकता।

राग बसंत बुखारी में सरोद बजाकर सूर्य देव का स्वागत

तीसरी निशा की अंतिम प्रस्तुति में सरोद जुगलबंदी की रही। कोलकाता के आलोक लाहिड़ी और अभिषेक लाहिड़ी ने राग बसंत मुखारी में सरोद से साज निकाला। आलाप, जोड़ और झाला, फिर झपताल और तीन ताल में निबद्ध दो रचनाओं को बजाकर सूर्य देव का स्वागत किया। पहाड़ी धुन के साथ मीड और गमक की पेशकश कर हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के अलंकारों ये युवा संगीतकारों का परिचय कराया।
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