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25 दिन-25 कहानियां: बनारसी साड़ियां सिर्फ कपड़ा नहीं, दुल्हन का आशीर्वाद होती थीं; पढ़ें रोचक जानकारी

Sat, 23 May 2026 11:43 AM IST
Aman Vishwakarma अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: Aman Vishwakarma Updated Sat, 23 May 2026 11:43 AM IST
सार

भारतेंदु हरिश्चंद्र की पांचवीं पीढ़ी की बहू मालिनी चौधरी ने बताया कि जिस मलइयो को खाने के लिए लोग पूरे देश से आते हैं और सोशल मीडिया पर उनकी रील बनती है, उसमें अब शुद्धता नहीं है। गुणवत्ता तो कुछ गिनी चुनी दुकानों ने ही बनाकर रखी हुई है। खासकर ठठेरी बाजार से जुड़ी गलियों में। यहां की कचौड़ी हो या फिर विश्वप्रसिद्ध लस्सी और मिठाइयों का स्वाद, और कहीं नहीं मिलेगा। इस बाजार की गलियां अभी बाजारवाद की भेंट नहीं चढ़ी हैं, बल्कि यहां अब भी भरोसे और गुणवत्ता के साथ समय धीरे चल रहा है।

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Banarasi Sarees Merely Fabric Bride Blessing Read These Fascinating Insights
मालिनी चौधरी। - फोटो : संवाद

विस्तार

मैंने करीब 30 साल पहले भी बनारसी साड़ियां खरीदी थीं और आज भी खरीदी है। आज भी बाजार में देखती हूं तो महसूस करती हूं कि एक समय था जब बनारसी साड़ियां सिर्फ कपड़ा नहीं होती थीं, दुल्हन की विदाई में बनारसी साड़ी का मतलब था काशी का आशीर्वाद। लेकिन, अब शहर के बड़े चौराहों पर, हर नुक्कड़ पर और फुटपाथ पर भी बनारसी नाम बिक रहा है।

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हां वो बस नाम ही है, असली बनारसीपन नहीं। कई दुकानों में मिक्स कपड़े को प्योर सिल्क कहकर बेचा जा रहा है। बाहर से आने वाला आदमी ठगा जाता है और उसे पता तक नहीं चलता। यह देखकर दुख जरूर होता है। हां, शहर की कुछ दुकानों ने इसे आज भी बचाकर रखा है। 
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काशी में कुछ चीजें समय से लड़ना जानती हैं। ठठेरी बाजार में सर्दियों की सुबह में जब मलइयो मिट्टी के कुल्हड़ में उतरती है तो लगता है जैसे बादल को फेंटकर परोस दिया गया हो। लेकिन, अब दुकानदार धीरे से शिकायत भी करता है। असल मलइयो अब खोजनी पड़ती है। शहर बड़ा हुआ तो मिलावट भी बड़ी हो गई। जिस मलइयो को खाने के लिए लोग पूरे देश से आते हैं और सोशल मीडिया पर उनकी रील बनती है, उसमें अब शुद्धता नहीं है। 

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गुणवत्ता तो कुछ गिनी चुनी दुकानों ने ही बनाकर रखी हुई है। खासकर ठठेरी बाजार से जुड़ी गलियों में। यहां की कचौड़ी हो या फिर विश्वप्रसिद्ध लस्सी और मिठाइयों का स्वाद, और कहीं नहीं मिलेगा। इस बाजार की गलियां अभी बाजारवाद की भेंट नहीं चढ़ी हैं, बल्कि यहां अब भी भरोसे और गुणवत्ता के साथ समय धीरे चल रहा है।

काशी सुंदर हुई है, इसमें कोई शक नहीं। लेकिन हर चमक अपने साथ कुछ छाया भी लाती है। पहले लोग बैठते थे, बहस करते थे, पढ़ते थे। पान की दुकानें छोटी-छोटी यूनिवर्सिटी होती थीं। अब हर हाथ में मोबाइल है। हर दूसरा आदमी लेखक है, कवि है, विचारक है, लेकिन पढ़ने वाले कम हो गए हैं। हां, एक बदलाव हुआ है कि पहले गलियां गंदी थीं, नालियां खुली रहती थीं, भीड़ बेतरतीब थी। आज सड़कें चौड़ी हैं, घाट चमकते हैं, रात में रोशनी झिलमिलाती है। काशी बदल गई है। यह बदलाव सिर्फ सड़कों, मंदिरों और बाजारों का नहीं है। यह बदलाव शहर की आत्मा के आसपास भी हुआ है।
 

आज सोशल मीडिया पर महिला सशक्तीकरण की बातें होती हैं, लेकिन काशी की स्त्रियां तो सौ साल पहले ही अपने ढंग से मजबूत थीं। 1937 में महिलाओं को तैराकी सिखाने के लिए संस्था बनी। मीर घाट पर स्त्रियां गंगा में उतरती थीं। यह सिर्फ तैरना नहीं था, डर के खिलाफ अभ्यास था। यहां महिलाएं खुद लठैत बनकर खड़ी रहती थीं। काशी की स्त्रियां तब भी जागरूक थीं, जब देश का बड़ा हिस्सा पर्दे में था। 

भारतेंदु हरिश्चंद्र ने भी लिखा था कि स्त्री हमेशा से प्रधान रही है। हां, आज भी सुबह-सुबह अगर आप चौखंभा की तरफ निकल जाएं...किसी गली में ताजा कचौड़ी की खुशबू मिल जाए। हलवाई के हाथ में वही पुराना पीतल का बर्तन दिख जाए। गंगा किनारे कोई बिना मोबाइल निकाले सिर्फ आरती देखता मिले। तो समझ लीजिए, काशी अब भी जिंदा है।

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