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August Kranti: राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की गिरफ्तारी के विरोध में आक्रोशित हो गए थे काशीवासी
ब्यूरो,अमर उजाला,वाराणसी
Updated Sun, 09 Aug 2020 12:32 AM IST
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : अमर उजाला।
नौ अगस्त, 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन के साथ ही आक्रोशित काशीवासियों का हुजूम सड़कों पर निकलने लगा था। इस आंदोलन में पूरी काशी खुद ही उमड़ पड़ी थी। समाज के हर वर्ग द्वारा जन आंदोलन शुरू करने के कारण ही 15 अगस्त, 1947 को अंग्रेजों को भारत छोड़ना पड़ा।
आंदोलन के दौरान बापू की गिरफ्तारी के विरोध में बीएचयू के सिंह द्वार से दशाश्वमेध स्थित चितरंजन पार्क तक जुलूस निकाला गया था। जुलूस के रास्ते में रहने वाले सोनारपुरा के कमल यादव (80) उस समय पांच साल के थे। उनका कहना है कि घर के बाहर खेल रहे थे।
तभी अंग्रेजो भारत छोड़ो का नारा सुनाई देने लगा। मैं भागकर घर के अंदर चला गया। मेरे पिता, चाचा के अलावा पास पड़ोस के लोग भी गांधी टोपी पहन कर जुलूस में शामिल हो गए। यह क्रम बीएचयू से ही शुरू हो गया था, जो चितरंजन पार्क तक चला। उस समय के लोगों में आजाद होने की ललक इतनी बढ़ गई थी कि हर कोई अंग्रेजों से चिढ़ता था।
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उस समय बीएचयू के कुलपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णनन ने महात्मा गांधी सहित सभी बड़े नेताओं की गिरफ्तारी की जानकारी होने पर समाज को एकजुटता का संदेश देने के लिए जुलूस निकाला था।
यही कारण बीएचयू पहला विश्वविद्यालय था, जिसके कुलपति ने स्वयं जुलूस का नेतृत्व किया था। इस दौरान चितरंजन पार्क में सभा भी हुई थी। इसमें समाज के मानिंद लोग शामिल हुए और उन्होंने अंग्रेजों का विरोध करने का आह्वान किया था।
बीएचयू में बड़ी संख्या में गाजीपुर के छात्र पढ़ते थे। क्रांति की जो मशाल यहां जलाई गई, उसकी चिंगारी आसपास के जिलों तक पहुंच गई। यही वजह रही कि 15 अगस्त, 1942 को सैदपुर से गाजीपुर तक की मीटर गेज लाइन को क्रांतिकारियों ने उखाड़ दिया। इसकी वजह से ब्रिटिश हुकूमत का रेल परिचालन ठप हो गया था।
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आंदोलन के दौरान बापू की गिरफ्तारी के विरोध में बीएचयू के सिंह द्वार से दशाश्वमेध स्थित चितरंजन पार्क तक जुलूस निकाला गया था। जुलूस के रास्ते में रहने वाले सोनारपुरा के कमल यादव (80) उस समय पांच साल के थे। उनका कहना है कि घर के बाहर खेल रहे थे।
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तभी अंग्रेजो भारत छोड़ो का नारा सुनाई देने लगा। मैं भागकर घर के अंदर चला गया। मेरे पिता, चाचा के अलावा पास पड़ोस के लोग भी गांधी टोपी पहन कर जुलूस में शामिल हो गए। यह क्रम बीएचयू से ही शुरू हो गया था, जो चितरंजन पार्क तक चला। उस समय के लोगों में आजाद होने की ललक इतनी बढ़ गई थी कि हर कोई अंग्रेजों से चिढ़ता था।
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उस समय बीएचयू के कुलपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णनन ने महात्मा गांधी सहित सभी बड़े नेताओं की गिरफ्तारी की जानकारी होने पर समाज को एकजुटता का संदेश देने के लिए जुलूस निकाला था।
यही कारण बीएचयू पहला विश्वविद्यालय था, जिसके कुलपति ने स्वयं जुलूस का नेतृत्व किया था। इस दौरान चितरंजन पार्क में सभा भी हुई थी। इसमें समाज के मानिंद लोग शामिल हुए और उन्होंने अंग्रेजों का विरोध करने का आह्वान किया था।
बीएचयू में बड़ी संख्या में गाजीपुर के छात्र पढ़ते थे। क्रांति की जो मशाल यहां जलाई गई, उसकी चिंगारी आसपास के जिलों तक पहुंच गई। यही वजह रही कि 15 अगस्त, 1942 को सैदपुर से गाजीपुर तक की मीटर गेज लाइन को क्रांतिकारियों ने उखाड़ दिया। इसकी वजह से ब्रिटिश हुकूमत का रेल परिचालन ठप हो गया था।
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यहीं से गूंजा था ‘मारेंगे नहीं पर मानेंगे भी नहीं’
तिरंगा
- फोटो : google
जिस शहर में लोग मोक्ष के लिए आते हैं, उस शहर के लोगों में स्वतंत्रता की अद्भुत चाहत अगस्त, 1942 में दिखी थी। चेत सिंह के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (1781) से लेकर 1942, यहां तक कि 1945 तक बनारस में जो ललक और लहर देखने को मिली, वह देश के कई अन्य जगह के मुकाबले अधिक थी।
इसी दौरान काशी से ‘मारेंगे नही पर मानेंगे भी नहीं’ गूंजा था। बनारस का आंदोलन हिंसक नहीं था पर इसको मनवाना भी आता था। धर्म, कर्म में अकूत विश्वास रखने वाले काशीवासियों में स्वतंत्रता प्रेम भी उसी तरह कूट-कूटकर भरा था।
इसी दौरान काशी से ‘मारेंगे नही पर मानेंगे भी नहीं’ गूंजा था। बनारस का आंदोलन हिंसक नहीं था पर इसको मनवाना भी आता था। धर्म, कर्म में अकूत विश्वास रखने वाले काशीवासियों में स्वतंत्रता प्रेम भी उसी तरह कूट-कूटकर भरा था।