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‘उस्ताद’ को भूला शहर, गूगल बना कद्रदान
Updated Thu, 22 Mar 2018 02:35 AM IST
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वाराणसी। जिस शहनाई की सुर रश्मियां कभी काशी के घाट से विश्व के पटल पर बिखर गई थीं, जिस फनकार ने गंगा जमुनी रवायत को धर्म मजहब से ऊपर ला खड़ा किया था, उसी भारतरत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां को काशी के लोग बिसरा बैठे। उनकी 102वीं जयंती पर शहर में कार्यक्रम तो हुए लेकिन अफसोस यह कि जिस ओहदे के वो हकदार हैं उसके कद्रदान काशी में नहीं दिखे। हालांकि इंटरनेट की इस दुनिया में गूगल ने उस्ताद को पूरा सम्मान दिया। डूडल के जरिये उसने उस्ताद को श्रद्धांजलि दी और उन्हें याद किया।
भारतरत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की 102वीं जयंती पर बुधवार को दरगाह-ए-फातमान स्थित उनकी मजार पर उनके चाहने वालों ने उन्हें श्रद्धांजलि पेश की। भारत रत्न होने के चलते उस्ताद को खिराजे अकीदत पेश करने के लिए डीएम योगेश्वर राम मिश्र और एसएसपी आरके भारद्वाज पहुंचे। संस्कृति विभाग के सचिव डॉ. यशवंत सिंह ने भी उनकी मजार पर अकीदत के फूल चढ़ाकर उन्हें याद किया।
अब्बास मुर्तजा शमसी ने कुरान शरीफ का पाठ किया तो नौ साल की उम्र से उस्ताद के फन के दीवाने दिल्ली से आए नरेंद्र कुमार गुप्ता ने सुंदर कांड और हनुमान चालीसा का पाठ कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। इस मौके पर उस्ताद के बेटे नाजिम हुसैन, अली अब्बास, नासिर अब्बास, बेटी जरीना बेगम समेत उनके परपोते और परपोतियां अपने ‘दादा अब्बा’ को खिराजे अकीदत पेश करने पहुंची थीं। लेकिन संगीत और संस्कृति कर्मियों के शहर में उनकी याद में अपेक्षा के अनुरूप आयोजन नहीं हुए।
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भारतरत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की 102वीं जयंती पर बुधवार को दरगाह-ए-फातमान स्थित उनकी मजार पर उनके चाहने वालों ने उन्हें श्रद्धांजलि पेश की। भारत रत्न होने के चलते उस्ताद को खिराजे अकीदत पेश करने के लिए डीएम योगेश्वर राम मिश्र और एसएसपी आरके भारद्वाज पहुंचे। संस्कृति विभाग के सचिव डॉ. यशवंत सिंह ने भी उनकी मजार पर अकीदत के फूल चढ़ाकर उन्हें याद किया।
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अब्बास मुर्तजा शमसी ने कुरान शरीफ का पाठ किया तो नौ साल की उम्र से उस्ताद के फन के दीवाने दिल्ली से आए नरेंद्र कुमार गुप्ता ने सुंदर कांड और हनुमान चालीसा का पाठ कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। इस मौके पर उस्ताद के बेटे नाजिम हुसैन, अली अब्बास, नासिर अब्बास, बेटी जरीना बेगम समेत उनके परपोते और परपोतियां अपने ‘दादा अब्बा’ को खिराजे अकीदत पेश करने पहुंची थीं। लेकिन संगीत और संस्कृति कर्मियों के शहर में उनकी याद में अपेक्षा के अनुरूप आयोजन नहीं हुए।
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