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यूपी में घरों और दुकान में चला दिए विश्वविद्यालय

Mon, 29 Apr 2013 12:55 PM IST
अंकुर तिवारी/लखनऊ
अंकुर तिवारी/लखनऊ Updated Mon, 29 Apr 2013 12:55 PM IST
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UP Universities are functioning in houses and shops

उत्तर प्रदेश में फर्जी विश्वविद्यालयों की जांच में कई चौंकाने वाले तथ्यों का खुलासा हुआ है। कहीं दुकान में तो कहीं निजी आवास में विश्वविद्यालय चलाए जा रहे थे।

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विशेष अनुसंधान शाखा (एसआईटी) की जांच में प्रदेश में नौ फर्जी विश्वविद्यालयों में महज दो संचालित मिले हैं।

शेष विश्वविद्यालयों में कहीं बेकरी की दुकान खुल गई तो कहीं मकान बन गया है या वह स्थान खंडहर हो गया है।

तो वाराणसी के वाराणसी संस्कृत विश्वविद्यालय को लेकर एसआईटी भी संशय में है कि यह संचालित है या नहीं।
गौरतलब है कि इन सभी विश्वविद्यालयों ने फर्जीवाड़ा कर खुद को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) से संबद्ध दिखा रखा था।

एसआईटी की पड़ताल में सामने आया कि फर्जी विश्वविद्यालयों के नाम पर पहले से ही कई एफआईआर दर्ज हैं।

कुछेक को छोड़कर ज्यादातर मामलों में पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ कोर्ट में आरोप पत्र भी दाखिल कर दिए हैं, जो विचाराधीन हैं। एक संस्थान के खिलाफ उत्तर प्रदेश में ही नहीं मुंबई के ठाणे में भी मामला दर्ज हैं।
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इलाहाबाद में गांधी विद्यापीठ, प्रयाग के नाम से विश्वविद्यालय संचालित करने वाले डॉ. अंसारी और उनके पूरे परिवार के खिलाफ पुलिस ने गैंगस्टर एक्ट लगाया है।
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राजधानी में संचालित फर्जी विवि इंडियन एजूकेशनल कौंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश के खिलाफ गोमतीनगर थाना में वर्ष 1997 व 1998 में धोखाधड़ी, अमानत में खयानत, जालसाजी व यूजीसी एक्ट के तहत मामला दर्ज है, जिनमें आरोप पत्र कोर्ट में विचाराधीन है।

यही नहीं एसआईटी की जांच में यह भी पता चला कि इस संस्था के खिलाफ गाजीपुर और मुंबई के ठाणे में मामला दर्ज है।

दोनों मामलों में आरोप पत्र दाखिल हो चुके हैं। हालांकि जांच में यह संस्था संचालित मिली।

ये हैं फर्जी विश्वविद्यालय-
1. इंडियन एजूकेशनल कौंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश, लखनऊ
2. नेशनल यूनिवर्सिटी इलेक्ट्रो काम्प्लेक्स होम्योपैथी, कानपुर
3. गांधी विद्यापीठ प्रयाग, इलाहाबाद
4. महिला ग्राम विद्यापीठ विश्वविद्यालय, प्रयाग, इलाहाबाद
5. वाराणसी संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी
6. नेताजी सुभाषचंद्र बोस यूनीवर्सिटी, अचलताल, अलीगढ़
7. उत्तर प्रदेश विश्वविद्यालय, कोसीकलां, मथुरा
8. गुरुकुल विश्वविद्यालय, वृंदावन, मथुरा
9. महाराणा प्रताप शिक्षा निकेतन, प्रतापगढ़

वाराणसी संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी:

इस संस्था के बारे में पड़ताल करने निकली एसआईटी खुद चकरा गई। संस्था का पता वाराणसी का था लेकिन यह संचालित डीपी त्रिपाठी बी 34 जगतपुरी दिल्ली-51 पोस्ट बॉक्स नंबर-9424, कृष्णानगर दिल्ली-51 के पते से हो रही थी।

एसआईटी ने जिलाधिकारी वाराणसी से इस संस्था के वाराणसी से संचालित होने की जानकारी मांगी लेकिन मिली नहीं। संस्था के बारे में किसी तरह का मुकदमा दर्ज होने की भी जानकारी नहीं मिली है।

इस संस्था के संबंध में एसआईटी ने दिल्ली पुलिस के आयुक्त से भी मदद मांगी है। यह संस्था उत्तर प्रदेश शासन द्वारा संचालित संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के नाम की आड़ लेकर शुरू की गई थी लेकिन सरकार द्वारा संचालित विश्वविद्यालय का नाम 16 दिसंबर 1974 में ही बदलकर संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी कर दिया गया था।

एसआईटी को इस फर्जी संस्था के बारे में जानकारी यूजीसी के जरिए मिली थी। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड इंजीनियरिंग, नई दिल्ली की जांच के दौरान इस संस्था का नाम सामने आया था।

नेशनल यूनिवर्सिटी इलेक्ट्रो कॉम्प्लेक्स होम्योपैथी, कानपुर:
इस संस्था को डॉ एलएन सिन्हा संचालित करते थे। सीएमओ कानपुर ने 20 नवंबर 2006 में इसे सीज कर दिया था। बाद में डॉ. एलएन सिन्हा की पत्नी सुतापा ने कोर्ट में शपथपत्र दाखिल कर परिसर को खोलने का अनुरोध किया था।

साथ ही कहा था कि परिसर में किसी तरह की अवैध गतिविधियां संचालित नहीं की जाएंगी। एसआईटी ने मौके पर जांच की तो पाया कि परिसर बंद पड़ा है और वहां संस्थान से जुड़ी किसी तरह की गतिविधि संचालित नहीं हो रही है।

गांधी विद्यापीठ प्रयाग, इलाहाबाद :
एसआईटी को जांच में यह संस्था बंद मिली। डॉ. एमएफ अंसारी ने अपने घर पर यह संस्था खोली थी। वर्ष 1997 में उनकी मौत हो गई।

वर्ष 2010 में संस्था के खिलाफ इलाहाबाद कोतवाली में धोखाधड़ी का मामला दर्ज हुआ था, जिसमें 24 फरवरी 2011 को अंतिम रिपोर्ट कोर्ट में दाखिल कर दी गई।

संस्था के खिलाफ एक और मुकदमा शाहगंज में भी दर्ज है। इसमें डॉ. अंसारी और उनके परिवार पर उत्तर प्रदेश गैंगस्टर एक्ट के तहत भी कार्रवाई हुई, जो इलाहाबाद की गैंगस्टर कोर्ट में विचाराधीन है।

महिला ग्राम विद्यापीठ विश्वविद्यालय, प्रयाग, इलाहाबाद :
संगम लाल अग्रवाल द्वारा शुरू की गई यह संस्था वर्ष 1978 में उनकी मौत के बाद बेटे श्रीकृष्ण अग्रवाल ने संचालित की। वर्ष 1998 में श्रीकृष्ण की भी मौत हो गई।

संस्था के खिलाफ इलाहाबाद कोतवाली में वर्ष 2010 में धोखाधड़ी का मामला दर्ज हुआ था, जिसमें फाइनल रिपोर्ट लगा दी गई है।

इलाहाबाद के सम्मेलन मार्ग स्थित जिस मकान नंबर-21 में यह संस्था संचालित होती थी वहां अब श्रीकृष्ण के बेटे एडवोकेट सुशील अग्रवाल रहते हैं। एसआईटी को मकान में संस्था का कोई बोर्ड लगा नहीं मिला।

नेताजी सुभाषचंद्र बोस यूनिवर्सिटी (ओपन यूनिवर्सिटी) अचलताल, अलीगढ़ :
इस संस्था को तलाशने निकली एसआईटी जब बताए गए पते पर पहुंची तो देखा कि वहां महाराजा खाद्य पदार्थ (कंफेक्शनरी व बेकरी) की दुकान चल रही है।

जानकारी की तो पता चला कि अचलताल स्थित गिलहराज मंदिर के सामने इस संस्था की शुरुआत श्याम सुंदर शर्मा ने की थी।

9 जनवरी 1990 में गांधीपार्क थाना में संस्था के खिलाफ जालसाजी, धोखाधड़ी और यूजीसी एक्ट के तहत मामला दर्ज हुआ था। इसमें आरोपपत्र कोर्ट में दाखिल हो चुका है और एसीजेएम तृतीय अलीगढ़ के यहां विचाराधीन है।

उत्तर प्रदेश विश्वविद्यालय, कोसीकलां, मथुरा :
दिल्ली के मुकेश जैन ने मथुरा के मनीराम बाग में वासुदेव गुप्ता के मकान नंबर-483 को किराए पर लेकर और उत्तर प्रदेश विश्वविद्यालय का बोर्ड लगाकर इस संस्था की शुरुआत की थी।

इस फर्जीवाड़े की रिपोर्ट मथुरा के कोसीकलां थाने में दर्ज कराई गई। 21 जून 2008 को इस मामले में फाइनल रिपोर्ट दाखिल कर दी गई। छाता में जुडीशियल मजिस्ट्रेट के यहां विचाराधीन है। एसआईटी इस संस्था के बारे में जानकारी करने पहुंची तो उसे वहां खंडहर मिला।

गुरुकुल विश्वविद्यालय, वृंदावन, मथुरा :
यह संस्था अभी भी विश्वविद्यालय शब्द का इस्तेमाल कर संचालित हो रही है। इसके खिलाफ रिटायर न्यायमूर्ति शैलेंद्र सक्सेना ने वर्ष 2008 में वृंदावन कोतवाली में जालसाजी और धोखाधड़ी का मामला दर्ज कराया था।


हालांकि साक्ष्य के अभाव के चलते 19 अगस्त 2008 को इस मामले में फाइनल रिपोर्ट लगा दी गई। जो सीजेएम मथुरा के यहां विचाराधीन है। एसआईटी को इस संस्था के बारे में और भी कई अहम जानकारियां मिली हैं, जिन्हें जांचा जा रहा है।

एसआईटी ने संस्था द्वारा विश्वविद्यालय शब्द का प्रयोग न करने के लिए मीराबाई मार्ग स्थित आर्य प्रतिनिधि सभा से पत्राचार किया है।

महाराणा प्रताप शिक्षा निकेतन, प्रतापगढ़ :
यह संस्था भी अस्तित्व में नहीं मिली है। प्रतापगढ़ के कंधई स्थित परानपुर निवासी रामकृपाल उपाध्याय ने संस्था की शुरुआत वर्ष 1998 से पहले की थी।

इसके खिलाफ कंधई थाने में अमानत में खयानत, जालसाजी का मामला दर्ज हुआ था, जो सीजेएम प्रतापगढ़ के यहां विचाराधीन है।

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