{"_id":"7a61fe5c-5ad0-11e2-9941-d4ae52bc57c2","slug":"up-governor-approved-reservation-in-promotion-amendment-bill","type":"story","status":"publish","title_hn":"उत्तर प्रदेश में खत्म हुआ प्रमोशन में आरक्षण ","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
उत्तर प्रदेश में खत्म हुआ प्रमोशन में आरक्षण
लखनऊ/ब्यूरो
Updated Thu, 10 Jan 2013 11:30 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
उत्तर प्रदेश में सरकारी नौकरियों में प्रमोशन में आरक्षण खत्म करने संबंधी विधेयक को राज्यपाल बीएल जोशी ने मंजूरी दे दी है। इसके बाद उत्तर प्रदेश लोक सेवा (अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण) (संशोधन) विधेयक अब अधिनियम (एक्ट) बन गया है।
विज्ञापन
चूंकि सरकार ने विधानमंडल की मंजूरी लेकर प्रमोशन में आरक्षण के प्रावधान वाली उपधारा-सात को निकाल दिया है और इस प्रावधान को राज्यपाल ने मंजूरी दे दी। इस उपधारा के तहत ही प्रदेश में सरकारी नौकरियों प्रमोशन में आरक्षण की व्यवस्था की गई थी।
विज्ञापन
विदित हो प्रमोशन में आरक्षण का प्रावधान खत्म करने के फैसले पर बसपा सख्त एतराज जताती रही है। उधर, सपा सरकार ने प्रमोशन में आरक्षण तो खत्म कर दिया लेकिन अभी तक प्रोन्नत हो चुके कार्मिकों को रिवर्ट करने का फैसला नहीं कर पाई है। सरकार ने इस पर विधिक राय ली है लेकिन अभी तक कोई फैसला नहीं हो पाया है।
विज्ञापन
प्रमोशन में आरक्षण और परिणामी ज्येष्ठता का लाभ खत्म करने के लिए सपा सरकार ने उप्र लोकसेवा (अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण) (संशोधन) विधेयक-2012 को पिछले साल दिसंबर में विधानमंडल से पास कराकर राज्यपाल को मंजूरी के लिए भेजा था।
प्रदेश सरकार का ने यह विधेयक केंद्र सरकार द्वारा प्रमोशन में आरक्षण विधेयक लाने के बाद लाया था। गौरतलब है संसद के पिछले सत्र में केंद्र सरकार ने राज्य सभा में प्रमोशन में आरक्षण विधेयक पारित कराया था। सपा के विरोध के कारण लोकसभा में यह विधेयक पेश नहीं हो पाया था।
अब उत्तर प्रदेश विधानमंडल ने प्रमोशन में आरक्षण की व्यवस्था खत्म कर दी है जबकि देश की संसद विधेयक पर मोहर लगा चुकी है। ऐसे में सवाल उठना लाजमी हो गया है कि क्या ये दोनों संस्थाएं एक दूसरे को चुनौती दे रही है? संसद में जो विधेयक पारित हो चुका है, क्या विधान सभा में उसका विरोध ठीक है?
इस बारे में आपनी राय बताएं-