बगावत का असर: 20 फीसदी से भी कम कटा भाजपा विधायकों का टिकट, पश्चिम में सपा-आरएलडी से कड़ी टक्कर
भाजपा के एक वरिष्ठ नेता यह मानते हैं कि यह अफवाह उड़ाई जा रही है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा की लड़ाई कमजोर पड़ रही है और जाट समुदाय का वोट बैंक उससे पूरी तरह से खिसक गया है। उन्होंने कहा कि यह पूरी तरह सही नहीं है। किसान आंदोलन के कारण एक बेहद सीमित क्षेत्र में ही असर हुआ है और अधिकांश जाट मतदाता आज भी उसके साथ हैं...
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तीन मंत्रियों सहित आठ विधायकों की बगावत का असर भाजपा के टिकटों पर साफ दिखाई पड़ रहा है। कभी लगभग आधे उम्मीदवारों को बदलकर पश्चिम के कठिन मोर्चे की लड़ाई को जीतने की रणनीति बना रही भाजपा 107 घोषित टिकटों में से केवल 20 उम्मीदवारों के टिकट काटने की हिम्मत जुटा पाई और उसने अपने ज्यादातर पुराने उम्मीदवारों को ही टिकट थमाया। इस तरह भाजपा के कुल 312 विधायकों में लगभग 50 से 60 टिकट कट सकते हैं। पश्चिम में श्रीकांत शर्मा, अतुल गर्ग, पंकज सिंह, सुनील शर्मा, मृगांका सिंह और सुरेश राणा जैसे भाजपा के पुराने उम्मीदवार पार्टी की तरफ से इस चुनाव में दुबारा ताल ठोकते नजर आएंगे।
दरअसल, किसानों के आंदोलन के कारण पश्चिम का क्षेत्र भाजपा के लिए सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण माना जा रहा था। रही सही कसर समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल के गठबंधन ने पूरी कर दी थी। माना जा रहा है कि जाट-मुस्लिम एकता की तस्वीर इस चुनाव में एक बार फिर से उभर सकती है और अखिलेश यादव-जयंत चौधरी की जोड़ी इस क्षेत्र में मजबूती के साथ चुनाव लड़ती हुई दिखाई पड़ सकती है।
पश्चिम का किला जीतने की रणनीति
इस चुनौती के बीच भाजपा ने अपने उम्मीदवारों के टिकट काटकर नए चेहरों के सहारे पश्चिम का किला जीतने की रणनीति बनाई है। इस राजनीति के सूत्रधार भाजपा के सबसे सफल चुनावी रणनीतिकार अमित शाह बताए जाते हैं जो पूर्व में कई बार उम्मीदवारों को बदलकर कठिन चुनाव जीतते रहे हैं। उन्हें इस समय पश्चिमी मोर्चे पर ही लगाया गया है। लेकिन मंत्रियों और विधायकों की भगदड़ ने पार्टी को अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर दिया।
पार्टी को इस बात की आशंका हो गई कि यदि वह ज्यादा टिकट काटने की रणनीति अपनाती है तो उसे अपने ही विधायकों की कड़ी नाराजगी झेलनी पड़ सकती है। इससे पार्टी की चुनावी संभावनाओं को गहरी चोट पहुंच सकती है। यहीं कारण है कि भाजपा ने अपनी रणनीति पर पुनर्विचार किया और ज्यादातर पुराने चेहरों को ही मैदान में उतार दिया।
हालांकि, भाजपा के एक वरिष्ठ नेता यह मानते हैं कि यह अफवाह उड़ाई जा रही है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा की लड़ाई कमजोर पड़ रही है और जाट समुदाय का वोट बैंक उससे पूरी तरह से खिसक गया है। उन्होंने कहा कि यह पूरी तरह सही नहीं है। किसान आंदोलन के कारण एक बेहद सीमित क्षेत्र में ही असर हुआ है और अधिकांश जाट मतदाता आज भी उसके साथ हैं और मतदान के बाद चुनाव परिणामों में यह नजर भी आ जाएगा।
ओबीसी और दलितों को किया आगे
मंत्रियों और विधायकों ने भाजपा छोड़ते समय उस पर यही आरोप लगाया था कि वह दलितों और पिछड़ों को भागीदारी देने में सही भूमिका नहीं निभा रही है। स्वामी प्रसाद मौर्या जैसे नेताओं का आरोप था कि भाजपा सरकार में ओबीसी और दलित समुदाय के हितों के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। भाजपा ने इसका जवाब अपने उम्मीदवारों की लिस्ट से ही दिया है। पार्टी ने पहली और दूसरी लिस्ट में 44 ओबीसी और 19 एससी उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है। इस प्रकार 63 ओबीसी और दलित उम्मीदवारों के सामने आने के बाद बागी नेताओं के दावे कमजोर हो गए हैं।
भाजपा ने 68 फीसदी टिकट पिछड़े दलित और महिलाओं को दिए हैं। 10 महिला उम्मीदवारों को अपनी किस्मत आजमाने का मौका मिला है। पहले चरण के 58 में 57 और दूसरे चरण के 55 में 48 उम्मीदवारों को टिकट दिया गया है। 83 सीटों में 63 वर्तमान विधायक हैं जबकि 20 की जगह नए उम्मीदवारों को मौका दिया गया है।
नहीं बचेगी जमीन
आरएलडी के राष्ट्रीय महासचिव तारिक मुस्तफा ने अमर उजाला से कहा कि भाजपा अपनी खोई जमीन बचाने के लिए भरपूर कोशिश कर रही है। विधायकों की भगदड़ से बचने के लिए उसने वर्तमान विधायकों को ही मैदान में उतार दिया है लेकिन उनके खिलाफ पहले से ही भारी जनाक्रोश है। उन्होंने दावा किया है कि भाजपा चाहे जो भी रणनीति अपना ले, उसे इस बार जीत नहीं मिलेगी।