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संगम की रेती पर धूनी रमाएंगे तेरह अखाड़े
इलाहाबाद/अनिल सिद्धार्थ
Updated Fri, 04 Jan 2013 09:07 AM IST
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कुंभ मेले में देश और दुनिया भर के श्रद्धालुओं का समाज, रेती पर बसे तंबुओं की नगरी में सिमट आया है। अखाड़ों की मौजूदगी मेले को विशिष्टता प्रदान कर रही है। अखाड़े कुंभ मेले के सिरमौर माने जाते हैं। कुंभ मेले में तेरह अखाड़ों के साधु-संत और महंत रेती पर धूनी रमाएंगे। बसंत पंचमी के शाही स्नानपर्व के बाद ये अखाड़े और इनके साधु-संत भी संगम नगरी से विदा ले लेंगे।
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इस समय संगम की रेती पर विश्व का सबसे बड़ा कुंभ मेला आकार ले रहा है। कुंभ पर्व पर तंबुओं की नगरी बसेगी और करोड़ों श्रद्धालु पुण्य की कामना से गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम में डुबकी लगाएंगे। कुंभ पर्व की मान्यता पौराणिक और ज्योतिषीय आकलन पर आधारित है। मान्यता के मुताबिक लोक कल्याण के लिए देव और दानवों के बीच आपसी सहमति से समुद्र मंथन किया गया था। इस दौरान चौदह रत्नों की प्राप्ति हुई थी, जिसमें से आयुवर्धिनी शक्ति वाले अमृत के कुंभ को लेकर, आयुर्वेद के अधिष्ठाता भगवान धनवंतरि स्वयं अवतरित हुए थे।
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जहां छलकीं अमृत की बूंदे, वहीं बना कुंभ
‘अमृत कुंभ’ की मान्यता है कि उसे पाने के लिए देवताओं और असुरों में महासंग्राम हुआ। देवताओं ने दैत्यों से छिपाने के लिए देवराज इंद्र के पुत्र जयंत को ‘अमृत कुंभ’ की रक्षा की जिम्मेदारी सौंपी। इस दायित्व को पूरा करने में सूर्य, चंद्र, बृहस्पति और शनि भी सहयोगी बने। दैत्यों ने उसे पाने के लिए तीनों लोकों में जयंत का पीछा किया। पुराणों के मुताबिक ‘अमृत कुंभ’ की रक्षा के क्रम में विश्राम के दौरान जयंत ने उसे मायापुरी-हरिद्वार, प्रयाग-इलाहाबाद, गोदावरी तट पर नासिक और क्षिप्रा के तट पर अवंतिका-उज्जैन में रखा था। परिक्रमा के क्रम में इन चारों ही स्थानों पर अमृत की बूंदें छलकीं और ये स्थान कुंभ क्षेत्र बने।
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बृहस्पति के संचरण से बनती है कुंभ की स्थिति
पौराणिक मान्यताओं से इतर ज्योतिषीय गणना के मुताबिक जब प्रयाग में माघ मास की अमावस्या को देवगुरु बृहस्पति का वृष राशि से संचरण होता है, तब कुंभ महापर्व होता है। ऐसी ग्रहीय स्थिति प्रत्येक बारहवें वर्ष बनती है। मान्यता के मुताबिक चंद्रमा, बृहस्पति और सूर्य के कोणात्मक संबंध के दौरान पृथ्वी के इस भूभाग पर अमृत की वर्षा होती है।
चौदह सेक्टर में बसेगा तंबुओं का शहर
तकरीबन एक करोड़ 99 लाख वर्ग मीटर और चौदह सेक्टरों में बसने वाली तंबुओं की नगरी में कुंभ मेला प्रशासन की ओर से मेले के दौरान बिजली, पानी, संचार, सफाई, चिकित्सा सहित अन्य सुविधाएं मुहैया कराई जाएंगी। अधिकतर कल्पवासी तीर्थपुरोहितों के शिविरों में ही रहते हैं।
अद्भुत, अतुलनीय समागम
संगम की रेती पर लगने वाला कुंभ मेला अनेक मायनों में अद्भुत और अतुलनीय है। इस पर बसने वाली तंबुओं की नगरी में देश और दुनिया से अनेक मत-मतांतर, भाषा-भाषी, रीति-रिवाज, संस्कार, प्रथा-परंपरा के श्रद्धालु पुण्य और मोक्ष की कामना से जुटते और संगम में डुबकी लगाते हैं।
शिविरों में होंगे धार्मिक कार्यक्रम
सामान्य श्रद्धालुओं से अलग बीतरागियों, साधु-महात्माओं, संन्यासियों, मठाधीशों और शंकराचार्यों की मौजूदगी मेले को गरिमा देती है। महामंडलेश्वरों, संत-महात्माओं के अतिरिक्त अनेक कथावाचकों, मनीषियों के शिविरों में कथा, कीर्तन, प्रवचन आदि के कार्यक्रम होंगे। कई शिविरों में रामलीलाएं, रासलीलाएं भी होंगी।
प्रमुख स्नानपर्व
:- मकर संक्रांति - 14 जनवरी (यह प्रथम शाही स्नानपर्व है)
:- पौष पूर्णिमा - 27 जनवरी
:- मौनी अमावस्या - 10 फरवरी (दूसरा शाही स्नानपर्व)
:- बसंत पंचमी - 15 फरवरी (तीसरा शाही स्नानपर्व)
:- माघ पूर्णिमा - 25 फरवरी
:- महाशिवरात्रि - 10 मार्च (शाही स्नानपर्वों पर अखाड़ों के साधु-संन्यासी भी संगम में डुबकी लगाएंगे)