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जाति की दुहाई, हाशिए पर मुद्दे

Fri, 10 Feb 2017 11:08 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो, प्रतापगढ़
अमर उजाला ब्यूरो, प्रतापगढ़ Updated Fri, 10 Feb 2017 11:08 PM IST
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only cast factor in election
UP Election 2017: 302 millionaires are contesting in the first phase
विधानसभा चुनाव मैदान में कूदे प्रत्याशियों के साथ ही उनके नेता भी खुलेआम जातियों की दुहाई देने लगे हैं। जातीय समीकरण अपने पक्ष में करने के लिए मुद्दे भूला दिए गए हैं। बुनियादी जरूरतों के साथ ही तकनीकी शिक्षा और विकास की बातें चुनाव में गायब हो गई हैं।
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शिक्षा : बेल्हा को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान देने वाले सांसद, मंत्री जिले के लोगों को ऐसा कुछ नहीं दे सके जिससे लोग अपना जीवन स्तर सुधार सकें। अगर स्व. मुनीश्वरदत्त उपाध्याय ने बेल्हा में जन्म न लिया होता और इंटर व डिग्री कॉलेजों का जाल न बिछाया होता तो लोगों को हाईस्कूल, इंटर, बीए, एमए करने के लिए पापड़ बेलने पड़ते। कई जनप्रतिनिधियों ने वायदे तो बहुत किए लेकिन किसी भी प्रकार के टेक्निकल शिक्षा की व्यवस्था जिले में नहीं हो पा रही है।
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स्वास्थ्य : जिले में सरकारी सेवाएं दम तोड़ रही हैं। ग्रामीण अंचलों में सरकारी अस्पतालों में तैनात डॉक्टर या तो अस्पताल आते ही नहीं या फिर खुलेआम प्राइवेट प्रैक्टिस कर गरीब जनता को चूस रहे हैं। हर काम के लिए खुलेआम पैसे लिए जा रहे हैं। जिला अस्पताल में आपरेशन, प्लास्टर तो बिना सुविधा शुल्क दिए होने की कल्पना नहीं की जा सकती। सामान्य जांच के लिए बाहर जाना पड़ता है। रेडियोलाजिस्ट की तैनाती के बाद अल्ट्रासाउंड नहीं हो रहा है। पीएचसी और सीएचसी का भगवान ही मालिक। रात तो दूर वहां पर दिन में भी डॉक्टर नहीं मिलते। प्राइवेट अस्पताल भी जिले में स्तरीय नहीं हैं। ऐसे में लोगों को इलाज के लिए इलाहाबाद या फिर लखनऊ जाना पड़ता है।
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पेयजल : जिला मुख्यालय सहित कई इलाकों में पेयजल का अभाव बना हुआ है। सरकारी जलापूर्ति शहर के लोगों को पानी के साथ नालियों का कीचड़ भी देती है। शहर में आज भी कार्यालयों, दुकानों के साथ ही लोगों को घरों में भी पानी खरीदकर पीना पड़ रहा है। पेयजल के लिए जो भी टंकियां बनीं वह लोगों को शुद्ध पानी नहीं मुहैया करा सकीं। ग्रामीण इलाकों में भी कहीं खारा पानी तो कहीं वाटर लेबल बहुत नीचे होने की समस्या है। कुछ जगहों पर टंकियां भी बनीं लेकिन उनमें से अधिकांश पानी नहीं दे रही हैं। जिले के 60 से अधिक गांव के लोग फ्लोराइड युक्त पानी पीने को मजबूर हैं।

बिजली : ग्रामीण इलाकों में एक सप्ताह दिन तो एक सप्ताह रात का रोस्टर होता है। अगर ग्रामीण इलाकों का ट्रांसफार्मर जल जाता है तो चिलबिला स्थित बिजली विभाग के स्टोर में उन्हें ट्रांसफार्मर देने के लिए बोली लगती है। पैसे की व्यवस्था न होने पर उन्हें महीनों चक्कर काटना पड़ता है। गर्मी में बिजली की अघोषित व घोषित कटौती नागरिकों की नींद हराम कर देती है।

सड़क : कुछ सड़कों को छोड़ दिया जाए तो शहर से गुजरा हाईवे भी अपने हाल पर आंसू बहा रहा है। लालगंज और कुंडा तहसीलों को जाने वाली सड़कें बारिश के बाद से ही कई स्थानों पर तालाब बन जाती हैं। पीएमजीएसवाई की सड़कों की सबसे अधिक दुर्दशा बेल्हा में है। कई और सड़कों पर भी चलना मुश्किल हो रहा है। यह समस्या भी नेताओं की प्राथमिकता में नहीं दिख रही है।

बाईपास-ओवरब्रिज : शहर से सटे चिलबिला के ओवरब्रिज का रोना जिले के लोग एक दशक से रो रहे हैं। सालों से नेता इसका सपना दिखा रहे हैं। वर्ष 2004 में जीते सांसद ने इसे स्वीकृत कराने का दावा किया था, लेकिन रेलवे लाइन के ऊपर का पुल उनके पंचवर्षीय कार्यकाल में पूरा हुआ। अभी भी क्रॉसिंग के ऊपर पुल जोड़ा नहीं जा सका और अप्रोच मार्ग भी बनकर तैयार नहीं हो सका। रुपये न मिलने के कारण कार्यदायी संस्था ने काम रोक दिया है। इलाहाबाद-फैजाबाद हाईवे शहर को बीच से चीरते हुए निकलता है। ऐसे में लोगों को हर रोज जाम से जूझना पड़ता है। आसपास के जिलों में शहर के बाहर से बाईपास बन गया लेकिन बेल्हा अभी तक तरस रहा है।


सुरक्षा : जिले में कानून व्यवस्था की हालत बेहद खराब है। जिले में सीओ व इंस्पेकटर की हत्या हो चुकी है।  सामान्य आदमी के साथ खुलेआम दबंगई हो रही है। लूट, हत्या, बलात्कार की घटनाओं से आम आदमी सहमा है। गरीब को इंसाफ नहीं मिल पा रहा है। यहां तक कि पुलिस की प्रताड़ना से लोगों को आत्मदाह के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। भूमाफिया भी गरीबों का जीना मुश्किल कर दिए हैं। किसी दल के नेता के भाषण में ज्यादती, मनमानी और दबंगई करने वालों का जिक्र नहीं होता।
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