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चंद यादें लिए सिसक रही हरिवंश राय की जन्मस्थली

Mon, 18 Jul 2016 12:33 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो प्रतापगढ़
अमर उजाला ब्यूरो प्रतापगढ़ Updated Mon, 18 Jul 2016 12:33 AM IST
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mudda belha ki virasat ka 15
mudda belha ki virasat ka
सदी के महानायक अभिताभ बच्चन और उनके पिता प्रसिद्ध कवि और साहित्यकार हरिवंश राय बच्चन को शासन की तरफ से उनके पैतृक गांव में ही वह सम्मान नहीं मिल सका जिसके वे हकदार हैं। रानीगंज तहसील के बाबूपट्टी गांव में प्रख्यात कवि की स्मृतियों को सहेजा नहीं जा सका। उनकी याद में जैसे-तैसे पुस्तकालय तो बन गया, लेकिन उसमें पुस्तकें ही नहीं रखी जा सकीं। हालांकि बिग बी का परिवार अब इस गांव में नहीं आता है, लेकिन हरिवंश राय बच्चन से जुड़ी यादें अभी लोगों के जेहन में ताजा हैं।
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बाबूपट्टी गांव अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। अपनी कालजयी रचनाओं से देश के महान कवियों में शुमार डा.हरिवंश राय बच्चन की जन्मस्थली महज उनकी चंद यादों के बीच सिसक रही है। सरकारी उपेक्षा का दंश झेल रहा यह गांव डा.बच्चन के यादों को खोता जा रहा है। इस विरासत को संवारने के लिए प्रशासनिक वादों की झड़ी तो लगाई गई, लेकिन हालत जस के तस बने हुए हैं।
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मधुशाला, मधुकलश, क्या भूलूं क्या याद करूं, दो चट्टान जैसी कालजयी कृतियों के रचयिता डा.हरिवंश राय बच्चन किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं। लेकिन उनकी जन्मभूमि सरकारी उपेक्षा के चलते महज चंद यादें समेटे बैठी है। रानीगंज तहसील क्षेत्र से 5 किमी दक्षिण बाबूपट्टी गांव में 27 नवंबर 1907 को डा.हरिवंश राय बच्चन का जन्म हुआ था। इन्होंने प्रारंभिक शिक्षा गांव से ही प्राप्त की थी। इसके बाद वे पढ़ाई के लिए इलाहाबाद चले गए। वहां पढ़ाई के दौरान काव्य रचनाओं से अपनी एक अलग पहचान बनाई। पहली पत्नी श्यामा बच्चन की मृत्यु के बाद दूसरा विवाह तेजी बच्चन से हुआ। इनके दो बेटे हैं। बड़े बेटे का नाम आज पूरी दुनिया में गूंज रहा है। डा. बच्चन को उनकी रचनाओं पर 1968 में साहित्य अकादमी पुरस्कार व 1976 में पद्म भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इस महान साहित्यकार ने 18 जनवरी 2003 को दुनिया को अलविदा कह दिया। लेकिन इनका नाम आज भी साहित्य की दुनिया में अमर है।
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सदी के महानायक अमिताभ बच्चन को अपने पैतृक गांव की सुधि लेने की फुर्सत ही नहीं है। डा.बच्चन की मृत्यु के बाद 5 मार्च 2006 को बाबूपट्टी गांव में उनकी याद में एक पुस्तकालय बनवाया गया। पुस्तकालय का लोकार्पण करने डा.बच्चन की बहू व बिग बी पत्नी सांसद जया बच्चन खुद बाबूपट्टी गांव आई थीं। उनके साथ प्रदेश सरकार के तत्कालीन दिग्गज नेता सांसद अमर सिंह व स्थानीय सांसद सीएन सिंह भी मौजूद रहे। जया बच्चन ने सामाजिक रीतिरिवाज से गांव में नीम के चौरा पर पूजन अर्चन करने के बाद पुस्तकालय भवन का लोकार्पण किया था। सांसद जया बच्चन ने मंच के माध्यम से अपने ससुर की याद में बने पुस्तकालय में पुस्तकों के लिए 12 लाख रुपये देने की घोषणा भी की थी। यही नहीं कार्यक्रम में मंच से ही गांव में डा.बच्चन की स्मृति में एक महाविद्यालय की स्थापना की घोषणा भी की गई थी। उन्होंने अपने बेटे अभिषेक बच्चन व बहू ऐश्वर्या राय बच्चन को भी बाबूजी के गांव में लाने का वादा किया था। डा.बच्चन की लाडली बहू वादों की झड़ी लगाकर उड़नखटोला से फिर मायानगरी चली गईं। लेकिन यह गांव उनकी यादों को संजोये आज भी वादों को पूरा होने का सपना देख रहा है। पुस्तकालय का निर्माण हुए दस वर्ष बीत गए, लेकिन उसमें एक भी पुस्तक नहीं रखी जा सकी। फिलहाल प्रशासनिक उदासीनता के चलते महान साहित्यकार की यह विरासत अपनी पहचान खोती जा रही है।
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