{"_id":"5bf071867dec102bd611077d4110b3ad","slug":"muzaffarnagar-riots-victims-pain-1","type":"story","status":"publish","title_hn":"आंखों में खौफ, जुबां पर दर्द, बस अब कल की फिक्र","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
आंखों में खौफ, जुबां पर दर्द, बस अब कल की फिक्र
राजेन्द्र सिंह/मुजफ्फरनगर
Updated Tue, 17 Sep 2013 10:41 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
गोद में पांच साल का बच्चा, आंखों में खौफ का मंजर, जुबां पर दर्द और मन में मुस्तकबिल की चिंता।
विज्ञापन
नौ दिन से बसी कलां के राहत शिविर में पांच बच्चों के साथ रह रही भूरिया को सूझ नहीं रहा कि अब क्या करे। आंसू अब सूख गए हैं।
दुलेरा गांव की इस 38 वर्षीय महिला ने दंगे के दंश में न सिर्फ अपने पति मीर हसन को खोया, उसका घर-परिवार ही छूट गया।
सामने सैकड़ों की भीड़ है, पर आंखों में तस्वीर गांव और घर की बसी है। कहती है, पता नहीं घोड़ी, भैंस और बछिया किस हाल में होंगे, घर सलामत भी है या नहीं।
भूरिया का शौहर मीर हसन घोड़ा बुग्गी चलाकर गुजारा करता था। बसी कलां के इस शिविर में ऐसी कई बेबस भूरिया हैं।
मां से बार-बार बेतुके सवाल करता रहता है मासूम शाहरुख। बदन पर नौ दिन से वही कपड़े। कुछ बच्चे नंगे बदन भी हैं। कभी-कभी यहां दर्द शब्द भी छोटा लगने लगता है।
रविवार को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने और सोमवार को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने इस शिविर का दौरा किया। फिर भी हालात ज्यों के त्यों मिले।
विज्ञापन
लोग कह रहे हैं, सूबे और देश के मुखिया, राज्यपाल और प्रदेश सरकार के मंत्री आ चुके हैं। लेकिन, पता नहीं शिविरों में कब तक रहना है।
घर वापसी हो सकेगी या आवास की वैकल्पिक व्यवस्था होगी, नुकसान की भरपाई हो पाएगी, क्या बच्चे स्कूल जा सकेंगे ? इन सवालों का लोगों को कोई जवाब नहीं मिल रहा है।
विज्ञापन
किसान यूनियन के संस्थापक रहे चौधरी महेन्द्र सिंह टिकैत के गांव सिसौली की सईदा सिसकते हुए कहती है, पति यामीन नौ दिन से अस्पताल में हैं। सराय से सिसौली लौटते समय उन पर हमला हुआ था। छह बच्चे हैं, पांच बेटियां और एक बेटा।
कमोबेश ऐसी ही हाल कुटबा गांव की मेहरों का है। उनके सात बच्चे हैं और पति अब्दुल कय्यूम की हत्या कर दी गई। बच्चों के साथ कैंप में है। मेहरो और सईदा कहती हैं, कभी सोचा नहीं था, ये दिन देखने को मिलेंगे। गांव में नफरत की चिंगारी भड़केगी।
शिवानी की दास्तां सुन भावुक हो गए पीएम
‘मेरे पापा की तरह दंगे में किसी और की जान न जाए’। शिवानी वर्मा की दर्द भरी बात सुनकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी और राहुल गांधी बेहद भावुक हो गए।
पीएम ने जवाब दिया कि दंगों पर रोक लगाने के लिए सरकार कठोर कानून बनाएगी, ताकि भविष्य में इस तरह की पुनरावृत्ति न हो सके।
टीवी पत्रकार राजेश वर्मा की बेटी शिवानी का दर्द सोमवार को उस वक्त झलक उठा, जब पीएम, सोनिया गांधी और राहुल उनके घर पहुंचे।
रोते हुए शिवानी ने पूछा कि मेरे पापा की तरह कितने और लोग उन्मादियों का शिकार होंगे। यहां राहुल गांधी ने पीड़ित परिवार से एक ही सवाल किया कि पत्रकार वर्मा की मौत कैसे हुई।
भाई संजय वर्मा ने घटना की तस्वीर खींची तो राहुल गांधी की आंखें नम हो गईं। राहुल ने दोनों बच्चों के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा कि वह खुद को अकेला न समझें पूरा देश उनके साथ खड़ा है।
सोनिया से इंसाफ का भरोसा
हिंसाग्रस्त गांव से पलायन को मजबूर पीड़ित परिवारों की महिलाओं में यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी को अपना दुखड़ा सुनाने के बाद सुकून नजर आया।
महिलाएं बोलीं-‘सोनिया महिला हैं और मां भी, हमें यकीन है कि वो इंसाफ दिलाएंगी’।
सोनिया ने भी गंभीरता से बुजुर्ग महिलाओं और बेटियों की दास्तां सुनीं। बागपत के जिवाना गांव की चांदो ने उन्माद की रात का खौफ बयां किया।
सोनिया ने महिलाओं के हाथ पकड़ हिम्मत बंधाया। उन्होंने कहा कि घर भी बसेंगे और इंसाफ भी मिलेगा।