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कुरान की आयतों संग घुल रहीं मानस की चौपाई
वाराणसी/तबस्सुम
Updated Thu, 03 Jan 2013 10:18 AM IST
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एक छत के नीचे और एक जुबां पर कुरान की आयतों संग श्रीरामचरित मानस की चौपाइयों की जुगलबंदी...। क्यों है न यह मन खुश करने वाली बात। घनी मुसलिम आबादी के बीच छित्तनपुरा स्थित मदरसा बहरुल उलूम में बच्चों को कुरान के साथ-साथ गीता, रामायण जैसे पवित्र धर्मग्रंथों और वेदों की भी तालीम दी जा रही है। खास बात यह कि इस कौमी एकता की तहजीब को आगे बढ़ा रही हैं लड़कियां।
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बुनकर बाहुल्य इलाके के बीच बसे इस मदरसे में लड़कियों को दीनी तालीम के साथ साथ दुनियावी तालीम भी दी जा रही है। लेकिन, सर्वधर्म समभाव की भावना के लिए मदरसा प्रबंधन ने एक और पहल शुरू की है। मदरसे की लाइब्रेरी में गीता, महाभारत, रामायण, वेद के साथ बाइबिल को भी शामिल किया गया है। शुरुआत इस कोशिश के साथ हुई कि कौमी एकता की नींव तालीम के जरिये ज्यादा मजबूत हो सकती है।
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खुद की पहल पर लड़कियों ने इन धर्मग्रंथों को पढ़ना शुरू किया। इस समय दस से अधिक लड़कियां अलग-अलग धर्मग्रंथ पढ़ रही हैं। इसमें उनकी मदद करती हैं मदरसे की गैर मुसलिम शिक्षिकाएं। चूंकि विषय में संस्कृत भी शामिल है इसलिए लड़कियों को इन धर्मग्रंथों को पढ़ने में खास दिक्कत नहीं होती। शाम को मुहल्ले वाले भी इन धर्म ग्रंथों के अध्ययन के लिए आते हैं।
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12वीं की छात्रा नेहा अंसारी का कहना है अब तक जितना पढ़ा उससे यही समझ में आया कि सभी धर्मग्रंथों का सार एक ही है। कक्षा बारह में पढ़ रही खालिदा कौसर को मानस की चौपाइयां आकर्षित करती हैं। उसका कहना है कि जैसे कुरान के कलमें हैं, वैसे ही ये चौपाइयां भी हैं। कक्षा दस की हिना परवीन और नूरजहां का कहना है इन धर्मग्रंथों को पढ़ने की ललक खुद ही पैदा हुई है। यह जानना है कि हमारे मजहब और दूसरे मजहब में फर्क क्या है। क्यों लोग दूसरे से खुद को अलग समझते हैं।
लोगों का मानना है कि यह पहल कहीं न कहीं मजहब के नाम पर नफरत की दीवारों को भी जर्रा-जर्रा ही सही, ढहाने की तरफ एक कदम है। मदरसे में कुरान के कलमों, आयतों के साथ ही गीता के श्लोक और मानस की चौपाई पढ़ रहीं ये छात्राएं इशारा कर ही रही हैं कि मजहब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना...।
'हमारे कलमा और हिंदुओं के ब्रह्मसूत्र का सार एक ही है। जिस तरह से मजहब के नाम पर लड़ाई लड़ी जा रही है, उसे तालीम के जरिये ही खत्म किया जा सकता है। वक्त की मांग यही है कि बच्चों को ऐसी तालीम जिससे मजहब की दूरियां मिट जाएं।
- हाजी मुख्तार अंसारी, प्रबंधक, मदरसा बहरुल उलूम
'मदरसे और मुसलिम लड़कियों की यह कोशिश काबिले तारीफ है। यह बयार बह चली है तो समाज पर इसका बहुत अच्छा असर होगा। ऐसे ही प्रयासों से मजहब की कट्टरता खत्म होगी। काशी विद्यापीठ से संस्कृत में वेदों पर पीएचडी और डीलिट कर मैंने यह जाना है कि हर धर्मग्रंथ का सार एक है, इंसानियत और मानवता। इस पहल से यह बात आज कुछ लड़कियों ने जाना है, कल उनका परिवार जानेगा। ऐसे ही दायरा बढ़ेगा और यही सांप्रदायिकता को खत्म करने में सहायक होगा।
- डॉ. नाहिद आब्दी, संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय कार्य परिषद की पूर्व सदस्य