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तपस्वियों की स्थली रहा है परीक्षितगढ़
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परीक्षितगढ़। पयर्टन नगरी राजा परीक्षित से पहले ऋषि मुनियों की धरती वृक्ष स्थल के नाम से जानी जाती थी। रामायण काल में यह क्षेत्र खरदूषण के अधीन रहा। यहां पर अनेक ऋषि मुनियों आश्रम और उनकी शाखाएं थीं। इनमें से कश्यप ऋषि के पुत्र विभाण्डक ऋषि कठिन तपस्या के लिए जाना जाता है। इस आश्रम में पपील के वृक्ष के नीचे बैठकर विभाण्डक ऋषि कठिन तपस्या कर रहे थे। इसी दौरान उर्वशी ने विभाण्डक ऋषि की तपस्या भंग कर दी थी। वहीं, तपस्या के प्रभाव से विभाण्डक ऋषि को तेजवान पुत्र प्राप्त हुआ। जिसका नाम शृंगी नाम रखा गया। उन्होंने अपने पुत्र शृंगी को नारी की छाया से दूर रखा।
राजा दशरथ के एक पुत्री थी
वाल्मीकि रामायण के अनुसार अयोध्या के राजा दशरथ के भगवान राम से बड़ी एक पुत्री भी थी। जिसका नाम शांता था। शांता वीरांगना थी। वह युद्ध कौशल में परिपूर्ण थी। विभाण्डक ऋषि के पुत्र शृंगी का राजा दशरथ की पुत्री शांता से विवाह हुआ था। इन्हीं शृंगी ऋषि ने राजा दशरथ के यहां पुत्र पुत्रयेष्ठि यज्ञ किया। इससे राजा दशरथ को राम, लक्ष्मण, भरत एवं शत्रुघ्न चार पुत्र प्राप्त हुए।
ऋषि मार्कण्डेय पुराण में है वर्णन
विभाण्डक ऋषि के बाद यह आश्रम उनके शिष्यों ने संचालित किया। मार्कण्डेय की आयु बहुत ही कम थी। ऋषियों ने उन्हे महामृत्युंजय मंत्र की दीक्षा दी। मार्कण्डेय 12 वर्ष तक महामृत्युंजय का जाप करते रहे। समय पर यमराज आए परंतु महामृत्युंजय के प्रभाव से उन्हें दीर्घ आयु प्राप्त हुई। उन्होंने अपने जीवन में अनके ग्रंथ लिखे। जिनमें मार्कण्डेय पुराण, श्री दुर्गा सप्तशती, नवदुर्गा महिमा, हरीशचंद्र की कथा, मदालसा चरित्र, अत्रि अनसूइया की कथा की रचना की। यह आश्रम मार्कण्डेय ऋषि का आश्रम भी कहलाया।
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खोदाई में मिलते हैं प्राचीन अवशेष
आश्रम के समीप आजकल नगरवासियों के खेत हैं। यहां थोड़ी भी खोदाई की जाती है तो यहां प्राचीन अवशेष मिलते हैं। जिससे यहां आश्रम होने के प्रमाण मिलते हैं।
पेड़ से निकली ऊं की ध्वनि
नगर के बुर्जुग बताते हैं कि कभी-कभी इस पपील के पेड़ से ऊं की ध्वनि सुनाई पड़ती है। ऐसा प्रतीत होता है कि कोई यहां तपस्या कर रहा है।
राजा परीक्षित ने भी यहां किया था यज्ञ
राजा परीक्षितगढ़ ने परीक्षितगढ नगर की स्थापना के उपरांत इस आश्रम में पपील के पेड़ के नीचे यज्ञ किया था। परीक्षितगढ़ इतिहास के अनुसार राजा गुलाब सिंह ने भी इस आश्रम में पूजा-अर्चना की थी।
क्रांतिकारियों ने की थी सभा
विभाण्डक आश्रम पर 1857 की क्रांति के दौरान परीक्षितगढ़ के राव कदम सिंह का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। वहीं, घने जंगलों के बीच विभाण्डक आश्रम पर राजा कदम सिंह ने क्रांतिकारियों के साथ विशाल सेना तैयार की और विभाण्डक आश्रम से ही नगर के समीप जेई मिशन पर अंग्रेजों की सेना पर धावा बोला था। अंग्रेजों को मेरठ तक खदेड़ दिया था।
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राजा दशरथ के एक पुत्री थी
वाल्मीकि रामायण के अनुसार अयोध्या के राजा दशरथ के भगवान राम से बड़ी एक पुत्री भी थी। जिसका नाम शांता था। शांता वीरांगना थी। वह युद्ध कौशल में परिपूर्ण थी। विभाण्डक ऋषि के पुत्र शृंगी का राजा दशरथ की पुत्री शांता से विवाह हुआ था। इन्हीं शृंगी ऋषि ने राजा दशरथ के यहां पुत्र पुत्रयेष्ठि यज्ञ किया। इससे राजा दशरथ को राम, लक्ष्मण, भरत एवं शत्रुघ्न चार पुत्र प्राप्त हुए।
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ऋषि मार्कण्डेय पुराण में है वर्णन
विभाण्डक ऋषि के बाद यह आश्रम उनके शिष्यों ने संचालित किया। मार्कण्डेय की आयु बहुत ही कम थी। ऋषियों ने उन्हे महामृत्युंजय मंत्र की दीक्षा दी। मार्कण्डेय 12 वर्ष तक महामृत्युंजय का जाप करते रहे। समय पर यमराज आए परंतु महामृत्युंजय के प्रभाव से उन्हें दीर्घ आयु प्राप्त हुई। उन्होंने अपने जीवन में अनके ग्रंथ लिखे। जिनमें मार्कण्डेय पुराण, श्री दुर्गा सप्तशती, नवदुर्गा महिमा, हरीशचंद्र की कथा, मदालसा चरित्र, अत्रि अनसूइया की कथा की रचना की। यह आश्रम मार्कण्डेय ऋषि का आश्रम भी कहलाया।
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खोदाई में मिलते हैं प्राचीन अवशेष
आश्रम के समीप आजकल नगरवासियों के खेत हैं। यहां थोड़ी भी खोदाई की जाती है तो यहां प्राचीन अवशेष मिलते हैं। जिससे यहां आश्रम होने के प्रमाण मिलते हैं।
पेड़ से निकली ऊं की ध्वनि
नगर के बुर्जुग बताते हैं कि कभी-कभी इस पपील के पेड़ से ऊं की ध्वनि सुनाई पड़ती है। ऐसा प्रतीत होता है कि कोई यहां तपस्या कर रहा है।
राजा परीक्षित ने भी यहां किया था यज्ञ
राजा परीक्षितगढ़ ने परीक्षितगढ नगर की स्थापना के उपरांत इस आश्रम में पपील के पेड़ के नीचे यज्ञ किया था। परीक्षितगढ़ इतिहास के अनुसार राजा गुलाब सिंह ने भी इस आश्रम में पूजा-अर्चना की थी।
क्रांतिकारियों ने की थी सभा
विभाण्डक आश्रम पर 1857 की क्रांति के दौरान परीक्षितगढ़ के राव कदम सिंह का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। वहीं, घने जंगलों के बीच विभाण्डक आश्रम पर राजा कदम सिंह ने क्रांतिकारियों के साथ विशाल सेना तैयार की और विभाण्डक आश्रम से ही नगर के समीप जेई मिशन पर अंग्रेजों की सेना पर धावा बोला था। अंग्रेजों को मेरठ तक खदेड़ दिया था।