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NRHM घोटाला : कमरा नंबर 201 और 204 पर भ्रष्टाचार का पहरा
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Fri, 17 Mar 2017 12:18 PM IST
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फाइल फोटो
- फोटो : अमर उजाला
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एनआरएचएम घोटाले के रिकॉर्ड सामने आने के बाद एक बार फिर स्वास्थ्य विभाग के कमरा नंबर 201 और 204 चर्चा में हैं। इन दोनों कमरों पर भ्रष्टाचार का पहरा लगा है। घोटाले से जुड़े अहम रिकॉर्ड यहां बंद हैं। चौंकाने वाली बात है कि विभागीय कर्मचारी सीबीआई तक को झांसा देते रहे। यहां से रिकॉर्ड कब्जे में लेना तो दूर इन कमरों का ताला तक कोई नहीं खुलवा पाया। जांच से बचने के लिए बाबुओं ने अफसरों को अपने ही फार्मूले में फंसाकर रख दिया।
क्या है इन कमरों में
साल 2005 में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) की शुरुआत हुई थी। सीएमओ दफ्तर के कमरा नंबर 201 और 204 को एनआरएचएम के कामकाज के लिए अलॉट किया गया था। जहां सभी रिकॉर्ड रखे हुए थे। अप्रैल 2011 में घोटाला सामने आने पर इसकी जांच सीबीआई को सौंप दी गई थी। इसमें अहम बात यह है कि अक्तूबर 2011 से पहले तक सीएमओ कार्यालय जिला सरकारी अस्पताल में चलता था। लेकिन उसके बाद यह कार्यालय कमिश्नर आवास चौराहा के पास नए भवन में शिफ्ट हो गया था। ऐसे में जिला अस्पताल के सीएमओ कार्यालय का पुराना रिकार्ड भी इन दोनों कमरों में बंद कर दिया गया था। हालांकि आरोप यह भी लग रहे हैं कि शिफ्टिंग के दौरान काफी सारा रिकॉर्ड गायब कर दिया गया था। सीबीआई ने जांच के दौरान 2005 से लेकर 2014 तक का एनआरएचएम का रिकॉर्ड तलब किया था। लेकिन उसे आधा अधूरा रिकॉर्ड ही मुहैया कराया गया। बड़े स्तर पर हुए इस भ्रष्टाचार की तह तक जाने की कोशिश कर रहे ‘अमर उजाला’ के हाथ कई रिकॉर्ड के साथ महत्वपूर्ण जानकारियां भी लगी हैं। जिसके बाद ये कमरे भी चर्चा में आ गए।
नीचे से ऊपर तक सेटिंग
करीब सात साल बीत चुके हैं। इस बीच कई सीएमओ आए और गए। लेकिन किसी की हिम्मत इन कमरों का ताला खुलवाने की नहीं हुई और न ही पुराने बाबुओं से चार्ज लिया गया। क्योंकि यही दो कमरे स्वास्थ्य विभाग के कई अहम चिकित्सकों और बाबुओं को बचा रहे हैं। जब-जब सीबीआई टीम रिकॉर्ड मांगने के लिए सीएमओ दफ्तर पहुंची तो विभागीय अफसर और कर्मचारी यह कहकर बचाव करते रहे कि एनआरएचएम का सारा रिकॉर्ड इन कमरों में बंद है। बाबू का ट्रांसफर हो गया है और वह अभी रिकॉर्ड हैंडओवर करके नहीं गया है। दिखावे के लिए उसे रिकॉर्ड हैंडओवर करने के लिए पत्र लिखा गया। विभाग की तरफ से औपचारिकता के तौर पर बाबुओं को चार्ज देने के लिए पत्र भी लिखा गया। इस दौरान तीन बाबुओं को रिकॉर्ड हैंडओवर करने के निर्देश दिए गए। लेकिन नीचे से ऊपर तक ऐसी सेटिंग रही कि न तो किसी बाबू ने चार्ज लिया और न ही उनके खिलाफ चार्ज न लेने पर किसी विभागीय कार्रवाई की संस्तुति की गई।
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डीएम की कमेटी को भी टरकाया
घोटाले को लेकर साल 2014 में तत्कालीन डीएम पंकज यादव ने तीन सदस्यीय जांच कमेटी बनाई थी। जिसमें ट्रेजरी ऑफिसर के साथ ही एमडीए और बेसिक शिक्षा विभाग के वित्त एवं लेखाधिकारी को शामिल किया गया था। जिस वक्त टीम ने रिकॉर्ड मांगा तो एसीएमओ प्रशासन और एनएचएम (तत्कालीन) ने यह कहते हुए पल्ला झाड़ लिया कि बाबू का झांसी ट्रांसफर हो गया है और वो चार्ज देकर नहीं गया। जांच टीम उसके बाद तीन बार रिकार्ड लेने गई। लेकिन उपलब्ध नहीं कराया गया। केंद्रीय दवा स्टोर रूम से जो रिकॉर्ड मिला, उसके आधार पर टीम ने रिपोर्ट तैयार की। जिसमें स्पष्ट किया गया कि विभाग में काफी कुछ वित्तीय अनियमितता हुई है, जिसका काफी रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं कराया जा रहा है। ऐसे में इस मामले में उच्चस्तरीय जांच की संस्तुति की गई थी।
जांच चल रही, नहीं खुले ताले
कमेटी की रिपोर्ट पर तत्कालीन डीएम ने शासन को पत्र लिखा तो नेशनल हेल्थ मिशन के तत्कालीन निदेशक अमित घोष ने हाई पावर ऑडिट टीम मेरठ भेजी। लेकिन उसे भी दोनों कमरों का रिकॉर्ड मुहैया नहीं कराया गया। ऐसे में ऑडिट टीम स्टोर रूम के रिकॉर्ड से ही जांच कर लौट गई। जिसमें दो सीएमओ और दो एसीएमओ पर व्यापक घोटाले की बात साफ हुई। लेकिन टीम को उससे पुराना रिकार्ड नहीं दिया गया। ऐसे में चारों अफसरों पर शासन ने जांच रिपोर्ट के आधार पर एफआईआर दर्ज कराने के निर्देश दिए थे।ी सीबीआई की जांच अभी भी चल रही है। लेकिन ये दोनों कमरे अभी तक नहीं खुल पाए हैं।
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क्या है इन कमरों में
साल 2005 में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) की शुरुआत हुई थी। सीएमओ दफ्तर के कमरा नंबर 201 और 204 को एनआरएचएम के कामकाज के लिए अलॉट किया गया था। जहां सभी रिकॉर्ड रखे हुए थे। अप्रैल 2011 में घोटाला सामने आने पर इसकी जांच सीबीआई को सौंप दी गई थी। इसमें अहम बात यह है कि अक्तूबर 2011 से पहले तक सीएमओ कार्यालय जिला सरकारी अस्पताल में चलता था। लेकिन उसके बाद यह कार्यालय कमिश्नर आवास चौराहा के पास नए भवन में शिफ्ट हो गया था। ऐसे में जिला अस्पताल के सीएमओ कार्यालय का पुराना रिकार्ड भी इन दोनों कमरों में बंद कर दिया गया था। हालांकि आरोप यह भी लग रहे हैं कि शिफ्टिंग के दौरान काफी सारा रिकॉर्ड गायब कर दिया गया था। सीबीआई ने जांच के दौरान 2005 से लेकर 2014 तक का एनआरएचएम का रिकॉर्ड तलब किया था। लेकिन उसे आधा अधूरा रिकॉर्ड ही मुहैया कराया गया। बड़े स्तर पर हुए इस भ्रष्टाचार की तह तक जाने की कोशिश कर रहे ‘अमर उजाला’ के हाथ कई रिकॉर्ड के साथ महत्वपूर्ण जानकारियां भी लगी हैं। जिसके बाद ये कमरे भी चर्चा में आ गए।
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नीचे से ऊपर तक सेटिंग
करीब सात साल बीत चुके हैं। इस बीच कई सीएमओ आए और गए। लेकिन किसी की हिम्मत इन कमरों का ताला खुलवाने की नहीं हुई और न ही पुराने बाबुओं से चार्ज लिया गया। क्योंकि यही दो कमरे स्वास्थ्य विभाग के कई अहम चिकित्सकों और बाबुओं को बचा रहे हैं। जब-जब सीबीआई टीम रिकॉर्ड मांगने के लिए सीएमओ दफ्तर पहुंची तो विभागीय अफसर और कर्मचारी यह कहकर बचाव करते रहे कि एनआरएचएम का सारा रिकॉर्ड इन कमरों में बंद है। बाबू का ट्रांसफर हो गया है और वह अभी रिकॉर्ड हैंडओवर करके नहीं गया है। दिखावे के लिए उसे रिकॉर्ड हैंडओवर करने के लिए पत्र लिखा गया। विभाग की तरफ से औपचारिकता के तौर पर बाबुओं को चार्ज देने के लिए पत्र भी लिखा गया। इस दौरान तीन बाबुओं को रिकॉर्ड हैंडओवर करने के निर्देश दिए गए। लेकिन नीचे से ऊपर तक ऐसी सेटिंग रही कि न तो किसी बाबू ने चार्ज लिया और न ही उनके खिलाफ चार्ज न लेने पर किसी विभागीय कार्रवाई की संस्तुति की गई।
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डीएम की कमेटी को भी टरकाया
घोटाले को लेकर साल 2014 में तत्कालीन डीएम पंकज यादव ने तीन सदस्यीय जांच कमेटी बनाई थी। जिसमें ट्रेजरी ऑफिसर के साथ ही एमडीए और बेसिक शिक्षा विभाग के वित्त एवं लेखाधिकारी को शामिल किया गया था। जिस वक्त टीम ने रिकॉर्ड मांगा तो एसीएमओ प्रशासन और एनएचएम (तत्कालीन) ने यह कहते हुए पल्ला झाड़ लिया कि बाबू का झांसी ट्रांसफर हो गया है और वो चार्ज देकर नहीं गया। जांच टीम उसके बाद तीन बार रिकार्ड लेने गई। लेकिन उपलब्ध नहीं कराया गया। केंद्रीय दवा स्टोर रूम से जो रिकॉर्ड मिला, उसके आधार पर टीम ने रिपोर्ट तैयार की। जिसमें स्पष्ट किया गया कि विभाग में काफी कुछ वित्तीय अनियमितता हुई है, जिसका काफी रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं कराया जा रहा है। ऐसे में इस मामले में उच्चस्तरीय जांच की संस्तुति की गई थी।
जांच चल रही, नहीं खुले ताले
कमेटी की रिपोर्ट पर तत्कालीन डीएम ने शासन को पत्र लिखा तो नेशनल हेल्थ मिशन के तत्कालीन निदेशक अमित घोष ने हाई पावर ऑडिट टीम मेरठ भेजी। लेकिन उसे भी दोनों कमरों का रिकॉर्ड मुहैया नहीं कराया गया। ऐसे में ऑडिट टीम स्टोर रूम के रिकॉर्ड से ही जांच कर लौट गई। जिसमें दो सीएमओ और दो एसीएमओ पर व्यापक घोटाले की बात साफ हुई। लेकिन टीम को उससे पुराना रिकार्ड नहीं दिया गया। ऐसे में चारों अफसरों पर शासन ने जांच रिपोर्ट के आधार पर एफआईआर दर्ज कराने के निर्देश दिए थे।ी सीबीआई की जांच अभी भी चल रही है। लेकिन ये दोनों कमरे अभी तक नहीं खुल पाए हैं।