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रालोद की चुनौती, कैसे खुलेगा खाता
अमर उजाला ब्यूरों
Updated Thu, 01 Sep 2016 02:06 AM IST
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रालोद यशवीर सिंह
- फोटो : अमर उजाला
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रालोद का मिशन-2017 पिछले विधानसभा चुनाव से अलग नहीं नजर आ रहा है। पिछले विधानसभा चुनाव में तो राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) ने कांग्रेस से गठबंधन कर चुनाव लड़ा था। हालांकि, इस बार अब तक रालोद का गठबंधन तय नहीं है। लेकिन यह जरूर लग रहा है कि वर्ष-2012 में जिले की सातों सीटों पर मात खाया रालोद इस बार भी कोई करिश्मा कर पाएगा। खास बात यह है कि इस बार पार्टी के सारे नामचीन चेहरे सिवालखास सीट पर ही जोर लगा रहे हैं। शहरी सीटों पर तो ज्यादा दावेदार भी नहीं हैं। हालांकि, रालोद के प्रत्याशी जीत से दूर भले रहें, लेकिन दूसरे दलों की जीत के गणित को प्रभावित जरूर कर सकते हैं।
सिवालखास के बड़े-बड़े दावेदार
रालोद में जिले की सिवालखास सीट ही सबसे हॉट है। पिछली बार पार्टी के वर्तमान जिलाध्यक्ष यशवीर सिंह रालोद के टिकट पर चुनाव लड़े थे। कांग्रेस के गठबंधन के बावजूद पार्टी यह सीट नहीं बचा पाई थी। जाट वोटों के बंटवारे और मुस्लिम मतों के ध्रुवीकरण के सहारे गुलाम मोहम्मद के पक्ष में एकतरफा वोटिंग के बीच अच्छे-खासे वोट लेने के बाद भी यशवीर सिंह दूसरे नंबर पर रह गए थे। कहा यह भी गया था कि पार्टी में भितरघात के कारण सबसे सुरक्षित सीट रालोद से छिटक गई थी। अभी तक गठबंधन तय नहीं है और पार्टी के सारे दिग्गज यहीं से टिकट मांग रहे हैं। हालात तो यह हैं कि पश्चिम की सियासी राजधानी माने जाने वाले मेरठ जिले में पार्टी सिर्फ सिवालखास तक सिमटकर रह गई है। पश्चिमी संगठन से लेकर जिले के सारे पदाधिकारियों का जोर बस सिवालखास सीट पर है। यही कारण है कि दूसरी सीटों पर गिनाने को भी प्रत्याशी कम ही हैं तो यहां लंबी फौज है। एक मांग यह भी है कि क्षेत्रीय व्यक्ति को टिकट दिया जाए। इस बार के दावेदारों में भी जिलाध्यक्ष यशवीर सिंह, वेस्ट यूपी संगठन प्रभारी डॉ. राजकुमार सांगवान, वेस्ट यूपी के प्रवक्ता सुनील रोहटा, रणवीर दहिया, राजेंद्र प्रमुख, संदीप चौधरी, जगत सिंह, राजेंद्र जानी, विनय मल्लाहपुर, राजेंद्र चिकारा आदि दावेदार हैं। सपा और बसपा से मुस्लिम प्रत्याशी हैं। ऐसे में मुस्लिम वोटों का बंटवारा हो सकता है। संभव है कि भाजपा या कांग्रेस भी यहां से जाट प्रत्याशी उतार दे। जाट वोटों के बंटवारे की संभावना इस बार भी है और पार्टी में खूब गुटबाजी भी। ऐसे में इस बार भी सीट को रालोद के खाते में आना आसान नहीं होगा।
चमत्कार होगा, तभी मिलेगी शहर सीट
पिछली बार शहर सीट पर रालोद-कांग्रेस गठबंधन में कांग्रेस से यूसुफ कुरैशी मैदान में थे। वह तीसरे स्थान पर रहे थे। यहां पर मुस्लिम मतों का बंटवारा हुआ था और सीट भाजपा के खाते में आ गई थी। जाट वोटरों की संख्या अच्छी न होने से इस सीट पर रालोद के दावेदारों की संख्या भी कम ही है। इस बार पार्टी अकेले लड़ी तो यहां से ताज अली, अनीस कुरैशी और गफ्फार खान टिकट के दावेदारों में से हैं। पार्टी के नेता दावे चाहे जो करें, लेकिन शहर जैसी सीट पर पार्टी का जीतना किसी चमत्कार से कम नहीं होगा।
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जाट वोटरों को बांधे रखने की रणनीति
कैंट सीट भी पिछली बार कांग्रेस के खाते में थी। रमेश धींगरा को पंजाबी और जाट समीकरण की उम्मीद थी, लेकिन पार्टी को जीत नहीं दिला पाए। अब कैंट में जाटों की संख्या अच्छी होने के कारण रालोद के पास दावेदार तो कई हैं, लेकिन समीकरण यहां भी गडबड़ा रहा है। बसपा ने जाट प्रत्याशी उतारकर रालोद के जाट वोटरों में तकड़ी सेंध लगाने की कोशिश की है। पार्टी नहीं चाहती कि यहां से जाट वोटर बसपा या दूसरी पार्टी के खाते में जाए। इसलिए सभी विकल्पों पर गौर किया जा रहा है। यहां से पार्टी के दावेदारों में ज्ञानेंद्र शर्मा, राजेंद्र शर्मा के बेटे रमन शर्मा, गौरव जिटौली, किशन प्रधान सहित किसी पंजाबी को भी टिकट दिया जा सकता है। यहां भी चुनावी जंग में फतह करना दूर की कौड़ी ही साबित होगा।
उधार के नेताओं के सहारे दक्षिण
शहर की सभी सीटों पर रालोद की स्थिति अच्छी नहीं है। इसी कड़ी में दक्षिण की सीट भी है। पिछली बार रालोद ने जरूर इस सीट पर अपना प्रत्याशी उतारा था, लेकिन मंजूर सैफी कोई खास प्रदर्शन नहीं कर सके थे। इस बार पार्टी मुस्लिमों के जातिगत समीकरणों को देखते हुए किसी सैफी पर भी दांव खेल सकती है, तो गुर्जर प्रत्याशी पर भी नजर है। दावेदारों में पप्पू गुर्जर, भोपाल गुर्जर, राममेहर सिंह, फुरकान अल्वी आदि का नाम है। यहां पर पार्टी दूसरे दलों से आने वाले नेताओं के सहारे अपना तलाश रही है। देखना यह होगा ऐन वक्त पर सियासी पलटी मारने वाले ये नेता पार्टी को दक्षिण सीट पर कोई सम्मान दिला पाएंगे या नहीं। यह बात और है कि उम्मीद यहां भी कम ही है।
किठौर में वही पुराने हारे समीकरण
पिछले चुनाव में रालोद से चुनाव लड़े सतवीर त्यागी इस बार भाजपा के दावेदारों में से एक हैं। त्यागी ने पिछले चुनाव में अच्छे वोट बटोरे थे और वह तीसरे नंबर पर थे। इस बार रालोद यहां पर जाटों के साथ गुर्जर या फिर मुस्लिम समीकरण आजमाने की फिराक में है। बसपा ने पहले ही गुर्जर प्रत्याशी उतार दिया है और मुस्लिम प्रत्याशी सपा से शाहिद मंजूर भी हैं। ऐसे में दोनों ही समीकरणों के सहारे जीत हासिल करना पहाड़ पर विजय पाने जैसा होगा। पार्टी की ओर से मुस्लिम नेताओं में परवेज हलीम तो गुर्जर वर्ग से बिजेंद्र भाटी प्रमुख दावेदार हैं।
सरधना में दूसरे दलों के लिए बनेंगे परेशानी
इस क्षेत्र में जाट मतदाताओं की संख्या अच्छी-खासी है। पिछले विधानसभा चुनाव में रालोद से चुनाव लड़े याकूब कुरैशी ने बेहतर प्रदर्शन करते हुए दूसरा स्थान हासिल किया था। इस बार याकूब के बेटे इमरान कुरैशी बसपा के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं। दरअसल, इस सीट पर रालोद प्रत्याशी का प्रदर्शन दूसरे दलों को भी पूरी तरह से प्रभावित करेगा। कहा जा रहा है कि पार्टी सैनी प्रत्याशी भी उतार सकती है। यहां से ताराचंद शास्त्री प्रत्याशी हो सकते हैं। पिछले दिनों पार्टी में आए वकील चौधरी और पार्टी के पुराने नेता ऐनुद्दीन शाह भी दावेदार हैं। मुस्लिम प्रत्याशी होने से सपा और बसपा के प्रत्याशी सीधे तौर पर प्रभावित होंगे तो जाट या सैनी होने से भाजपा के मतों में सेंध लग सकती है। दावा यहां भी जीत का है, लेकिन चुनावी मैदान में जीत टेढ़ी खीर साबित हो सकती है।
हस्तिनापुर में भी आस कम ही
इस सीट पर पार्टी का जोर सिवाल के बाद सबसे ज्यादा है। पार्टी नेताओं का मानना है कि कई ध्रुवों में हो रही लड़ाई के कारण उनका प्रत्याशी भी मजबूत स्थिति में हो सकता है। पिछली बार यह सीट कांग्रेस के खाते में थी और गोपाल काली चुनाव लड़े थे। अब गोपाल काली भाजपा में हैं। योगेश वर्मा इस बार बसपा से प्रत्याशी हैं। वैसे चुनाव जीतना यहां भी कठिन ही हो सकता है। यहां से नरेंद्र खजूरी, संजय जाटव के अलावा जिला पंचायत सदस्य रीना कुमारी दावेदारी कर रही हैं। यहां जाट वोटर अच्छी संख्या में हैं तो रालोद मैदान में पीछे भी रहा तो दूसरों के लिए समस्या खड़ी कर सकता है।
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सिवालखास के बड़े-बड़े दावेदार
रालोद में जिले की सिवालखास सीट ही सबसे हॉट है। पिछली बार पार्टी के वर्तमान जिलाध्यक्ष यशवीर सिंह रालोद के टिकट पर चुनाव लड़े थे। कांग्रेस के गठबंधन के बावजूद पार्टी यह सीट नहीं बचा पाई थी। जाट वोटों के बंटवारे और मुस्लिम मतों के ध्रुवीकरण के सहारे गुलाम मोहम्मद के पक्ष में एकतरफा वोटिंग के बीच अच्छे-खासे वोट लेने के बाद भी यशवीर सिंह दूसरे नंबर पर रह गए थे। कहा यह भी गया था कि पार्टी में भितरघात के कारण सबसे सुरक्षित सीट रालोद से छिटक गई थी। अभी तक गठबंधन तय नहीं है और पार्टी के सारे दिग्गज यहीं से टिकट मांग रहे हैं। हालात तो यह हैं कि पश्चिम की सियासी राजधानी माने जाने वाले मेरठ जिले में पार्टी सिर्फ सिवालखास तक सिमटकर रह गई है। पश्चिमी संगठन से लेकर जिले के सारे पदाधिकारियों का जोर बस सिवालखास सीट पर है। यही कारण है कि दूसरी सीटों पर गिनाने को भी प्रत्याशी कम ही हैं तो यहां लंबी फौज है। एक मांग यह भी है कि क्षेत्रीय व्यक्ति को टिकट दिया जाए। इस बार के दावेदारों में भी जिलाध्यक्ष यशवीर सिंह, वेस्ट यूपी संगठन प्रभारी डॉ. राजकुमार सांगवान, वेस्ट यूपी के प्रवक्ता सुनील रोहटा, रणवीर दहिया, राजेंद्र प्रमुख, संदीप चौधरी, जगत सिंह, राजेंद्र जानी, विनय मल्लाहपुर, राजेंद्र चिकारा आदि दावेदार हैं। सपा और बसपा से मुस्लिम प्रत्याशी हैं। ऐसे में मुस्लिम वोटों का बंटवारा हो सकता है। संभव है कि भाजपा या कांग्रेस भी यहां से जाट प्रत्याशी उतार दे। जाट वोटों के बंटवारे की संभावना इस बार भी है और पार्टी में खूब गुटबाजी भी। ऐसे में इस बार भी सीट को रालोद के खाते में आना आसान नहीं होगा।
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चमत्कार होगा, तभी मिलेगी शहर सीट
पिछली बार शहर सीट पर रालोद-कांग्रेस गठबंधन में कांग्रेस से यूसुफ कुरैशी मैदान में थे। वह तीसरे स्थान पर रहे थे। यहां पर मुस्लिम मतों का बंटवारा हुआ था और सीट भाजपा के खाते में आ गई थी। जाट वोटरों की संख्या अच्छी न होने से इस सीट पर रालोद के दावेदारों की संख्या भी कम ही है। इस बार पार्टी अकेले लड़ी तो यहां से ताज अली, अनीस कुरैशी और गफ्फार खान टिकट के दावेदारों में से हैं। पार्टी के नेता दावे चाहे जो करें, लेकिन शहर जैसी सीट पर पार्टी का जीतना किसी चमत्कार से कम नहीं होगा।
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जाट वोटरों को बांधे रखने की रणनीति
कैंट सीट भी पिछली बार कांग्रेस के खाते में थी। रमेश धींगरा को पंजाबी और जाट समीकरण की उम्मीद थी, लेकिन पार्टी को जीत नहीं दिला पाए। अब कैंट में जाटों की संख्या अच्छी होने के कारण रालोद के पास दावेदार तो कई हैं, लेकिन समीकरण यहां भी गडबड़ा रहा है। बसपा ने जाट प्रत्याशी उतारकर रालोद के जाट वोटरों में तकड़ी सेंध लगाने की कोशिश की है। पार्टी नहीं चाहती कि यहां से जाट वोटर बसपा या दूसरी पार्टी के खाते में जाए। इसलिए सभी विकल्पों पर गौर किया जा रहा है। यहां से पार्टी के दावेदारों में ज्ञानेंद्र शर्मा, राजेंद्र शर्मा के बेटे रमन शर्मा, गौरव जिटौली, किशन प्रधान सहित किसी पंजाबी को भी टिकट दिया जा सकता है। यहां भी चुनावी जंग में फतह करना दूर की कौड़ी ही साबित होगा।
उधार के नेताओं के सहारे दक्षिण
शहर की सभी सीटों पर रालोद की स्थिति अच्छी नहीं है। इसी कड़ी में दक्षिण की सीट भी है। पिछली बार रालोद ने जरूर इस सीट पर अपना प्रत्याशी उतारा था, लेकिन मंजूर सैफी कोई खास प्रदर्शन नहीं कर सके थे। इस बार पार्टी मुस्लिमों के जातिगत समीकरणों को देखते हुए किसी सैफी पर भी दांव खेल सकती है, तो गुर्जर प्रत्याशी पर भी नजर है। दावेदारों में पप्पू गुर्जर, भोपाल गुर्जर, राममेहर सिंह, फुरकान अल्वी आदि का नाम है। यहां पर पार्टी दूसरे दलों से आने वाले नेताओं के सहारे अपना तलाश रही है। देखना यह होगा ऐन वक्त पर सियासी पलटी मारने वाले ये नेता पार्टी को दक्षिण सीट पर कोई सम्मान दिला पाएंगे या नहीं। यह बात और है कि उम्मीद यहां भी कम ही है।
किठौर में वही पुराने हारे समीकरण
पिछले चुनाव में रालोद से चुनाव लड़े सतवीर त्यागी इस बार भाजपा के दावेदारों में से एक हैं। त्यागी ने पिछले चुनाव में अच्छे वोट बटोरे थे और वह तीसरे नंबर पर थे। इस बार रालोद यहां पर जाटों के साथ गुर्जर या फिर मुस्लिम समीकरण आजमाने की फिराक में है। बसपा ने पहले ही गुर्जर प्रत्याशी उतार दिया है और मुस्लिम प्रत्याशी सपा से शाहिद मंजूर भी हैं। ऐसे में दोनों ही समीकरणों के सहारे जीत हासिल करना पहाड़ पर विजय पाने जैसा होगा। पार्टी की ओर से मुस्लिम नेताओं में परवेज हलीम तो गुर्जर वर्ग से बिजेंद्र भाटी प्रमुख दावेदार हैं।
सरधना में दूसरे दलों के लिए बनेंगे परेशानी
इस क्षेत्र में जाट मतदाताओं की संख्या अच्छी-खासी है। पिछले विधानसभा चुनाव में रालोद से चुनाव लड़े याकूब कुरैशी ने बेहतर प्रदर्शन करते हुए दूसरा स्थान हासिल किया था। इस बार याकूब के बेटे इमरान कुरैशी बसपा के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं। दरअसल, इस सीट पर रालोद प्रत्याशी का प्रदर्शन दूसरे दलों को भी पूरी तरह से प्रभावित करेगा। कहा जा रहा है कि पार्टी सैनी प्रत्याशी भी उतार सकती है। यहां से ताराचंद शास्त्री प्रत्याशी हो सकते हैं। पिछले दिनों पार्टी में आए वकील चौधरी और पार्टी के पुराने नेता ऐनुद्दीन शाह भी दावेदार हैं। मुस्लिम प्रत्याशी होने से सपा और बसपा के प्रत्याशी सीधे तौर पर प्रभावित होंगे तो जाट या सैनी होने से भाजपा के मतों में सेंध लग सकती है। दावा यहां भी जीत का है, लेकिन चुनावी मैदान में जीत टेढ़ी खीर साबित हो सकती है।
हस्तिनापुर में भी आस कम ही
इस सीट पर पार्टी का जोर सिवाल के बाद सबसे ज्यादा है। पार्टी नेताओं का मानना है कि कई ध्रुवों में हो रही लड़ाई के कारण उनका प्रत्याशी भी मजबूत स्थिति में हो सकता है। पिछली बार यह सीट कांग्रेस के खाते में थी और गोपाल काली चुनाव लड़े थे। अब गोपाल काली भाजपा में हैं। योगेश वर्मा इस बार बसपा से प्रत्याशी हैं। वैसे चुनाव जीतना यहां भी कठिन ही हो सकता है। यहां से नरेंद्र खजूरी, संजय जाटव के अलावा जिला पंचायत सदस्य रीना कुमारी दावेदारी कर रही हैं। यहां जाट वोटर अच्छी संख्या में हैं तो रालोद मैदान में पीछे भी रहा तो दूसरों के लिए समस्या खड़ी कर सकता है।