{"_id":"57c093df4f1c1bb57ed4f5dc","slug":"nagar-nigam-me-dohri-lekha","type":"story","status":"publish","title_hn":"नगर निगम में दोहरी लेखा प्रणाली का डबल धोखा ","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
नगर निगम में दोहरी लेखा प्रणाली का डबल धोखा
अमर उजाला ब्यूरों
Updated Sat, 27 Aug 2016 01:46 AM IST
विज्ञापन
फाइल फोटो
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
नगर निगम ने दोहरी लेखा प्रणाली शुरू होने से पहले ही डबल धोखा कर डाला। उत्तर प्रदेश सरकार और निगम प्रशासन ने इस प्रणाली को लागू करने से बचने के लिए टेली व्यवस्था ढूंढ ली। निगम के अधिकारी टेली में लेखा-जोखा दर्ज करने को ही दोहरी लेखा प्रणाली बता रहे हैं। जबकि इसके लिए अभी तक शासन से साफ्टवेयर तक नहीं मिला। ऊपर से इस तामझाम पर लाखों रुपये अलग से फूंक दिए गए।
यह है डबल एंट्री सिस्टम
सही मायने में दोहरी लेखा प्रणाली का मतलब है कि अगर देश या प्रदेश की सरकार दिल्ली और लखनऊ में बैठकर नगर निगम की आय-व्यय का लेखा-जोखा जानना चाहती तो ऑनलाइन देख सके। दरअसल निगम राज्य सरकार के बजट से करोड़ों रुपये सालाना के काम कराता है तो भारत सरकार का खजाना भी खर्च करता है। निगम की आय भी काफी है। भारत सरकार ने यूपी सरकार के माध्यम से नगर निगम प्रशासन को निर्देश दिए कि वह दोहरी लेखा प्रणाली लागू करें। ताकि केंद्र सरकार दिल्ली में बैठकर ही देख सके कि महानगर में केंद्र सरकार की गंगाजल, सीवर आदि की योजनाओं पर कितना खर्च हुआ। कितने की भविष्य में जरूरत है। नगर निगम की वार्षिक आय कितनी है। कैसे शहर का विकास हो सकता है।
हकीकत से अलग शपथ पत्र
अब जानकारी मिली है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने केंद्र सरकार को शपथ पत्र दिया हुआ है कि नगर निगमों में दोहरी लेखा प्रणाली लागू हो चुकी है। जबकि हकीकत कुछ ओर ही है। अगर नगर निगम मेरठ की बात करें तो प्रणाली लागू होना तो दूर, अभी तक इसका सॉफ्टवेयर तक नहीं आया है। नगर निगम के अधिकारियों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि सॉफ्टवेयर तो उत्तर प्रदेश सरकार को देना था। जो अभी तक नहीं मिला है। जिसके कारण लोकल स्तर पर टेली सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किया जा रहा है। सारा लेखा-जोखा कंप्यूटर पर टेली में दर्ज किया जा रहा है।
विज्ञापन
व्यवस्था लागू नहीं, बजट खर्च
यह प्रणाली लागू करने के लिए भारत सरकार ने अलग से बजट की व्यवस्था की थी। जिसमें कंप्यूटर आदि की खरीद से लेकर कर्मचारी व अधिकारियों की ट्रेनिंग पर खर्च भी शामिल था। यही नहीं, सरकार के निर्देश पर टाटा कंसलटेंसी की सीएमसी फर्म द्वारा इस प्रणाली के लिए एक सॉफ्टवेयर तैयार किया जाना था। जिसके माध्यम से डबल एंट्री सिस्टम को ऑनलाइन किया जाना था। अब कंप्यूटर भी खरीदे गए और सॉफ्टवेयर और अधिकारी व कर्मचारियों की ट्रेनिंग को मिलाकर लाखों रुपये खर्च भी हो गया। लेकिन प्रणाली लागू नहीं हो सकी।
विज्ञापन
यह है डबल एंट्री सिस्टम
सही मायने में दोहरी लेखा प्रणाली का मतलब है कि अगर देश या प्रदेश की सरकार दिल्ली और लखनऊ में बैठकर नगर निगम की आय-व्यय का लेखा-जोखा जानना चाहती तो ऑनलाइन देख सके। दरअसल निगम राज्य सरकार के बजट से करोड़ों रुपये सालाना के काम कराता है तो भारत सरकार का खजाना भी खर्च करता है। निगम की आय भी काफी है। भारत सरकार ने यूपी सरकार के माध्यम से नगर निगम प्रशासन को निर्देश दिए कि वह दोहरी लेखा प्रणाली लागू करें। ताकि केंद्र सरकार दिल्ली में बैठकर ही देख सके कि महानगर में केंद्र सरकार की गंगाजल, सीवर आदि की योजनाओं पर कितना खर्च हुआ। कितने की भविष्य में जरूरत है। नगर निगम की वार्षिक आय कितनी है। कैसे शहर का विकास हो सकता है।
विज्ञापन
हकीकत से अलग शपथ पत्र
अब जानकारी मिली है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने केंद्र सरकार को शपथ पत्र दिया हुआ है कि नगर निगमों में दोहरी लेखा प्रणाली लागू हो चुकी है। जबकि हकीकत कुछ ओर ही है। अगर नगर निगम मेरठ की बात करें तो प्रणाली लागू होना तो दूर, अभी तक इसका सॉफ्टवेयर तक नहीं आया है। नगर निगम के अधिकारियों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि सॉफ्टवेयर तो उत्तर प्रदेश सरकार को देना था। जो अभी तक नहीं मिला है। जिसके कारण लोकल स्तर पर टेली सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किया जा रहा है। सारा लेखा-जोखा कंप्यूटर पर टेली में दर्ज किया जा रहा है।
विज्ञापन
व्यवस्था लागू नहीं, बजट खर्च
यह प्रणाली लागू करने के लिए भारत सरकार ने अलग से बजट की व्यवस्था की थी। जिसमें कंप्यूटर आदि की खरीद से लेकर कर्मचारी व अधिकारियों की ट्रेनिंग पर खर्च भी शामिल था। यही नहीं, सरकार के निर्देश पर टाटा कंसलटेंसी की सीएमसी फर्म द्वारा इस प्रणाली के लिए एक सॉफ्टवेयर तैयार किया जाना था। जिसके माध्यम से डबल एंट्री सिस्टम को ऑनलाइन किया जाना था। अब कंप्यूटर भी खरीदे गए और सॉफ्टवेयर और अधिकारी व कर्मचारियों की ट्रेनिंग को मिलाकर लाखों रुपये खर्च भी हो गया। लेकिन प्रणाली लागू नहीं हो सकी।