करोड़ों के पेड़ों पर सेटिंग का आरा
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शहर में ही यह आंकड़ा सौ के पार है। इन अवैध आरा मशीनों पर वन विभाग और जिला प्रशासन की कोई नजर नहीं है। पौधरोपण के माध्यम से पर्यावरण का कायाकल्प करने का दम भरने वाली तमाम स्वयंसेवी संस्थाएं भी इस मसले पर चुप्पी साधे हुए हैं।
सुप्रीम कोर्ट की ओर से 1994 में नई आरा मशीनों के लाइसेंस जारी करने पर रोक लगा दी गई थी। तब से वन विभाग केवल लाइसेंसों का नवीनीकरण कर रहा है। शहर में बडे़ पैमाने पर खेल का सामान तैयार किया जाता है। कैरम, क्रिकेट बैट, विकेट, बेसबाल बैट और तमाम फर्नीचर का सामान बनाने में लकड़ियों का प्रयोग किया जाता है।
इन लकड़ियों की पूर्ति का बड़ा हिस्सा स्थानीय स्तर पर इन अवैध आरा मशीनें के द्वारा ही किया जा रहा है। जिला वन विभाग की ओर से जारी लाइसेंस सूची में कुल 120 आरा मशीनों के ही नाम दर्ज हैं, जबकि जिले में बड़ी संख्या में अवैध मशीनें चल रहीं हैं। एक अनुमान के अनुसार शहरी क्षेत्रों में इनकी संख्या लगभग सौ और देहात क्षेत्र में लगभग चार सौ के आसपास है।
यहां हो रहा अवैध मशीनों का संचालन
कांच का पुल, झूले वाला पुल, हापुड़ रोड, हुमायूं नगर, जमना नगर, तारापुरी, साईंपुरम रोड, श्यामनगर, खुशहाल नगर, अंजुम पैलेस, सिटी गार्डन, नूर नगर, मदीना कॉलोनी, फतेहउल्लापुर रोड, पूर्वा महावीर में कई आरा मशीनें बिना लाइसेंस के चल रही हैं। इसके अतिरिक्त ब्रह्मपुरी, नौचंदी, सदर बाजार, कोतवाली, मेडिकल थाना क्षेत्र और देहात के हस्तिनापुर, परीक्षितगढ़, खरखौदा, जानी, सरधना, दौराला आदि क्षेत्रों में भी बड़ी संख्या में अवैध रूप से आरा मशीनें चल रही हैं।
कटान की अनुमति में भी खेल
वन विभाग की ओर से पेड़ कटान के लिए दी जाने वाली अनुमति में भी खेल किया जाता है। विभाग की ओर से यदि सौ पेड़ काटने की अनुमति दी गई है तो अधिकारियों और कर्मचारियों की मिलीभगत से इससे कहीं अधिक पेड़ काटे जाते हैं। पेड़ काटने का काम भी बड़ी सफाई से किया जाता है। जमीन खोदकर जड़ तक निकाल दी जाती है। ताकि जांच में मौके पर पेड़ होने के सबूत ही ना मिल सके।
सरकार को 18 लाख, अधिकारियों को तीन करोड़
वन विभाग के अधिकारी सेटिंग के खेल से शासन को करोड़ों का चूना लगा रहे हैं। लाइसेंस नवीनीकरण के नाम पर लगभग 18 लाख रुपये राजस्व की प्राप्ति होती है। यह रकम वन विभाग, मंडी समिति और व्यापार कर विभाग के माध्यम से जुटाई जाती है। आरा मशीन की क्षमता के अनुरूप यह शुल्क लिया जाता है। औसतन एक आरा मशीन से वन विभाग 15 हजार, मंडी समिति तीन हजार और व्यापार कर 2500 रुपये सालाना शुल्क वसूलता है। उधर, अवैध आरा मशीन से सालाना तीन करोड़ रुपये की रकम वसूली जाती है। इस रकम का बंटवारा वन विभाग, पुलिस विभाग और राजस्व विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों में होता है।
वर्जन.......
हमारी टीम लगातार इन अवैध आरा मशीनों के खिलाफ कार्य कर रही है। यदि कहीं अवैध मशीन का संचालन किया जा रहा है तो प्रमाण सहित बताएं। ऐसी मशीन संचालकों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। अवैध आरामशीन की जो सूची है, उनके खिलाफ जांच कराई जा रही है। दोषियों पर सख्त कार्रवाई होगी।
मनीष मित्तल, जिला वन अधिकारी
आरा मशीन यदि अवैध तरीके से चल रही हैं तो गंभीर मामला है। इसकी वन विभाग के साथ ही प्रशासनिक स्तर पर भी जांच कराई जाएगी। मशीनों को बंद कराने के साथ ही दोषियों पर कड़ी कार्रवाई होगी। - पंकज यादव, जिलाधिकारी मेरठ।