Emergency: जेलों में ठूंसे गए लोग, नाखून तक उखाड़े, आपातकाल में मेरठ की सड़कों पर पुलिस ने तोड़ी थीं बर्बरता
25 जून 1975 को लागू आपातकाल की यादें मेरठ में आज भी लोगों को सिहरने पर मजबूर कर देती हैं। धरपकड़, जेल, यातनाएं और जबरन नसबंदी जैसे घटनाक्रम लोकतंत्र सेनानियों के जेहन में आज भी ताजा हैं।
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आपातकाल की घोषणा होते ही मेरठ में राजनीतिक कार्यकर्ताओं और प्रबुद्ध लोगों की धरपकड़ शुरू हो गई। मीसा और डीआईआर जैसे कानूनों का सहारा लेकर पुलिस ने आधी रात को लोगों को घरों से उठाना शुरू किया। वरिष्ठ नेताओं, छात्रसंघ पदाधिकारियों और लोकतंत्र समर्थकों को बिना किसी वारंट के सलाखों के पीछे डाल दिया गया।
जिला जेल क्षमता से कई गुना अधिक कैदियों से ठसाठस भर गई थी। उस दौर की यातनाओं के गवाह शास्त्रीनगर निवासी प्रदीप कंसल बताते हैं कि 29 जनवरी 196 को मेरठ कॉलेज में अंतिम सत्याग्रह किया गया। तत्कालीन सिटी मजिस्ट्रेट सतीश चंद नागर ने डीएसपी को लाठीचार्ज का आदेश दिया। इसके बाद उनको पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने उन्हें रात भर लाठियों से पीटा।
उन्होंने बताया कि आंख, नाक, मुंह और अंगुलियों से खून गिरने लगा। शरीर में इतनी सूजन आई कि कपड़े छोटे पड़ने लगे। दाएं पैर के अंगूठे का नाखून प्लास से उखाड़ दिया गया। इसके बाद उन्हें जेल भिजवा दिया गया। प्रदीप कंसल को तब लोग मेरठ का भगत सिंह कहते थे।
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मेरठ के 147 लोग गए थे जेल
आपातकाल के समय मेरठ कॉलेज छात्रसंघ के महामंत्री रहे भाजपा के वरिष्ठ नेता अरुण वशिष्ट बताते हैं कि पुलिस ने 147 लोगों को जेल भेज दिया था। उन पर सिविल लाइन, लालकुर्ती समेत तीन थानों में मुकदमे दर्ज किए गए। इसके बाद भी वे आंदोलन करते रहे। उनके घर की कुर्की तक हो गई। इसके बाद उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया। वे पांच महीने तक जेल में रहे। वे दो बार जेल में बंद रहे।
पूर्व सांसद राजेंद्र अग्रवाल भी गए थे जेल
मेरठ से तीन बार सांसद रहे राजेंद्र अग्रवाल भी आपातकाल में जेल गए थे। वे उस समय आरएसएस के प्रचार के रूप में कार्यरत थे। इसके साथ ही रवींद्र नादर उर्फ रब्बोजी, जनमेजय चौहान, पूर्व एमएलसी जगत सिंह आदि भी जेल गए थे।
इनमें से अनेक लोगों ने भूमिगत रहकर आपातकाल के विरोध में कार्य किया। जबरन नसबंदी अभियान को याद करके भी लोग सिहर उठते हैं। पुलिस ने लोगों पर जबरदस्त अत्याचार किया। मेरठ में बुढ़ाना गेट, बेगमपुल, कचहरी का क्षेत्र आपातकाल के विरोध में हुए संघर्ष का गवाह है।