भाजपा के लिए आसान नहीं होगा 2019 में 'कमल खिलाना', ये रही वजह
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महागठबंधन का प्रयोग उपचुनाव के दौरान पश्चिम में पूरी तरह सफल नजर आया। अहम बात ये है कि इसमें बसपा महागठबंधन में शामिल नहीं थी और सिर्फ चुप्पी साधे बैठी थी। इसके बाद गठबंधन को पूरी सफलता मिली। ऐसे में 2019 के लोकसभा चुनाव में पश्चिमी क्षेत्र में भाजपा के लिए कमल खिलाना आसान नहीं होगा। मेरठ के आसपास की अगर पांच लोकसभा सीटों के पिछले दो चुनाव परिणामों को देखें तो सिर्फ गाजियाबाद सीट ही भाजपा के लिए महफूज नजर आती है। बाकी सीटों पर भाजपा के सामने संकट नजर आता है।
भाजपा लोकसभा 2014 के चुनाव में अकेले दम पर चुनाव मैदान में थी। इसमें उसने मुजफ्फरनगर, बिजनौर, मेरठ, बागपत और गाजियाबाद सहित पश्चिम की सभी सीटों पर बड़े अंतर से जीत हासिल की थी। यह जीत पूरी तरह एक तरफा मोदी लहर के कारण थी। लेकिन 2009 के लोकसभा चुनाव परिणाम देखें तो भाजपा रालोद से गठबंधन कर मैदान में उतरी थी। इस चुनाव में भाजपा ने मेरठ और गाजियाबाद सीटों पर जीत हासिल की थी। जबकि रालोद ने बिजनौर और बागपत सीट पर जीत हासिल की थी। वहीं मुजफ्फरनगर सीट पर बसपा ने रालोद से मात्र 21 हजार वोटों से जीत हासिल की थी।
पिछले एक साल में भाजपा का ग्राफ तेजी से गिरा है। इसमें रही सही कसर दलित आंदोलन ने जहां पूरी की तो पश्चिम क्षेत्र का बड़ा फैक्टर जाट वोट भी भाजपा से खिसकता नजर आया है। ऐेसे में भाजपा इस समय 2009 जैसी स्थिति में है, लेकिन महागठबंधन के सामने उसकी स्थिति और ज्यादा कमजोर नजर आती है। क्योंकि मोदी लहर के बीच जो वोट भाजपा को अकेले दम पर मिले थे, उसमें जाट वोट भी बड़ा फैक्टर था। क्योंकि उस लहर में बागपत जैसी सीट पर चौ. अजीत सिंह को हार का सामना करना पड़ा था। लेकिन इस बार जाट वोट पहले की तरह भाजपा को मिलेगा, ऐसा नजर नहीं आ रहा है।
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जाट और दलित वोट कटा आ रहा नजर
लोकसभा 2014 के परिणाम के अनुसार मुजफ्फरनगर सीट पर भाजपा और अन्य दलों के वोटों का अगर अंतर देखें तो भाजपा दो लाख वोटों से आगे नजर आती है, लेकिन उस चुनाव में भाजपा को इस सीट पर जाट वोटों के साथ दलित वोट भी मिला था, जो इस बार पूरी तरह कटा नजर आ रहा है। वहीं बिजनौर सीट पर भाजपा महागठबंधन से पचास हजार पीछे है, तो मेरठ सीट पर यह अंतर 22 हजार से ज्यादा है। जबकि बागपत सीट पर सवा लाख का अंतर बैठता है। सिर्फ गाजियाबाद सीट ऐसी है, जहां पर सारे विपक्षी दलों के मिले कुल वोट भी भाजपा से 2.87 लाख से कम बैठते हैं। दोनों लोकसभा चुनाव परिणाम देखने के बाद तय है कि यदि 2019 में भाजपा रालोद से गठबंधन करता है तो पश्चिम में उसकी राह आसान हो सकती है। लेकिन यदि अकेले दम पर चुनाव मैदान में उतरती है, तो उसके सामने इस बार राह आसान नहीं होगी।
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