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वो मंजर... मैं और अमर उजाला, कहानी एक शख्स की जिसने अपनी जान पर खेलकर बचाईं 42 जिंदगियां

Thu, 12 Dec 2019 02:59 PM IST
Dimple Sirohi रैना पालीवाल, अमर उजाला, मेरठ
रैना पालीवाल, अमर उजाला, मेरठ Published by: Dimple Sirohi Updated Thu, 12 Dec 2019 02:59 PM IST
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Atul krishan, Story of a man who saved forty two lives
डॉ. अतुल कृष्ण - फोटो : अमर उजाला

अमर उजाला के अभ्युदय के छह माह ही बीते थे कि तभी शहर में दंगों की आग फैल गई। नवांकुर अमर उजाला के कंधों पर बड़ी जिम्मेदारी थी। जिसका उसने पूरी ईमानदारी और निष्ठा के साथ निर्वहन किया। पक्षपात से परे सधी हुई पत्रकारिता कर शहर की फिजा को शांत करने की कोशिश की। उस दौरान शहर में सुलहकुल की कई नजीर कायम हुई। कौमी एकता के उस गुलशन में एक नाम अतुल कृष्ण का भी है जिन्होंने अपनी जान पर खेलकर 42 मुस्लिम मरीजों और उनके तीमारदारों की जान बचाई।

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सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील कहे जाने वाले मेरठ में सुलहकुल का गुलशन भी खिलता है। इस गुलदस्ते में कई फूल हैं जो शूलों पर चलकर भी मुस्कुराते रहे हैं। फ्लैशबैक में जाते ही 87 का दंगा याद आता है जिसने महीनों तक शहर की रवानगी रोक दी थी। लोग एक दूसरे के दुश्मन बन गए थे।

उस वक्त एक शख्स ऐसा भी था जिसने दूसरे धर्म के लोगों की जिंदगी बचाने के लिए अपनी जान दांव पर लगा दी। कौमी एकता की इससे बड़ी मिसाल और क्या होगी। डॉ. अतुल कृष्ण ने न सिर्फ अपने हॉस्पिटल के 42 मुस्लिम मरीजों की जान बचाई बल्कि दंगे में प्रभावित हर व्यक्ति का निःशुल्क इलाज भी किया। डॉ. कृष्ण अब भी सांप्रदायिक सौहार्द की मशाल जलाए हैं। रक्षाबंधन और रमजान को उन्होंने एक धागे में पिरोया है।

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सुभारती यूनिवर्सिटी के संस्थापक डॉ. अतुल कृष्ण शहर की जानी मानी हस्तियों में से एक हैं। वह 1985 से जाति विहीन समाज आंदोलन चला रहे हैं। इसके लिए समय-समय पर जागरूकता कार्यक्रम करते रहते हैं। उनकी भावना समाज को जोड़ने की रही। इसी ने उन्हें 87 के दंगों में सामाजिक समरसता बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध किया।

डॉ. कृष्ण बताते हैं कि वह बहुत बुरा दौर था। मुस्लिम मरीज अपना इलाका छोड़कर मेरे नर्सिंग होम में आ गए। यह देखकर आसपास के लोग भड़क गए। वह गेट पर जमा होना शुरू हो गए। भीड़ आपा खो रही थी। हमने सभी मरीजों और उनके तीमारदारों को दूसरी मंजिल पर स्थित अपने घर में शिफ्ट किया। मेरे लिए वह मरीज थे, हिंदू-मुस्लिम नहीं। 

खाई पाटने का काम किया...
दंगे में अमर उजाला ने सधी हुई पत्रकारिता की। उसने खाई पाटने का काम किया। लोग इस चीज को महसूस करते हैं। यही उसकी लोकप्रियता का कारण भी है। 1993 में मैं बौद्धिस्ट बन गया। हम लोग जाति विहीन समाज के लिए कार्यक्रम करते रहते हैं।

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कई मुस्लिम बहनें मुझे राखी बांधती हैं। हमने एक नियम बनाया है, इफ्तारी करो तो रोजा भी रखो। मैं एक दिन रोजा रखता हूं और इफ्तारी का कार्यक्रम भी करता हूं। इस तरह हम भावनाओं को सांझा करते हैं। हम लोग गांवों में निःशुल्क चिकित्सा शिविर भी लगाते हैं। 

लोगों ने मुझे मारने की धमकी दी। मुझे वो मंजर आज भी याद है, एक आदमी ने पेट में त्रिशूल लगा दिया था। तभी पुलिस की जीप सड़क से गुजरी। मैंने उसे रोका। अफसर ने कहा, मैं 15 मिनट रुक सकता हंू। उतने समय में हमने मरीजों और घरवालों को दूसरी जगह शिफ्ट किया।

पुलिस के जाने के बाद गुस्साई भीड़ ने नर्सिंग होम लूट कर उसके फर्नीचर को बाहर निकालकर जला दिया। उस वक्त शांति समितियां बनी थीं। उनमें से एक हमारी भी थी। दोनों धर्मों को मिलाने में मध्यस्थता की। दंगे से प्रभावित हुए लोगों को निःशुल्क इलाज किया। कुछ सामाजिक संगठनों ने निःशुल्क दवाएं दी। उस वक्त कुछ ऐसे भी लोग थे जो मुस्लिम होकर हिंदू मरीजों के लिए रक्तदान कर रहे थे।

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