गंगानगर एक्सटेंशन में सरकार दे गई 100 करोड़ की टेंशन
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एमडीए ने गंगानगर एक्सटेंशन की एक लाख वर्ग मीटर से ज्यादा जमीन की जंग सुप्रीम कोर्ट में जीती। अभी यहां डेवलेपमेंट की विस्तृत प्लानिंग कर ही रहा था कि सूबे की पुरानी सरकार ने बड़ा खेल कर दिया। इस जमीन को मतगणना की तारीख से ठीक एक दिन पहले अधिग्रहण मुक्त कर दिया गया। सुप्रीम कोर्ट के आदेश को नजरअंदाज कर किए गए इस कारनामे पर एमडीए अधिकारी हतप्रभ हैं। इस बाबत एमडीए वीसी ने सरकार को पत्र लिखा है कि यह पूरी तरह से गलत किया गया है। सुप्रीम कोर्ट इस जमीन पर एमडीए का कब्जा बता चुका है। उधर, पूर्व विधायक डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी ने इस पूरे प्रकरण को मुख्यमंत्री के दरबार में रखने का एलान कर दिया है।
यह है प्रकरण
केस एक : गंगानगर एक्सटेंशन के लिए ग्राम अब्दुल्लापुर की भूमि खसरा नंबर 755, 756, 757, 758, 759, 760, 767, 768, 769 को अधिग्रहण में शामिल किया गया। इसका क्षेत्रफल कुल 5.703 हेक्टेयर यानी पचास हजार वर्ग मीटर से ज्यादा है। इस बाबत मुआवजा प्रतिकर आदि भी एमडीए ने जारी किया। लेकिन जब किसानों ने इसे नहीं लिया तो न्यायालय में यह रकम जमा करा दी गई। इस बाबत लंबी लड़ाई चली।
केस दो : इसी योजना के लिए इसी गांव की भूमि खसरा नंबर 535, 538, 552, 556 तथा 560 जिसका कुल क्षेत्रफल 5.576 हेक्टेयर है को भी अधिग्रहण में शामिल किया गया था। यहां भी प्रतिकर को लेकर विवाद चला जिसका मुआवजा कोषागार में जमा है। यदि इन जमीनों का बाजार भाव देखा जाए तो वर्तमान में सौ करोड़ रुपये से भी ज्यादा है।
सुप्रीम कोर्ट में जीत चुका एमडीए
इस जमीन की जंग एमडीए सुप्रीम कोर्ट में जीत चुका है। दो बार तो सुप्रीम कोर्ट से ही एमडीए के पक्ष में फैसला हो चुका है। सुदर्शन जैन की तरफ से इस प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दाखिल की गई थी। किसानों ने इस बाबत सीनियर एडवोकेट सलमान खुर्शीद को खड़ा किया। एमडीए की तरफ से एटार्नी जनरल भारत सरकार मुकुल रोहतगी ने पक्ष रखा। दस मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने एमडीए के पक्ष में फैसला दिया। अदालत ने माना कि एक्सटेंशन की 204 एकड़ जमीन पर एमडीए का कब्जा है। वहां एमडीए नियोजन कर रहा है और इस पर पैसा भी खर्च कर चुका है। यही कारण रहा कि किसानों की एसएलपी खारिज हो गई। इससे पूर्व किसान अदालत में यह वाद दायर कर चुके थे कि इस जमीन को नए भू अधिग्रहण के हिसाब से किसानों को वापस कर दिया जाए क्योंकि कब्जा किसानों का है। सुप्रीम कोर्ट ने आठ अप्रैल 2013 को फैसला दिया था कि भू अधिग्रहण एक्ट 1984 के तहत एमडीए ने इस जमीन का सही अधिग्रहण किया है। वहां भी एमडीए ने ही कानूनी जंग जीती थी।
मतगणना से एक दिन पहले आदेश
इन खसरा नंबरों को लेकर दस मार्च को उप्र शासन आवास एवं शहरी नियोजन अपर मुख्य सचिव सदाकांत ने पत्र जारी करते हुए अर्जन मुक्त कर दिया। 11 मार्च को काउंटिंग थी और उसके बाद नई सरकार का गठन हो गया। प्रदेश सरकार ने यह भी नहीं देखा कि सुप्रीम कोर्ट इस पर निर्णय दे चुकी है।
वीसी ने लिखा पत्र
इस बाबत वीसी एमडीए योगेेेंद्र यादव ने 28 मार्च को अपर मुख्य सचिव को दो पत्र लिखें हैं। दोनों ही प्रकरणों में कहा कि यह जमीनें गलत तरीके से अर्जन मुक्त की गई हैं। यहां एमडीए विकास के लिए 21 करोड़ खर्च कर चुका है। किसानों का प्रतिकर भी जारी कर चुका है। इतना ही नहीं, सुप्रीम कोर्ट इस पर एमडीए के पक्ष में आदेश दे चुका है और यह अदालत के आदेश की भी अवमानना है। ऐसे में अर्जन मुक्त करने के आदेश को निरस्त करें।
मुख्यमंत्री के सामने रखूंगा प्रकरण: वाजपेयी
इस मामले में पूर्व विधायक डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी ने बिगुल फूंक दिया है। उन्होंने कहा कि यह पूर्व की सरकार ने खेल किया और आचार संहिता लागू होने के बाद मतगणना से एक दिन पहले कैसे इस जमीन को अर्जन मुक्त कर दिया गया। सुप्रीम कोर्ट का आदेश भी नहीं देखा। उन्होंने कहा कि वे खुद जाकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सामने यह प्रकरण रखेंगे।