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बिटिया लेने आई, चारुबाला के लिए सार्थक हुआ मदर्स डे
ब्यूरो, अमर उजाला मथुरा
Updated Sat, 07 May 2016 11:45 PM IST
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वृंदावन की विधवाएं
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नगर के महिला आश्रय सदन वृद्ध और विधवा महिलाओं की शरणस्थली होने के साथ अपनों से ठुकराई गईं मां के घर भी हैं। ये मां धर्मनगरी को अपना आंगन और ठाकुरजी को परिवार मानने लगी हैं। लेकिन, ढलती आंखों में जब मां की ममता झलके तो कलेजे के टुकड़ों के अलावा कोई रास नहीं आता। अपने फिर से अपना लें तो इन माताओं के जीवन में भी ‘मदर्स डे’ सार्थक हो सके।
वृंदावन के ज्ञानगुदड़ी स्थित मीरा सहभागिनी आश्रय सदन में रहने वाली चारुबाला (85) के लिए शनिवार खुशी का दिन रहा। ‘मदर्स डे’ की पूर्व संध्या पर चारुबाला की बेटी कल्पना देवनाथ और दामाद कृष्णधर देवनाथ उन्हें घर ले जाने के लिए आए। चारुबाला त्रिपुरा से करीब चार साल पहले वृंदावन चलीं आईं थीं और परिवार से मिलने की उम्मीद ही छोड़ दी लेकिन शनिवार को अपनों को देखकर उनके चेहरे पर खुशी लौट आई।
आश्रय सदन के प्रभारी संतोष मिश्रा, अधीक्षक गीता दीक्षित, किरन दुबे, सह अधीक्षक ज्योति शर्मा ने चारुबाला के बैंक खाते से 1200 रुपये और फूडमनी के रूप में एकत्रित 908 रुपये उनकी बेटी को देकर कागजी कार्रवाई की और इसके बाद चारुबाला को परिवार सहित विदा किया गया। इस दौरान आश्रय सदन में मौजूद हर बूढ़ी आंख नम हो गई।
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इन्होंने ठाकुरजी को ही मान लिया परिवार
वृंदावन। चारुबाला की तरह ही कोलकाता की सुभद्रादासी भी आश्रय सदन में जीवन का अंतिम पड़ाव व्यतीत कर रही हैं। करीब दस साल में उन्हें संस्था ने सिलाई की ट्रेनिंग दी और आज सुभद्रादासी ने ठाकुरजी के अंग वस्त्र तैयार करने का काम सीखकर खुद को आत्मनिर्भर कर लिया है। सुभद्रा बताती हैं कि दस वर्ष पहले बच्चों ने घर से निकाल दिया और वह वृंदावन चलीं आईं। अब ठाकुरजी को ही परिवार मान लिया है।
पश्चिम बंगाल की पारुलदासी ने दो बेटियों की शादी के बाद से वृंदावन को अपना घर बना लिया है। पश्चिम बंगाल के आसनसोल निवासी दीपा कर्माकर बताती हैं कि पति के जाने के बाद परिवार ने घर से निकाल दिया तो वे मोक्ष की कामना लिए वृंदावन चलीं आईं। गायत्री दासी के बेटा-बहू ने मां को साथ नहीं रखना चाहा और लड़कर घर से निकाल दिया। इस पर मां का मन दुनिया से ही उचट गया और वे मनोरमा दासी के साथ वृंदावन चलीं आईं। अब यहीं भजन कर रही हैं।
महिला आश्रय सदन की अधीक्षक गीता दीक्षित बताती हैं कि वृंदावन के आश्रय सदनों में रह रहीं करीब 70 प्रतिशत महिलाएं भरे पूरे परिवार की हैं। लेकिन, मां को रखने के लिए किसी के पास जगह नहीं। अब इनका संसार और परिवार ठाकुरजी ही हैं।
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वृंदावन के ज्ञानगुदड़ी स्थित मीरा सहभागिनी आश्रय सदन में रहने वाली चारुबाला (85) के लिए शनिवार खुशी का दिन रहा। ‘मदर्स डे’ की पूर्व संध्या पर चारुबाला की बेटी कल्पना देवनाथ और दामाद कृष्णधर देवनाथ उन्हें घर ले जाने के लिए आए। चारुबाला त्रिपुरा से करीब चार साल पहले वृंदावन चलीं आईं थीं और परिवार से मिलने की उम्मीद ही छोड़ दी लेकिन शनिवार को अपनों को देखकर उनके चेहरे पर खुशी लौट आई।
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आश्रय सदन के प्रभारी संतोष मिश्रा, अधीक्षक गीता दीक्षित, किरन दुबे, सह अधीक्षक ज्योति शर्मा ने चारुबाला के बैंक खाते से 1200 रुपये और फूडमनी के रूप में एकत्रित 908 रुपये उनकी बेटी को देकर कागजी कार्रवाई की और इसके बाद चारुबाला को परिवार सहित विदा किया गया। इस दौरान आश्रय सदन में मौजूद हर बूढ़ी आंख नम हो गई।
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इन्होंने ठाकुरजी को ही मान लिया परिवार
वृंदावन। चारुबाला की तरह ही कोलकाता की सुभद्रादासी भी आश्रय सदन में जीवन का अंतिम पड़ाव व्यतीत कर रही हैं। करीब दस साल में उन्हें संस्था ने सिलाई की ट्रेनिंग दी और आज सुभद्रादासी ने ठाकुरजी के अंग वस्त्र तैयार करने का काम सीखकर खुद को आत्मनिर्भर कर लिया है। सुभद्रा बताती हैं कि दस वर्ष पहले बच्चों ने घर से निकाल दिया और वह वृंदावन चलीं आईं। अब ठाकुरजी को ही परिवार मान लिया है।
पश्चिम बंगाल की पारुलदासी ने दो बेटियों की शादी के बाद से वृंदावन को अपना घर बना लिया है। पश्चिम बंगाल के आसनसोल निवासी दीपा कर्माकर बताती हैं कि पति के जाने के बाद परिवार ने घर से निकाल दिया तो वे मोक्ष की कामना लिए वृंदावन चलीं आईं। गायत्री दासी के बेटा-बहू ने मां को साथ नहीं रखना चाहा और लड़कर घर से निकाल दिया। इस पर मां का मन दुनिया से ही उचट गया और वे मनोरमा दासी के साथ वृंदावन चलीं आईं। अब यहीं भजन कर रही हैं।
महिला आश्रय सदन की अधीक्षक गीता दीक्षित बताती हैं कि वृंदावन के आश्रय सदनों में रह रहीं करीब 70 प्रतिशत महिलाएं भरे पूरे परिवार की हैं। लेकिन, मां को रखने के लिए किसी के पास जगह नहीं। अब इनका संसार और परिवार ठाकुरजी ही हैं।