{"_id":"694c4071c7025799d80c17dd","slug":"tulsi-forest-vrinda-devi-temple-no-longer-exists-mathura-news-c-161-1-vrn1004-101025-2025-12-25","type":"story","status":"publish","title_hn":"Mathura News: तुलसी का वन, न रहे वृंदा देवी के मंदिर","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Mathura News: तुलसी का वन, न रहे वृंदा देवी के मंदिर
विज्ञापन
मनमोहन पारीक
वृंदावन। 25 दिसंबर को देशभर में मनाए जाने वाले तुलसी पूजन दिवस तुलसी वन कहे जाने वाले वृंदावन के लिए खास है। तीन ओर से यमुना से घिरे नगर को तुलसी वन (वृंदावन) के रूप में पहचान थी, जो कि अब कंक्रीट के वन में तब्दील हो गया। भक्ति काल में आचार्यों ने नगर में वृंदा देवी के कई मंदिर स्थापित किये, लेकिन कई मंदिरों के निशा भी बाकी न रहे। एक मंदिर से मुगल काल में वृंदा देवी की मूर्ति को राजस्थान पहुंचाया। बिन वृंदा देवी के वृंदावन का स्वरूप अब सिर्फ शास्त्र एवं प्राचीन पांडुलिपियों में रह गया।
नगर में वन देवी वृंदा (तुलसी) कई रूपों में भक्तों के सामने आई। राजस्थान की किशनगढ़ विरासत के राजा सावंत सिंह जिन्हें ब्रज में आने पर नागरिदास के रूप में पहचान मिली। उन्होंने नगर को तुलसी वन कहा और इसे इसे कुल देवी बताया। पुराणों में वर्णित देवी का स्वरूप तुलसी के पौधे के रूप में सामने आने के बाद वृंदा के साधकों ने वृंदा देवी को मूर्ति स्वरूप में पूजा। तभी नगर में जगह-जगह तुलसी वन के बीच वृंदावन देवी के मंदिर स्थापित किये गए। इनमें नगर के प्राचीन सप्त देवालयों में से एक गोविंद देव मंदिर के परिसर में आचार्य श्रील रूप गोस्वामी ने वृंदा देवी को प्राकट्य मंदिर में स्थापित किया। मुगल शासक औरंगजेब के समय इस मूर्ति को राजस्थान के कामां में विराजमान किया। तभी से मंदिर बिन वृंदा देवी के बंद है। संवाद
--
वृंदावन में थे वृंदा देवी के कई मंदिर
वृंदावन शोध संस्थान के शोध अधिकारी डॉ. राजेश शर्मा ने बताया कि प्राचीन पांडुलिपियों में नगर में वृंदा देवी के मंदिरों का उल्लेख मिलता है। नगर के गोपेश्वर महादेव मंदिर के समीप, छीपी गली, सेवा कुंज क्षेत्र में मंदिर थे। वृंदावन शोध संस्थान में संरक्षित संवत 1600 की पांडुलिपि में गोपेश्वर महादेव मंदिर के समीप वृंदा देवी की ठौर का उल्लेख है। संवत 1900 की पांडुलिपि वृंदावन धामानुरागावली में छीपी गली में गूधर-भूधर दास नामक महात्मा द्वारा सेवित वृंदा देवी का उल्लेख मिलता है। ब्रिटिश काल में मथुरा के जिलाधिकारी एफ एस ग्राउज ने मथुरा ए डिस्टिक मैमोयर में सेवा कुंज क्षेत्र में वृंदा देवी का मंदिर स्थापित होने की बात कही, लेकिन अब नगर में एक भी वृंदा देवी का मंदिर नहीं रहा।
विज्ञापन
--
तुलसीवन के पौराणिक स्वरूप में लाने की पहल
ठाकुर राधावल्लभ मंदिर के आचार्य सुकृत लाल गोस्वामी ने नगर को उसके वास्तविक रूप में लौटाने के लिए मंदिरों, आश्रमों, कुंजों और गौशालाओं में वृंदा वाटिका बनाने का अभियान चलाया। इसमें राधावल्लभ सेवा ट्रस्ट ने 5500 तुलसी के पौधे लगाये।
--
महेंद्री यक्षिणी का तुलसी के पौधे पर निवास
तीर्थ पुरोहित कपिल उपाध्याय ने बताया कि बौद्धकाल में भी वृंदा देवी के संकेत यक्षिणी वैंदा के रूप में मिलते हैं। कश्मीर के गिलगिट से प्राप्त बौद्ध ग्रंथों में वैंदा यक्षिणी उल्लेख है। जिसमें बताया गया कि महेन्द्री यक्षिणी का निवास तुलसी के पौधे पर मिलता है।
विज्ञापन
वृंदावन। 25 दिसंबर को देशभर में मनाए जाने वाले तुलसी पूजन दिवस तुलसी वन कहे जाने वाले वृंदावन के लिए खास है। तीन ओर से यमुना से घिरे नगर को तुलसी वन (वृंदावन) के रूप में पहचान थी, जो कि अब कंक्रीट के वन में तब्दील हो गया। भक्ति काल में आचार्यों ने नगर में वृंदा देवी के कई मंदिर स्थापित किये, लेकिन कई मंदिरों के निशा भी बाकी न रहे। एक मंदिर से मुगल काल में वृंदा देवी की मूर्ति को राजस्थान पहुंचाया। बिन वृंदा देवी के वृंदावन का स्वरूप अब सिर्फ शास्त्र एवं प्राचीन पांडुलिपियों में रह गया।
नगर में वन देवी वृंदा (तुलसी) कई रूपों में भक्तों के सामने आई। राजस्थान की किशनगढ़ विरासत के राजा सावंत सिंह जिन्हें ब्रज में आने पर नागरिदास के रूप में पहचान मिली। उन्होंने नगर को तुलसी वन कहा और इसे इसे कुल देवी बताया। पुराणों में वर्णित देवी का स्वरूप तुलसी के पौधे के रूप में सामने आने के बाद वृंदा के साधकों ने वृंदा देवी को मूर्ति स्वरूप में पूजा। तभी नगर में जगह-जगह तुलसी वन के बीच वृंदावन देवी के मंदिर स्थापित किये गए। इनमें नगर के प्राचीन सप्त देवालयों में से एक गोविंद देव मंदिर के परिसर में आचार्य श्रील रूप गोस्वामी ने वृंदा देवी को प्राकट्य मंदिर में स्थापित किया। मुगल शासक औरंगजेब के समय इस मूर्ति को राजस्थान के कामां में विराजमान किया। तभी से मंदिर बिन वृंदा देवी के बंद है। संवाद
विज्ञापन
वृंदावन में थे वृंदा देवी के कई मंदिर
वृंदावन शोध संस्थान के शोध अधिकारी डॉ. राजेश शर्मा ने बताया कि प्राचीन पांडुलिपियों में नगर में वृंदा देवी के मंदिरों का उल्लेख मिलता है। नगर के गोपेश्वर महादेव मंदिर के समीप, छीपी गली, सेवा कुंज क्षेत्र में मंदिर थे। वृंदावन शोध संस्थान में संरक्षित संवत 1600 की पांडुलिपि में गोपेश्वर महादेव मंदिर के समीप वृंदा देवी की ठौर का उल्लेख है। संवत 1900 की पांडुलिपि वृंदावन धामानुरागावली में छीपी गली में गूधर-भूधर दास नामक महात्मा द्वारा सेवित वृंदा देवी का उल्लेख मिलता है। ब्रिटिश काल में मथुरा के जिलाधिकारी एफ एस ग्राउज ने मथुरा ए डिस्टिक मैमोयर में सेवा कुंज क्षेत्र में वृंदा देवी का मंदिर स्थापित होने की बात कही, लेकिन अब नगर में एक भी वृंदा देवी का मंदिर नहीं रहा।
विज्ञापन
तुलसीवन के पौराणिक स्वरूप में लाने की पहल
ठाकुर राधावल्लभ मंदिर के आचार्य सुकृत लाल गोस्वामी ने नगर को उसके वास्तविक रूप में लौटाने के लिए मंदिरों, आश्रमों, कुंजों और गौशालाओं में वृंदा वाटिका बनाने का अभियान चलाया। इसमें राधावल्लभ सेवा ट्रस्ट ने 5500 तुलसी के पौधे लगाये।
महेंद्री यक्षिणी का तुलसी के पौधे पर निवास
तीर्थ पुरोहित कपिल उपाध्याय ने बताया कि बौद्धकाल में भी वृंदा देवी के संकेत यक्षिणी वैंदा के रूप में मिलते हैं। कश्मीर के गिलगिट से प्राप्त बौद्ध ग्रंथों में वैंदा यक्षिणी उल्लेख है। जिसमें बताया गया कि महेन्द्री यक्षिणी का निवास तुलसी के पौधे पर मिलता है।