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उमर कौ ना, भाव कौ खेल है रंगीली
रैना पालीवाल
Updated Fri, 27 Feb 2015 12:16 AM IST
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रंगीली की पूर्व बेला पर नई नवेली बहुओं से बहुत बातचीत की है। सोचा इस बार क्यों न बूढ़े मन की तरुण तरंगों को महसूस करें और आप तक पहुंचाएं। जो 60-70 साल लठामार खेले हैं और आज भी खेल रहे हैं। इतने लंबे वक्त में बहुत कुछ बदल गया। जमाना भी पहले जैसा न रहा, न शरीर की चुस्ती-फुर्ती। घुटने अब जवाब देने लगे हैं पर लठामार का नाम सुन वे भी जवान हो जाते हैं। तो चलिए रंगीली की इन नव युवतियों से मिलकर आते हैं।
छाजूराम बगीचा के पास एक घर में बैठी 90 वर्षीय चंद्रवती रंगीली का नाम सुन उत्साहित हो जाती हैं। कहती हैं, चौदह साल की ब्याह कै आई, तब से लठामार खेल रही हूं। अबकी बेर 75-76 वीं होली होगी। पहली बेर सास नै घूमरौ घाघरौ पहनायकै होली खेलन भेजौ। स्वामी सेठ भीड़ ते बचाते भये चल रहे। बा समय मन मै बड़ी उमंग हती। हुरियारेन के आवत ही मोमै ऐसौ जोश आय गयौ कि लठिया जोर जोर ते चलन लगी। या होरी कौ भाव ही कछू ऐसौ है। हम ठाकुर ते होली खेलैं। ज्वानी मै तौ तीन दिना पहले ते ही तैयारी करवे लग जावै ही। लठिया का नाम आते ही अम्मा नै बहू ते लठिया मंगाई और उछर उछर कै मारकै दिखावे लगीं। बहू बोलीं, अम्मा लग जावैगी पर बे काउ की नाय सुनैं।
बदलाव पर अम्मा बोलीं, पहलै इतेक भीड़ भाड़ नाय होती। अब तौ होली बहुत फैल गई है, पहलै रंगीली मै ही होय करै ही। हमकू सुहाग की चूनर और प्रसाद मिलतौ, अब तौ पैसा बंटन लगे हैं।
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चार साल पहले चंद्रवती के पति लाड़िलीशरण गोस्वामी का देहांत हो गया। इस बात को बताते हुए अम्मा की आंखें भर आईं। कहने लगीं, अब साज सिंगार नाय पर ठाकुर स्वामी तौ है। सो हर बेर बाके संग होरी खेलवे कू जाउं। बेटा
संसार बदल गयौ पर होरी नाय बदली। श्याम ते प्रेम कौ रंग और उ गाढ़ौ है गयौ है।
रंगीली गली की 75 वर्षीय त्रिवेणी भी पिछले छह दशक से लठामार की साक्षी हैं। पिछले कुछ सालों से बाहर नहीं जा पातीं पर द्वार पर ही हुरियारों को लट्ठ मारकर होली का सोन पूरा कर लेती हैं। कहती हैं, अब होली में चटक मटक ज्यादा है गई। हमाये जमाने में सब सादा हतौ। हर बेर पहली होली सो आनंद आवै। श्रीजी के रंग मै हम अबहू जवान हैं।
अबहू करै हुरियारिन ते हंसी ठट्ठा
उम्र 88 साल, झुर्रियों से घिरा चेहरा और हाथ में बेंत। इन्हें देख कोई नहीं कह सकता कि ये सिर पर ढाल रख लाठियों की चोट सहते होंगे पर ऐसा ही है। छाजूराम बगीचा के पास रहने वाले नंदकिशोर गोस्वामी आज भी होली खेलने के लिए नंदगांव जाते हैं।
कहते हैं, घुटने खराब हो गए हैं पर बैठके खेल लेता हूं। अब तक 68 लठामार खेल चुका हूं। जब हृदय में प्रेम और उल्लास होता है तो उम्र आड़े नहीं आती। अभी भी हुरियारिनों से हंसी ठिठोली करते हैं। प्रेम भरे रसिया गाते हैं। आधुनिकता ने इस परंपरागत होली पर थोड़ा प्रभाव डाला है। गुंडागर्दी, अराजकता होने लगी है।
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छाजूराम बगीचा के पास एक घर में बैठी 90 वर्षीय चंद्रवती रंगीली का नाम सुन उत्साहित हो जाती हैं। कहती हैं, चौदह साल की ब्याह कै आई, तब से लठामार खेल रही हूं। अबकी बेर 75-76 वीं होली होगी। पहली बेर सास नै घूमरौ घाघरौ पहनायकै होली खेलन भेजौ। स्वामी सेठ भीड़ ते बचाते भये चल रहे। बा समय मन मै बड़ी उमंग हती। हुरियारेन के आवत ही मोमै ऐसौ जोश आय गयौ कि लठिया जोर जोर ते चलन लगी। या होरी कौ भाव ही कछू ऐसौ है। हम ठाकुर ते होली खेलैं। ज्वानी मै तौ तीन दिना पहले ते ही तैयारी करवे लग जावै ही। लठिया का नाम आते ही अम्मा नै बहू ते लठिया मंगाई और उछर उछर कै मारकै दिखावे लगीं। बहू बोलीं, अम्मा लग जावैगी पर बे काउ की नाय सुनैं।
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बदलाव पर अम्मा बोलीं, पहलै इतेक भीड़ भाड़ नाय होती। अब तौ होली बहुत फैल गई है, पहलै रंगीली मै ही होय करै ही। हमकू सुहाग की चूनर और प्रसाद मिलतौ, अब तौ पैसा बंटन लगे हैं।
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चार साल पहले चंद्रवती के पति लाड़िलीशरण गोस्वामी का देहांत हो गया। इस बात को बताते हुए अम्मा की आंखें भर आईं। कहने लगीं, अब साज सिंगार नाय पर ठाकुर स्वामी तौ है। सो हर बेर बाके संग होरी खेलवे कू जाउं। बेटा
संसार बदल गयौ पर होरी नाय बदली। श्याम ते प्रेम कौ रंग और उ गाढ़ौ है गयौ है।
रंगीली गली की 75 वर्षीय त्रिवेणी भी पिछले छह दशक से लठामार की साक्षी हैं। पिछले कुछ सालों से बाहर नहीं जा पातीं पर द्वार पर ही हुरियारों को लट्ठ मारकर होली का सोन पूरा कर लेती हैं। कहती हैं, अब होली में चटक मटक ज्यादा है गई। हमाये जमाने में सब सादा हतौ। हर बेर पहली होली सो आनंद आवै। श्रीजी के रंग मै हम अबहू जवान हैं।
अबहू करै हुरियारिन ते हंसी ठट्ठा
उम्र 88 साल, झुर्रियों से घिरा चेहरा और हाथ में बेंत। इन्हें देख कोई नहीं कह सकता कि ये सिर पर ढाल रख लाठियों की चोट सहते होंगे पर ऐसा ही है। छाजूराम बगीचा के पास रहने वाले नंदकिशोर गोस्वामी आज भी होली खेलने के लिए नंदगांव जाते हैं।
कहते हैं, घुटने खराब हो गए हैं पर बैठके खेल लेता हूं। अब तक 68 लठामार खेल चुका हूं। जब हृदय में प्रेम और उल्लास होता है तो उम्र आड़े नहीं आती। अभी भी हुरियारिनों से हंसी ठिठोली करते हैं। प्रेम भरे रसिया गाते हैं। आधुनिकता ने इस परंपरागत होली पर थोड़ा प्रभाव डाला है। गुंडागर्दी, अराजकता होने लगी है।