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बहुमंजिल भवनों में ओझल हो रही मंदिरों की स्थापत्य कला

Sun, 02 Feb 2020 11:33 PM IST
Agra Bureau आगरा ब्यूरो
Updated Sun, 02 Feb 2020 11:33 PM IST
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govind dev mandir  mathura vrindavan
स्थापत्व कला का बेजोड़ नमूना कहे जाने वाला 16वीं सदी में बना श्रीगोविंद देव मंदिर, जो अब आसपास की इ? - फोटो : VRINDAVAN
वृंदावन। तीर्थनगरी में गोविंद देव मंदिर की चोटी पर जलने वाले दीपक की रोशनी दूर तक नजर आती थी। वहीं, मदनमोहन मंदिर के शिखर पर लगे स्वर्ण कलश कोसों दूर से दिखाई देते थे, लेकिन अब बहुमंजिले भवनों के कारण मंदिर और इसकी स्थापत्य कला ओझल सी हो रही है। श्रद्धालुओं को इन मंदिरों को ढूंढने पड़ते हैं।
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वृंदावन की आभा वर्षों पहले तक देखते ही बनती थी। 16वीं सदी में बने मंदिरों की भव्यता का आकर्षण देशभर में रहा है। इसमें गोमा टीले पर बने गोविंद देव मंदिर के पत्थरों पर बनीं लीलाएं और कलात्मक नक्काशी ने दुनिया भर के पर्यटकों को आकर्षित किया है।
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ब्रिटिशकाल में मथुरा के डीएम रहे एफएस ग्राउस ने इस मंदिर को उत्तर भारत का भव्यतम मंदिर बताया था। वृंदावन में यह ख्याति सिर्फ गोविंद देव मंदिर की नहीं है, यहां अनेक देवायल इसी श्रेणी के हैं।
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द्वादिशादित्य टीले पर स्थापित मदन मोहन मंदिर की खूबसूरती की चर्चा तो लंदन में आज भी होती है। लंदन स्थित इंडिया आफिस लाइब्रेरी में रखी इस मंदिर की पेंटिंग यमुना किनारे के इसके तत्कालीन सौंदर्य को दिखाती है।
करीब 500 साल पहले बने गोपीनाथ मंदिर एवं युगलकिशोर मंदिर की स्थापत्य कला भी सदियों से लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र रहीं हैं। भगवान श्रीराधाकृष्ण की लीला स्थली पर राधावल्लभ मंदिर का अद्भुत आकर्षण भी किसी से कम नहीं है।
अब वृंदावन में ठाकुर जी के दर्शन को आने वाले श्रद्धालुओं को इनकी भव्यता सहज नजर नहीं आती है। आसपास घनी आबादी और ऊंचे भवनों ने इन्हें ढक लिया है। श्रीबांकेबिहारी मंदिर भी इससे अछूता नहीं है।
जिम्मेदार सरकारी मशीनरी मंदिरों के संरक्षण के लिए उपयुक्त कदम उठाए
पुरातत्व विभाग, विकास प्राधिकरण, पर्यटन विभाग सहित नगर विकास से जुड़े विभागों की उदासीनता से यह स्थिति उत्पन्न हुई है। जिम्मेदार सरकारी मशीनरी प्राचीन मंदिरों के संरक्षण के लिए उपयुक्त कदम उठाए तो वृंदावन का वास्तविक स्वरूप फिर लौट सकता है।
-मोहित मराल गोस्वामी, सेवायत, श्रीराधावल्लभ मंदिर
तय मानकों का नहीं हो रहा पालन
प्राचीन धरोहर भले ही सरकारी संरक्षण में हो, लेकिन तय मानकों का पालन नहीं किया जा रहा है। वृंदावन के प्राचीन संरक्षित मंदिरों के आसपास ऊंचे भवनों का निर्माण इसे दर्शाता भी है। इसके लिए ठोस योजना पर काम करने की जरूरत है।
-आचार्य सुकुमार गोस्वामी सेवायत, गोविंद देव मंदिर
मंदिर के आसपास वृक्षों पर काम करना चाहिए
वृंदावन का मूल स्वरूप अब काफी हद तक नहीं रहा है। यह आधुनिक शहर बन गया है। सरकार को चाहिए कि वह वृंदावन की मूल संरचना, जिसका उल्लेख पुराने ग्रंथों में मिलता है को दृष्टिगत रखते हुए विकास की योजनाएं बनाए। मंदिर के आसपास वृक्षों पर काम करना चाहिए। -आचार्य विष्णु मोहन नागार्च सेवायत, मंदिर प्रियावल्लभ कुंज
धार्मिक नगरी का मूल स्वरूप कहीं नजर नहीं आता
वृंदावन अब आधुनिक शहर बन गया है। यहां बड़ी-बड़ी इमारत नजर आती हैं। इस धार्मिक नगरी का मूल स्वरूप अब कहीं नजर नहीं आता है। सरकार को इसके बचाने के लिए काम करना चाहिए।

-सुरेशचंद्र शर्मा उपाध्यक्ष, तीर्थ पुरोहित सभा, वृंदावन
ठोस योजना क्रियान्वित करने की जरूरत
ऊंची भवनों के लिए रजिस्ट्री विभाग, विकास प्राधिकरण जिम्मेदार हैं। बगैर जांच पड़ताल के वृंदावन की जमीनों की रजिस्ट्री की जा रही है। वहीं निर्माण के मानकों को दरकिनार करने में विकास प्राधिकरण का योगदान है। वृंदावन के मूल स्वरूप के लिए ठोस योजना क्रियान्वित करने की जरूरत है।
-मधुमंगल शुक्ला, आरटीआई कार्यकर्ता
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