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संसाधनों की कमी ने डाले ‘ज्ञान के भंडार पर’ ताले
अमर उजाला
Updated Thu, 28 Apr 2016 12:17 AM IST
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पुस्तकालय
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40000 बेेशकीमती पुस्तकाें की विरासत सहेजने वाले राजकीय संग्रहालय के पुस्तकालय की बीते आठ साल से देखरेख करने वाला कोई नहीं। इसके चलते पुस्तकालय बंद रहता है। संग्रहालय प्रशासन की ओर से चार साल में 50000 की पुस्तकें भी खरीदी गईं लेकिन पुस्तकालय न खुलने के चलते लोग इस ज्ञान के भंडार से दूर हैं।
आरटीआई कार्यकर्ताओं की संस्था ‘परिवर्तन’ से जुड़े एक्टिविस्ट राम गुप्ता ने जनसूचना अधिकार के तहत राजकीय संग्रहालय से कुछ बिंदुओं पर सूचनाएं मांगी थीं। इसमें संग्रहालय प्रशासन ने अवगत कराया है कि पुस्तकालय में पुस्तकालय अध्यक्ष और बुक बाइंडर के पद बीते आठ साल से खाली हैं। इस कारण पुस्तकालय बंद है।
दिलचस्प बात ये है इसी आवेदन पर संग्रहालय प्रशासन ने अवगत कराया है कि पुस्तकालय के लिए बीते चार सालों में लगभग 50000 रुपये की पुस्तकें खरीदी गई हैं। ऐसे में बड़ा सवाल ये है कि जब पुस्तकालय ही बंद है तो हजारों की पुस्तकेें खरीदने का औचित्य ही क्या रह जाता है।
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बता दें कि मथुरा के राजकीय संग्रहालय के पुस्तकालय में 40000 से अधिक अनमोल पुस्तकों का खजाना पहले से ही है। राजकीय संग्रहालय के सहायक निदेशक डा. एसपी सिंह ने बताया मानव संसाधन की कमी के चलते पुस्तकालय नहीं खुल पाता है लेकिन शोध करने वाले छात्रों के लिए इसे खोल दिया जाता है।
बैठकर पढ़ने का पर्याप्त स्थान भी नहीं
मथुरा। मथुरा का गौरवमयी इतिहास जानने के लिए नई पीढ़ी बेताब है। इसके लिए पुस्तकों का खजाना भी है लेकिन पुस्तकालय बंद रहने से युवा इससे दूर हैं। मथुरा का डैंपियर नगर स्थित राजकीय पुस्तकालय 60000 पुस्तकों का खजाना समेटे है। यहां जगह का अभाव नई पीढ़ी को ज्ञान हासिल करने में रोक रहा है।
एक ही भवन के नीचे पुस्तकों का खजाना, स्टाफ के बैठने की व्यवस्था के बीच चंद कुर्सियां पड़ी हैं। यहां धूप की तेजी सीधे प्रहार करती है। ऐसे में अध्ययन की सोचना भी मुश्किल है। यहां कार्यरत कोआर्डिनेटर गौरव सिंह ने बताया पुस्तकालय में 60000 से अधिक किताबें हैं, इनमें हिंदी और अंग्रेजी के साहित्य के साथ ही भारतीय संस्कृति और सामाजिक व्यवस्था से जुड़ी किताब हैं। भवन और पाठकों की मूल समस्याओं के समाधान के लिए लगातार पत्राचार किया जा रहा है।
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आरटीआई कार्यकर्ताओं की संस्था ‘परिवर्तन’ से जुड़े एक्टिविस्ट राम गुप्ता ने जनसूचना अधिकार के तहत राजकीय संग्रहालय से कुछ बिंदुओं पर सूचनाएं मांगी थीं। इसमें संग्रहालय प्रशासन ने अवगत कराया है कि पुस्तकालय में पुस्तकालय अध्यक्ष और बुक बाइंडर के पद बीते आठ साल से खाली हैं। इस कारण पुस्तकालय बंद है।
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दिलचस्प बात ये है इसी आवेदन पर संग्रहालय प्रशासन ने अवगत कराया है कि पुस्तकालय के लिए बीते चार सालों में लगभग 50000 रुपये की पुस्तकें खरीदी गई हैं। ऐसे में बड़ा सवाल ये है कि जब पुस्तकालय ही बंद है तो हजारों की पुस्तकेें खरीदने का औचित्य ही क्या रह जाता है।
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बता दें कि मथुरा के राजकीय संग्रहालय के पुस्तकालय में 40000 से अधिक अनमोल पुस्तकों का खजाना पहले से ही है। राजकीय संग्रहालय के सहायक निदेशक डा. एसपी सिंह ने बताया मानव संसाधन की कमी के चलते पुस्तकालय नहीं खुल पाता है लेकिन शोध करने वाले छात्रों के लिए इसे खोल दिया जाता है।
बैठकर पढ़ने का पर्याप्त स्थान भी नहीं
मथुरा। मथुरा का गौरवमयी इतिहास जानने के लिए नई पीढ़ी बेताब है। इसके लिए पुस्तकों का खजाना भी है लेकिन पुस्तकालय बंद रहने से युवा इससे दूर हैं। मथुरा का डैंपियर नगर स्थित राजकीय पुस्तकालय 60000 पुस्तकों का खजाना समेटे है। यहां जगह का अभाव नई पीढ़ी को ज्ञान हासिल करने में रोक रहा है।
एक ही भवन के नीचे पुस्तकों का खजाना, स्टाफ के बैठने की व्यवस्था के बीच चंद कुर्सियां पड़ी हैं। यहां धूप की तेजी सीधे प्रहार करती है। ऐसे में अध्ययन की सोचना भी मुश्किल है। यहां कार्यरत कोआर्डिनेटर गौरव सिंह ने बताया पुस्तकालय में 60000 से अधिक किताबें हैं, इनमें हिंदी और अंग्रेजी के साहित्य के साथ ही भारतीय संस्कृति और सामाजिक व्यवस्था से जुड़ी किताब हैं। भवन और पाठकों की मूल समस्याओं के समाधान के लिए लगातार पत्राचार किया जा रहा है।