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जवाहर बाग हिंसा की जांच में हर कदम पर लापरवाही
पुनीत शर्मा
Updated Sat, 04 Mar 2017 10:42 PM IST
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jawahar bagh
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प्रदेश में हिंसा की सबसे बड़ी घटना। दो पुलिस अधिकारियों समेत 29 लोगों की मौत और सैकड़ों घायल। यूपी ही नहीं देशभर में सुर्खियां बनने वाली इस घटना की जांच में हर कदम पर लापरवाही बरती गई। गवाह ऐसे बने जो मुकरने लगे। तमाम पहुंचे ही नहीं। जो लोग पकड़े गए उनकी शिनाख्त भी पीड़ितों से नहीं कराई गई। बरामद असलहों पर फिंगर प्रिंट तक नहीं तलाशे गए।
मथुरा के जवाहरबाग में दो जून, 2016 को हुई हिंसा में एसपी सिटी मुकुल द्विवेदी और थानाध्यक्ष संतोष यादव की मौत हो गई थी। रामवृक्ष यादव समेत 27 कब्जाधारी भी मारे गए थे। पुलिस ने उस वक्त जवाहरबाग में जो भी मिला उसे गिरफ्तार कर लिया। इतना ही नहीं आपाधापी में मजबूत साक्ष्य भी नहीं जुटाए गए। पुलिस ने जवाहरबाग से तमाम को पकड़ा और बाद में मुल्जिम बनाकर जेल भेज दिया। लेकिन नियम है कि जिसे भी मुल्जिम बनाया जाता है कि उसकी शिनाख्त पीड़ित पक्ष से कराई जाती है। ताकि वह यह कह सके कि जवाहरबाग में इन्हीं लोगों ने पुलिस पर हमला किया था। लेकिन पहचान कराई ही नहीं गई।
पुलिस की तफ्तीश में वैज्ञानिक आधार बहुत कमजोर रहा। जवाहरबाग से जो असलहे बरामद किए थे उन्हें जांच के लिए प्रयोगशाला को भेजना चाहिए था। फिंगरप्रिंट लिए जाते। ताकि उंगलियों के निशान के आधार पर केस में मजबूती आ सके लेकिन ऐसा नहीं किया गया। जब हिंसा हुई थी और तमाम लोग घायल हुए तो किसी के खून से सनी शर्ट या फिर दूसरा कपड़ा जांच के लिए लैब को भेजा जाता। वह भी एक बड़ा साक्ष्य साबित होता है। लेकिन यह भी नहीं हुआ।
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85 साल की सिंगारो को बनाया था मुल्जिम
जवाहरबाग हिंसा में एक 85 साल की महिला सिंगारो देवी को भी मुल्जिम बनाया गया था। सिंगारो पर दो नेपाली लोगों को बंधक बनाने वाली भीड़ में शामिल रहने का आरोप था। जब सिंगारो को कोर्ट में पेश किया गया तो वह चल भी नहीं पा रही थी। दो लोग उसे अदालत लेकर पहुंचे थे। अदालत ने उसकी स्थिति को देखते हुए उसे बरी कर दिया। कहा गया था कि उसने जो आठ महीने का वक्त अदालत में बिताया है वही उसकी सजा है।
कोर्ट में मुकर गए थे गवाह
उद्यान विभाग के बाबू देवी सिंह ने मुकदमा दर्ज कराया था कि रामवृक्ष और उसके साथियों ने उस पर हमला किया था। इस मामले में रामवृक्ष समेत 8 लोगों पर मुकदमा दर्ज कराया गया था। पुलिस ने आठ लोगों को कोर्ट के सामने पेश करके जब शिनाख्त कराई तो देवी सिंह ने कहा कि वह इनमें से किसी को नहीं जानता। वह तो केवल रामवृक्ष को ही पहचानता था। इसी आधार पर मारपीट के मामले में कब्जाधारी बरी हो गए।
ये होना चाहिए था
- गिरफ्तार लोगों की पीड़ितों से शिनाख्त कराई जाती
-बरामद असलहों पर फिंगर प्रिंट तलाशे जाते
-खून से सने कपड़ों को फोरेंसिक लैब भेजा जाता
-हिंसा की तफ्तीश जांच के एक्सपर्ट से कराई जाती
-जवाहरबाग से बरामद वाहनों का सुराग लगाया जाता
- पुलिस पब्लिक से भी मजबूत गवाहों को शामिल करती
- क्राइम सीन से बरामद दस्तावेज लैब को भेजे जाते
- रामवृक्ष समेत सभी मरने वालों का डीएनए टेस्ट होता
एक भी दफा नहीं कराई गई वीडियोग्राफी
रामवृक्ष यादव और उसके समर्थकों ने करीब 28 महीने तक जवाहरबाग पर कब्जा जमाए रखा। कभी गेट पर महिला लठैत दिखती थीं तो कभी गश्त करते हुए। लेकिन पुलिस और प्रशासन ने इस भीड़ की एक भी दफा वीडियोग्राफी नहीं कराई। अगर वीडियोग्राफी होती तो इसे बतौर साक्ष्य बनाकर पेश किया जा सकता था। अफसरों का कहना है कि पहले कौन जानता था कि यह भीड़ कभी इतनी बड़ी घटना करा देगी।
ट्रेनी कांस्टेबिल से लेकर अफसरों तक के बयान होंगे
जवाहरबाग हिंसा की जांच सीबीआई ने शुरू कर दी है। शुक्रवार को सीबीआई के अफसर मथुरा पहुंचे और घटना से जुड़े जरूरी दस्तावेज ले गए। अब सभी अफसरों की भी सीबीआई के सामने पेशी होगी। ट्रेनी कांस्टेबिल से लेकर पुलिस और प्रशासनिक अफसर बयान देने के लिए बुलाए जाएंगे। इन्हीं के बयानों के आधार पर जांच आगे बढ़ेगी।
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मथुरा के जवाहरबाग में दो जून, 2016 को हुई हिंसा में एसपी सिटी मुकुल द्विवेदी और थानाध्यक्ष संतोष यादव की मौत हो गई थी। रामवृक्ष यादव समेत 27 कब्जाधारी भी मारे गए थे। पुलिस ने उस वक्त जवाहरबाग में जो भी मिला उसे गिरफ्तार कर लिया। इतना ही नहीं आपाधापी में मजबूत साक्ष्य भी नहीं जुटाए गए। पुलिस ने जवाहरबाग से तमाम को पकड़ा और बाद में मुल्जिम बनाकर जेल भेज दिया। लेकिन नियम है कि जिसे भी मुल्जिम बनाया जाता है कि उसकी शिनाख्त पीड़ित पक्ष से कराई जाती है। ताकि वह यह कह सके कि जवाहरबाग में इन्हीं लोगों ने पुलिस पर हमला किया था। लेकिन पहचान कराई ही नहीं गई।
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पुलिस की तफ्तीश में वैज्ञानिक आधार बहुत कमजोर रहा। जवाहरबाग से जो असलहे बरामद किए थे उन्हें जांच के लिए प्रयोगशाला को भेजना चाहिए था। फिंगरप्रिंट लिए जाते। ताकि उंगलियों के निशान के आधार पर केस में मजबूती आ सके लेकिन ऐसा नहीं किया गया। जब हिंसा हुई थी और तमाम लोग घायल हुए तो किसी के खून से सनी शर्ट या फिर दूसरा कपड़ा जांच के लिए लैब को भेजा जाता। वह भी एक बड़ा साक्ष्य साबित होता है। लेकिन यह भी नहीं हुआ।
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85 साल की सिंगारो को बनाया था मुल्जिम
जवाहरबाग हिंसा में एक 85 साल की महिला सिंगारो देवी को भी मुल्जिम बनाया गया था। सिंगारो पर दो नेपाली लोगों को बंधक बनाने वाली भीड़ में शामिल रहने का आरोप था। जब सिंगारो को कोर्ट में पेश किया गया तो वह चल भी नहीं पा रही थी। दो लोग उसे अदालत लेकर पहुंचे थे। अदालत ने उसकी स्थिति को देखते हुए उसे बरी कर दिया। कहा गया था कि उसने जो आठ महीने का वक्त अदालत में बिताया है वही उसकी सजा है।
कोर्ट में मुकर गए थे गवाह
उद्यान विभाग के बाबू देवी सिंह ने मुकदमा दर्ज कराया था कि रामवृक्ष और उसके साथियों ने उस पर हमला किया था। इस मामले में रामवृक्ष समेत 8 लोगों पर मुकदमा दर्ज कराया गया था। पुलिस ने आठ लोगों को कोर्ट के सामने पेश करके जब शिनाख्त कराई तो देवी सिंह ने कहा कि वह इनमें से किसी को नहीं जानता। वह तो केवल रामवृक्ष को ही पहचानता था। इसी आधार पर मारपीट के मामले में कब्जाधारी बरी हो गए।
ये होना चाहिए था
- गिरफ्तार लोगों की पीड़ितों से शिनाख्त कराई जाती
-बरामद असलहों पर फिंगर प्रिंट तलाशे जाते
-खून से सने कपड़ों को फोरेंसिक लैब भेजा जाता
-हिंसा की तफ्तीश जांच के एक्सपर्ट से कराई जाती
-जवाहरबाग से बरामद वाहनों का सुराग लगाया जाता
- पुलिस पब्लिक से भी मजबूत गवाहों को शामिल करती
- क्राइम सीन से बरामद दस्तावेज लैब को भेजे जाते
- रामवृक्ष समेत सभी मरने वालों का डीएनए टेस्ट होता
एक भी दफा नहीं कराई गई वीडियोग्राफी
रामवृक्ष यादव और उसके समर्थकों ने करीब 28 महीने तक जवाहरबाग पर कब्जा जमाए रखा। कभी गेट पर महिला लठैत दिखती थीं तो कभी गश्त करते हुए। लेकिन पुलिस और प्रशासन ने इस भीड़ की एक भी दफा वीडियोग्राफी नहीं कराई। अगर वीडियोग्राफी होती तो इसे बतौर साक्ष्य बनाकर पेश किया जा सकता था। अफसरों का कहना है कि पहले कौन जानता था कि यह भीड़ कभी इतनी बड़ी घटना करा देगी।
ट्रेनी कांस्टेबिल से लेकर अफसरों तक के बयान होंगे
जवाहरबाग हिंसा की जांच सीबीआई ने शुरू कर दी है। शुक्रवार को सीबीआई के अफसर मथुरा पहुंचे और घटना से जुड़े जरूरी दस्तावेज ले गए। अब सभी अफसरों की भी सीबीआई के सामने पेशी होगी। ट्रेनी कांस्टेबिल से लेकर पुलिस और प्रशासनिक अफसर बयान देने के लिए बुलाए जाएंगे। इन्हीं के बयानों के आधार पर जांच आगे बढ़ेगी।