{"_id":"148-64013","slug":"Kasganj-64013-148","type":"story","status":"publish","title_hn":"आजादी के लिए सही यातनाएं, लेकिन नहीं रोके कदम ","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
आजादी के लिए सही यातनाएं, लेकिन नहीं रोके कदम
Kasganj
Updated Sun, 11 Aug 2013 05:34 AM IST
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कासगंज। जनपद का इतिहास स्वतंत्रता सेनानियों की गौरव गाथाओं से भरा हुआ है। 1857 का आंदोलन रहा हो या फिर नमक सत्याग्रह व सविनय अवज्ञा आंदोेेलन रहा हो। आजादी के दीवाने अपना बलिदान देने से भी पीछे नहीं हटे। तमाम यातनाएं सहीं, जेल गए, जुर्माना अदा किया, लाठी गोलियां खाई, लेकिन अपने कदम पीछे नहीं हटाए।
तोप के गोले खाकर भी नहीं हटे पीछेे
कासगंज (ब्यूरो)। गंगा के तटवर्ती कादरगढ़ का किला 1857 के आंदोलन में क्रांतिकारियों का गढ़ रहा। क्रांतिकारी टोडर सिंह, हरीहर सिंह, जोधा सिंह, विजय सिंह की टोली क्रांति से संबंधित रणनीति इसी किले में बनाते थे। जब भी मौका लगता ये क्रांति वीर अंग्रेजों को धूल चटाने से नहीं चूकते। अंग्रेजी फौजों ने क्रांति वीरों को नष्ट करने के लिए तोप के गोले बरसाएं, जिससे कादरगढ़ का गढ़ ध्वस्त हुआ। लेकिन इन क्रांतिकारियों ने जमकर लोहा लिया, अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिए।
महिलाएं भी नहीं रहीं पीछे
कासगंज (ब्यूरो)। कासगंज की महिलाओं ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान विदेशी कपड़ों एवं शराब की दुकानों पर धरने दिए। प्रभात फेरियां निकाली वहीं अमन सभाएं भंग की। सन 1930 से लेकर 1942 तक के आंदोलनों में महिलाओं की बढ़-चढ़कर भागीदारी के तमाम दृष्टांत स्वतंत्रता के इतिहास में मौजूद है। अमांपुर के मोहनपुर गांव की गंगादेवी पाराशर, मोहनपुर की ही गंगा देवी पत्नी पुरुषोत्तम, कासगंज के स्वतंत्रता सेनानी मानपाल गुप्ता की पत्नी मायादेवी शिवरानी पत्नी निरंकार प्रसाद, सोेरों की नरेंद्र देवी पत्नी परमानंद, प्रेमवती गुप्ता ने स्वतंत्रता की ज्वाला को तेज करने में सहयोग दिया।
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कटरी में खूब जली आजादी की जंग की मसाल
कासगंज (ब्यूरो)। कटरी के इलाके आजादी की जंग की मशाल तेज लौ के साथ जली। 1942 में गांधी के अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन को लेकर कटरी के गांव बढ़ौला में क्रांतिकारियों ने स्वतंत्रता की जंग में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। बढ़ौला के निवासी ठाकुर चीतर सिंह के तीन पुत्र भूपसिंह, पंजाब सिंह एवं आलम सिंह ने अगुवाई कर ग्रामीणों के सहयोग से अंग्रेजी फौजों के दमन को रोका। जब अंग्रेजी फौज के लोग एक रामू के नाम के निर्दोष ग्रामीण को गांव में नंगा करके पीटते हुए अपने साथ ले जा रहे थे तो लोगों का खून खौल गया। चीतरसिंह के पुत्रों की अगुवाई में न केवल अंग्रेजी फौजों से मुकाबला किया, बल्कि उनके चंगुल से निर्दोष रामू को छुड़वाया। पीटर नामक अंग्रेज सिपाही को उस दौरान जमकर पीटा गया। 18 दिसंबर 1942 को अंग्रेजों ने तीनों भाईयों को गिरफ्तार कर लिया। उन्हें दो साल की सजा हुई। दतियाना निवासी कुंदन लाल पांडेय के पुत्र राजाराम पांडेय एवं ग्या प्रसाद पांडेय ने भी बढ़ चढ़कर स्वतंत्रता के आंदोलन में हिस्सा लिया। अंग्रेजी सिपाही रोस्टेलर को भी जमकर पीटा गया। अंग्रेजी फोजों ने योजना पूर्वक दोनों भाईयों को गिरफ्तार कर गंभीर यातनाएं दी और कानपुर जेल में रखा।
भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरू के साथ सजा पाई थी महावीर ने
-78 वर्ष बाद प्रशासन को आई उनकी प्रतिमा लगाने की याद
पटियाली। पटियाली तहसील क्षेत्र के ग्राम शाहपुर टहला निवासी अमर शहीद महावीर सिंह राठौर का जन्म जमींदार देवी सिंह राठौर की तीसरी संतान के रूप में 16 सितंबर 1904 को हुआ था। वे गणेश शंकर विद्यार्थी के संपर्क में आए क्रांतिकारियों की टोली में शामिल हो गए। भारत माता की सेवा के चलतेे मंडप से ही भाग गए और लाहौर जाकर भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु के साथ शामिल हो गए। साइमन कमीशन का विरोध करते हुए अंग्रेजों द्वारा लाठियां बरसाए जाने के दौरान लाला लाजपत राय की मौत हो गई तो इन्होंने अंग्रेज अफसर साइमन सांडर्स की हत्या कर दी, जिसके बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया और काला पानी की सजा दी गई। उन्हें अंडमान निकोबार की सेल्यूलर जेल भेजा गया। जेलर द्वारा प्रताड़ित करने पर इन्होंने भूख हड़ताल की। 17 मई 1933 को अमर शहीद महावीर सिंह राठौर हमेशा-हमेशा के लिए भारत मां की गोद में समा गए। आज भी शाहपुर टहला गांव में इनके परिवार की गिनती अच्छे किसानों के रूप में की जाती है इनके परिवार के अथक प्रयासों के बाद मृत्यु के 78 वर्ष बाद इनकी 150 वीं जयंती के अवसर पर प्रदेश सरकार ने एक जून सन् 2011 में तहसील पटियाली के प्रांगण में इनकी प्रतिमा लगवाई। जिसका अनावरण तत्कालीन जिलाधिकारी सेल्वा कुमारी जे द्वारा किया गया।
सही यातनाएं, गए जेल
गंजडुंडवारा। स्वतंत्रता सेेनानी स्वर्गीय श्यामबाबू गुप्त पुत्र रामचरन लाल को 1942 के भारत छोड़ाें आंदोलन में हिस्सा लेने पर 15 मास की कैद और 150 रुपये जुर्माना की सजा दी गई। स्वर्गीय रघुवर दयाल सेठ पुत्र किशनलाल को इसी आंदोेलन में हिस्सा लेने पर 100 रुपये जुर्माना और जुर्माना न देने पर एक मास की कड़ी दी गई। स्वर्गीय वेंचे लाल शर्मा पुत्र श्यामलाल शर्मा ने नमक सत्याग्रह आंदोलन में आजादी की ज्वाला जलाई। 1930 में दो मास की कड़ी कैद तथा सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान 1932 में 15 मास की कैद तथा 25 रुपये जुर्माना लगाया गया। स्वर्गीय वैध छत्तर सिंह पुत्र मानसिंह को व्यक्तिगत सत्याग्रह के दौरान 1941 में चार मास की कैद और 50 रुपये जुर्माना भारत छोड़ों आंदोलन के दौरान 1942 में एक मास की कड़ी कैद की सजा पाई। स्वर्गीय उजागर लाल पुत्र चिराेंजी लाल ने भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान 1942 में 18 मास की कड़ी कैद 50 रुपये जुर्माना की सजा पायी।
आजादी के इतने साल बीत जाने के बाद भी सरकारें देशवासियों के अंदर विश्वास पैदा नहीं कर सकीं। देश की सुरक्षा को लेकर भी सरकार उदासीन हैं। शत्रुदेश जब तब सीमा में घुस आते हैं। पाकिस्तान तो सैनिकों की हत्या करने से भी नहीं चूकता। आजादी का जो सपना देखा गया था वह आज भी अधूरा है।
नरेश अग्र्र्र्रवाल सूत की मंडी
देश तो आजाद हो गया, लेकिन आज भी आजादी का मतलब पूरा नहीं हुआ है। अमीरी गरीबी की खाई लगातार चौड़ी हो रही है। आम आदमी सरकार की गलत नीतियों से अपने को उपेक्षित महसूस करता है। स्वतंत्रता दिवस के मायने बदल गए हैं। जो उत्साह आजादी के समय था वह आज लुप्त होता जा रहा है। आजादी का जश्न स्कूल कालेज, सरकारी स्तर तक सिमट कर रह गया है।
राम प्रकाश गुप्ता मनौटा गली कासगंज
एडवाइजरी
अगर आपके पास भी है स्वतंत्रता दिवस के संबंघ में कोई विचार या समस्या या फिर अंग्रेजों के जमाने के कानून से प्रभावित रहे है तो आपके पास है मौका उन्हें अमर उजाला के साथ शेयर करने का हमारे इन नंबर और मेल आईडी पर संपर्क कर आप अपनी जानकारी को अमर उजाला में प्रकाशित करा सकते है।
अजय झंवर 9675835413, मनोज माहेश्वरी 9897154885 पर भेज सकते है।
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तोप के गोले खाकर भी नहीं हटे पीछेे
कासगंज (ब्यूरो)। गंगा के तटवर्ती कादरगढ़ का किला 1857 के आंदोलन में क्रांतिकारियों का गढ़ रहा। क्रांतिकारी टोडर सिंह, हरीहर सिंह, जोधा सिंह, विजय सिंह की टोली क्रांति से संबंधित रणनीति इसी किले में बनाते थे। जब भी मौका लगता ये क्रांति वीर अंग्रेजों को धूल चटाने से नहीं चूकते। अंग्रेजी फौजों ने क्रांति वीरों को नष्ट करने के लिए तोप के गोले बरसाएं, जिससे कादरगढ़ का गढ़ ध्वस्त हुआ। लेकिन इन क्रांतिकारियों ने जमकर लोहा लिया, अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिए।
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कासगंज (ब्यूरो)। कासगंज की महिलाओं ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान विदेशी कपड़ों एवं शराब की दुकानों पर धरने दिए। प्रभात फेरियां निकाली वहीं अमन सभाएं भंग की। सन 1930 से लेकर 1942 तक के आंदोलनों में महिलाओं की बढ़-चढ़कर भागीदारी के तमाम दृष्टांत स्वतंत्रता के इतिहास में मौजूद है। अमांपुर के मोहनपुर गांव की गंगादेवी पाराशर, मोहनपुर की ही गंगा देवी पत्नी पुरुषोत्तम, कासगंज के स्वतंत्रता सेनानी मानपाल गुप्ता की पत्नी मायादेवी शिवरानी पत्नी निरंकार प्रसाद, सोेरों की नरेंद्र देवी पत्नी परमानंद, प्रेमवती गुप्ता ने स्वतंत्रता की ज्वाला को तेज करने में सहयोग दिया।
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कासगंज (ब्यूरो)। कटरी के इलाके आजादी की जंग की मशाल तेज लौ के साथ जली। 1942 में गांधी के अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन को लेकर कटरी के गांव बढ़ौला में क्रांतिकारियों ने स्वतंत्रता की जंग में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। बढ़ौला के निवासी ठाकुर चीतर सिंह के तीन पुत्र भूपसिंह, पंजाब सिंह एवं आलम सिंह ने अगुवाई कर ग्रामीणों के सहयोग से अंग्रेजी फौजों के दमन को रोका। जब अंग्रेजी फौज के लोग एक रामू के नाम के निर्दोष ग्रामीण को गांव में नंगा करके पीटते हुए अपने साथ ले जा रहे थे तो लोगों का खून खौल गया। चीतरसिंह के पुत्रों की अगुवाई में न केवल अंग्रेजी फौजों से मुकाबला किया, बल्कि उनके चंगुल से निर्दोष रामू को छुड़वाया। पीटर नामक अंग्रेज सिपाही को उस दौरान जमकर पीटा गया। 18 दिसंबर 1942 को अंग्रेजों ने तीनों भाईयों को गिरफ्तार कर लिया। उन्हें दो साल की सजा हुई। दतियाना निवासी कुंदन लाल पांडेय के पुत्र राजाराम पांडेय एवं ग्या प्रसाद पांडेय ने भी बढ़ चढ़कर स्वतंत्रता के आंदोलन में हिस्सा लिया। अंग्रेजी सिपाही रोस्टेलर को भी जमकर पीटा गया। अंग्रेजी फोजों ने योजना पूर्वक दोनों भाईयों को गिरफ्तार कर गंभीर यातनाएं दी और कानपुर जेल में रखा।
भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरू के साथ सजा पाई थी महावीर ने
-78 वर्ष बाद प्रशासन को आई उनकी प्रतिमा लगाने की याद
पटियाली। पटियाली तहसील क्षेत्र के ग्राम शाहपुर टहला निवासी अमर शहीद महावीर सिंह राठौर का जन्म जमींदार देवी सिंह राठौर की तीसरी संतान के रूप में 16 सितंबर 1904 को हुआ था। वे गणेश शंकर विद्यार्थी के संपर्क में आए क्रांतिकारियों की टोली में शामिल हो गए। भारत माता की सेवा के चलतेे मंडप से ही भाग गए और लाहौर जाकर भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु के साथ शामिल हो गए। साइमन कमीशन का विरोध करते हुए अंग्रेजों द्वारा लाठियां बरसाए जाने के दौरान लाला लाजपत राय की मौत हो गई तो इन्होंने अंग्रेज अफसर साइमन सांडर्स की हत्या कर दी, जिसके बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया और काला पानी की सजा दी गई। उन्हें अंडमान निकोबार की सेल्यूलर जेल भेजा गया। जेलर द्वारा प्रताड़ित करने पर इन्होंने भूख हड़ताल की। 17 मई 1933 को अमर शहीद महावीर सिंह राठौर हमेशा-हमेशा के लिए भारत मां की गोद में समा गए। आज भी शाहपुर टहला गांव में इनके परिवार की गिनती अच्छे किसानों के रूप में की जाती है इनके परिवार के अथक प्रयासों के बाद मृत्यु के 78 वर्ष बाद इनकी 150 वीं जयंती के अवसर पर प्रदेश सरकार ने एक जून सन् 2011 में तहसील पटियाली के प्रांगण में इनकी प्रतिमा लगवाई। जिसका अनावरण तत्कालीन जिलाधिकारी सेल्वा कुमारी जे द्वारा किया गया।
सही यातनाएं, गए जेल
गंजडुंडवारा। स्वतंत्रता सेेनानी स्वर्गीय श्यामबाबू गुप्त पुत्र रामचरन लाल को 1942 के भारत छोड़ाें आंदोलन में हिस्सा लेने पर 15 मास की कैद और 150 रुपये जुर्माना की सजा दी गई। स्वर्गीय रघुवर दयाल सेठ पुत्र किशनलाल को इसी आंदोेलन में हिस्सा लेने पर 100 रुपये जुर्माना और जुर्माना न देने पर एक मास की कड़ी दी गई। स्वर्गीय वेंचे लाल शर्मा पुत्र श्यामलाल शर्मा ने नमक सत्याग्रह आंदोलन में आजादी की ज्वाला जलाई। 1930 में दो मास की कड़ी कैद तथा सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान 1932 में 15 मास की कैद तथा 25 रुपये जुर्माना लगाया गया। स्वर्गीय वैध छत्तर सिंह पुत्र मानसिंह को व्यक्तिगत सत्याग्रह के दौरान 1941 में चार मास की कैद और 50 रुपये जुर्माना भारत छोड़ों आंदोलन के दौरान 1942 में एक मास की कड़ी कैद की सजा पाई। स्वर्गीय उजागर लाल पुत्र चिराेंजी लाल ने भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान 1942 में 18 मास की कड़ी कैद 50 रुपये जुर्माना की सजा पायी।
आजादी के इतने साल बीत जाने के बाद भी सरकारें देशवासियों के अंदर विश्वास पैदा नहीं कर सकीं। देश की सुरक्षा को लेकर भी सरकार उदासीन हैं। शत्रुदेश जब तब सीमा में घुस आते हैं। पाकिस्तान तो सैनिकों की हत्या करने से भी नहीं चूकता। आजादी का जो सपना देखा गया था वह आज भी अधूरा है।
नरेश अग्र्र्र्रवाल सूत की मंडी
देश तो आजाद हो गया, लेकिन आज भी आजादी का मतलब पूरा नहीं हुआ है। अमीरी गरीबी की खाई लगातार चौड़ी हो रही है। आम आदमी सरकार की गलत नीतियों से अपने को उपेक्षित महसूस करता है। स्वतंत्रता दिवस के मायने बदल गए हैं। जो उत्साह आजादी के समय था वह आज लुप्त होता जा रहा है। आजादी का जश्न स्कूल कालेज, सरकारी स्तर तक सिमट कर रह गया है।
राम प्रकाश गुप्ता मनौटा गली कासगंज
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अगर आपके पास भी है स्वतंत्रता दिवस के संबंघ में कोई विचार या समस्या या फिर अंग्रेजों के जमाने के कानून से प्रभावित रहे है तो आपके पास है मौका उन्हें अमर उजाला के साथ शेयर करने का हमारे इन नंबर और मेल आईडी पर संपर्क कर आप अपनी जानकारी को अमर उजाला में प्रकाशित करा सकते है।
अजय झंवर 9675835413, मनोज माहेश्वरी 9897154885 पर भेज सकते है।