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ये है 'बालू का अनोखा शिवलिंग', साथ में जुड़ा है बरसों पुराना एक रहस्य
टीम डिजिटल, अमर उजाला, कानपुर
Updated Tue, 11 Jul 2017 05:12 PM IST
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बालू का अनोखा शिवलिंग
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कानपुर के मैक्सर घाट पर एक ऐसे शिवलिंग की पूजा की जाती है। जिसे बनाने में बालू और मिटटी को इस्तेमाल किया जाता है। 3 फीट ऊंचे इस शिवलिंग में 70 फीसदी बालू और 30 फीसदी मिट्टी का इस्तेमाल किया जाता है। इस शिवलिंग से बरसों से एक मान्यता जुड़ी है। सबसे खास बात ये है कि हर साल सावन में इसको बनाया जाता और सावन के दो दिन बाद इसे विखंडित कर दिया जाता है। इस शिवलिंग का श्रृंगार भी किया जाता है, जिसमें केवल फूलों का इस्तेमाल किया जाता है।
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एक सन्यासी ने बरसों पहले इसे किया था तैयार
इस शिवलिंग का दर्शन करने के लिए लोगों की भीड़ लग जाती है।
कानपुर मैक्सर घाट प्राचीन घाटो में से एक है। यहीं पर बहुत पहले एक सन्यासी ने इस शिवलिंग की रचना की थी। इस घाट पर बर्षो पहले ये सन्यासी आए थे। वह उन्नाव के रहने वाले थे। लेकिन जब वे यहां आए तो फिर वापस नहीं लौट कर गए और यही के होकर रह गए थे। सन्यासी को भोला बाबा नाम से जाना जाता था।
कहते हैं वो शिवभक्त के साथ सिद्धपुरुष भी थे। इसके मुताबिक़ वो भगवान शिव की आराधना करते थे। मगर वो किसी मंदिर में जाकर भगवान भोलेनाथ की पूजन नहीं किया करते थे। वो गंगा स्नान करने के बाद घाट किनारे रेत का शिवलिंग बनाते थे। उस शिवलिंग की वो विधिवत पूजन करते थे, और पूजन अर्चन के बाद उस रेत के शिवलिंग को गंगा में प्रवाहित कर देते थे।
ऐसे ही शिवलिंग की पूजा करवाने वाले वर्तमान के पंडित कल्लू दीक्षित भोला बाबा की ही तरह है। कहते हैं इस शिवलिंग नाम नित्तेश्वर बाबा रखा था, जो अब श्रद्धालुओं के जुबान पर आज तक है।
कहते हैं वो शिवभक्त के साथ सिद्धपुरुष भी थे। इसके मुताबिक़ वो भगवान शिव की आराधना करते थे। मगर वो किसी मंदिर में जाकर भगवान भोलेनाथ की पूजन नहीं किया करते थे। वो गंगा स्नान करने के बाद घाट किनारे रेत का शिवलिंग बनाते थे। उस शिवलिंग की वो विधिवत पूजन करते थे, और पूजन अर्चन के बाद उस रेत के शिवलिंग को गंगा में प्रवाहित कर देते थे।
ऐसे ही शिवलिंग की पूजा करवाने वाले वर्तमान के पंडित कल्लू दीक्षित भोला बाबा की ही तरह है। कहते हैं इस शिवलिंग नाम नित्तेश्वर बाबा रखा था, जो अब श्रद्धालुओं के जुबान पर आज तक है।
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आजतक कोई नहीं जान पाया बाबा का रहस्य
बालू का शिवलिंग
इस शिवलिंग को बनाने और प्रवाहित करने के समय किसी को इसे देखने की इजाजत नहीं है, क्योकि भोला बाबा भी तड़के सुबह इस शिवलिंग का निर्माण करते थे, और देर रात अकेले इस शिवलिंग को गंगा में प्रवाहित कर देते थे। बाबा कभी भी किसी के दान दिया हुआ नहीं खाते थे।
इसपर नहीं टपकता गंगा जल
शिवलिंग की पूजा करते हुए लोग
कैंटोनमेंट इलाके मौजूद इस मंदिर में इस शिवलिंग की दर्शन के लिए शहर के साथ साथ अगल बगल गांव के भी भक्त आते है। नितेश्वर बाबा की सुबह सुबह दर्शन करने से पूरा दिन अच्छा जाता है। इस मंदिर में पानी दूध या तरल प्रदार्थो को ले जाना सख्त मना है। बालू के बने इस शिवलिंग के ऊपर गंगा जल को भी नहीं रखा जाता, भोला बाबा इस शिवलिंग को बनाने में गंगा जल का ही इस्तेमाल करते थे।
सन्यासी की तस्वीर
सन्यासी खुद को उन्नाव का बताया, मगर किस गांव में कहां उनका घर है ये उन्होंने किसी को नहीं बताया। वो बहुत ही कम बोलते थे। शाम को उनको सुनने के लिए भीड़ लगी होती थी, वो भी भोलेनाथ की आरती करने के बाद लोगो को शिव कथा सुनाते थे।
उनके मृत्यु के बाद हम पण्डितगण और स्थानीय भक्तों ने उनकी मौजूदगी इस घाट पर बनाए रखने के लिए बालू के शिवलिंग को बनाना जारी रखा। इस जगह को घेर कर भक्तगानो ने एक छोटे से मंदिर का निर्माण भी करवा दिया । हर दिन बाबा का शृंगार ताजे फूलो से होता है।
उनके मृत्यु के बाद हम पण्डितगण और स्थानीय भक्तों ने उनकी मौजूदगी इस घाट पर बनाए रखने के लिए बालू के शिवलिंग को बनाना जारी रखा। इस जगह को घेर कर भक्तगानो ने एक छोटे से मंदिर का निर्माण भी करवा दिया । हर दिन बाबा का शृंगार ताजे फूलो से होता है।