'दिखावे पर मत जाओ, आपन अकल लगाओ'
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तुम बताओ तुम का गृहण करिहौ ग्रीन टी या साधना। हम कहा ग्रीन टी, फिर अंदर कुटिया मा आवाज लगाइन साधना !! भईया के लिए ग्रीन टी ले आओ। ऊ बाबा केर धिनचक साधना देख हमरी तो बुद्धि संट हुई गई रहे। सोचो ऊ कितना पहुंचे भये बाबा रहें। तबहीं साइकिल पे हैरान परेशान संकठा आय गए। कहे लगे गुरु डिप्टी पड़ाव पे बड़ी लभेड़ हुई गई रही। हम भोला चाय वाले के हिंया बइठे चाय पियत रहेन कि दुई लोग आसाराम केर सजा पे ज्ञान झाड़त रहें। एक कहें सजा होय के चाही दूसर कहे नहीं। एक कहे चले जाओ नहीं तो हपक के कंटाप पड़िहै सारी रंगबाजी निकल जहियै, तो दूसर कहिस जादा बाहुबली ना बनो नहीं तो अइसा कंटाप मरबे के तीन टिप्पा खाय के गंगा बैराज पे गिरिहौ।
तो पहिला वाला ओके मुंह पर गरम-गरम चाय फेंक के मारिस, बस भनाभन लात घूंसा चले लगा, तो हम आपन चाय छोड़ के सन्न से भागत भै डायरेक्ट हियां ब्रेक लगावा। हम कहा हां यार हमार कल्यानपुर वाली मौसी उनकी बड़ी भक्त रहीं। आज सुबह हम कल्यानपुर उनके घर गएन तो अइसेहे पूछ लिया कि मौसी अब जात हौ सत्संग मा !! तो बिर्झाय गईं, कहें लगी हमसे फालतू बात ना करौ। हमका तो सुरुहै से आसाराम पे बिस्वास नहीं रहा। ऊ तो मिसराइन हमका जबरदस्ती लै जात रहीं। बाकी हमरा उनसे कोऊ लेनदेन नहीं ना, अउर तुम्हरे पास कोऊ दूसर बात नहीं है। हम तो सबसे एकहे बात कहिबे कि भइया दिखावे पर मत जाओ आपन अकल लगाओ!!'---राजू श्रीवास्तव