UP: बेसहारों की मदद की योजना, दो श्रेणियों में पांच साल से अनाथ, 300 आवेदन फाइलों में कैद, जिम्मेदार बेपरवाह
Kanpur News: कोरोना काल और संकटग्रस्त बच्चों के लिए शुरू की गई मुख्यमंत्री बाल सेवा योजना (सामान्य) पांच साल बाद भी अपनी रफ्तार नहीं पकड़ पाई है। जिले में निर्धारित पांच श्रेणियों में से दो श्रेणियों (तलाकशुदा महिलाओं के बच्चों और बाल श्रम/भिक्षावृत्ति से मुक्त बच्चों) में एक भी आवेदन नहीं आया है, जबकि केवल 3 साल की श्रेणियों में 683 बच्चों को लाभ मिल रहा है और 300 आवेदन सत्यापन के इंतजार में अटके हैं।
विस्तार
कानपुर में कोरोना काल में अनाथ, निराश्रित हुए या फिर संकटों से घिर गए बच्चों को सहारा देने के लिए शुरू की गई मुख्यमंत्री बाल सेवा योजना (सामान्य) कानपुर में पांच साल बाद भी लंगड़ाकर चल रही है। योजना को पांच श्रेणियों में रखा गया है। हालत यह है कि इनमें दो श्रेणियों में एक भी लाभार्थी नहीं मिला है। जाहिर है कि विभाग जरूरतमंद बच्चों तक पहुंच ही नहीं पाया या फिर प्रचार-प्रसार के अभाव में जानकारी न होने से जरूरतमंद बच्चे विभाग के पास नहीं आ सके।
सत्यापन, स्वीकृति के इंतजार में 300 आवेदन
योजना, कोविड-19 के बाद उन बच्चों के लिए शुरू की गई थी, जिन्होंने माता-पिता या अभिभावक खो दिए या जो विशेष परिस्थितियों में संरक्षण और आर्थिक सहायता के पात्र हैं। इसके लिए पांच श्रेणियां तय की गई थीं लेकिन कानपुर में योजना केवल तीन श्रेणियों तक सिमटकर रह गई है। जिले में इस समय सिर्फ 683 बच्चों को 2500 रुपये प्रतिमाह की सहायता मिल रही है जबकि 300 आवेदन महीनों से सत्यापन और स्वीकृति की प्रक्रिया में अटके पड़े हैं। यानी जितने बच्चों को लाभ मिल रहा है, उसके लगभग 73 प्रतिशत आवेदन अब भी सरकारी प्रक्रियाओं में फंसे हुए हैं।
इन दो श्रेणियों में एक भी आवेदन नहीं
इन पांच वर्षों में शिक्षा प्राप्त कर रहे पात्र विद्यार्थियों की श्रेणी में तलाकशुदा एवं परित्यक्ता महिलाओं के बच्चे और बाल श्रम या भिक्षावृत्ति से मुक्त कराए गए बच्चों की श्रेणी है। इन दोनों श्रेणियों में भी एक भी आवेदन नहीं पहुंचा जबकि जिले में हर साल बाल श्रम मुक्ति अभियान चलाए जाते हैं, परित्यक्ता महिलाओं की संख्या भी कम नहीं है और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के सैकड़ों बच्चे उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। इसके बावजूद आवेदन शून्य होना विभाग के जिम्मेदारों की लापरवाही बयां करता है।
683 में से सिर्फ दो बच्चे जेल वाले परिवारों से
विभागीय आंकड़ों के अनुसार जिले में इस योजना के कुल 683 लाभार्थियों को लाभ दिया जा रहा है। इसमें से केवल दो बच्चे ऐसे हैं जिनके परिवार का मुख्य कमाने वाला सदस्य जेल में है। बाकी लाभार्थियों में माता-पिता या अभिभावक खो चुके बच्चों की श्रेणी से हैं।
बीडीओ और एसडीएम स्तर पर होता है सत्यापन
योजना के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में बीडीओ और शहरी क्षेत्रों में एसडीएम स्तर पर सत्यापन कराया जाता है। इसके बाद प्रस्ताव जिला स्तरीय अधिकारियों के पास भेजा जाता है। आवेदन के बाद सत्यापन के लिए 300 आवेदन लंबित हैं। सवाल यह है कि जिन बच्चों को तत्काल सहायता की जरूरत है, वे महीनों तक जांच और अनुमोदन का इंतजार कर रहे हैं।
एक नजर लाभार्थियों के आंकड़ों पर
- माता-पिता में एक की मृत्यु: 663
- माता-पिता जेल में: 2
- माता-पिता दोनों की मृत्यु: 18
ये हैं पांच श्रेणियां, जिनमें मिलता है लाभ
- ऐसे बच्चे जिनके माता-पिता दोनों की मृत्यु हो गई हो।
- ऐसे बच्चे जिनके माता-पिता में एक मृत्यु हुई हो।
- ऐसे बच्चे जिनकी माता तलाकशुदा या फिर घर त्याग दिया हो।
- ऐसे बच्चे जिन्हें बाल श्रम, बाल भिक्षावृत्ति से मुक्त कराकर परिवार में रखा गया हो।
- ऐसे बच्चे जिनके माता-पिता या परिवार का मुखिया जेल में हो।
तीन श्रेणियों में ही आवेदन आए हैं। दो श्रेणियों में एक भी आवेदन नहीं है। इसके पीछे लोगों को योजना की जानकारी न होना भी एक कारण है। कई बार प्रयास किया गया लेकिन कभी कागजातों में खामियां या कभी अन्य कारणों से आवेदन नहीं हो सके। -विकास सिंह, जिला प्रोबेशन अधिकारी