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विकलांग पत्नी को गाेद में लेकर पहुंचा डीएम की चाैखट, इलाज के अभाव में ताेड़ रही है दम

Sun, 25 Sep 2016 10:42 PM IST
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, कानपुर
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, कानपुर Updated Sun, 25 Sep 2016 10:42 PM IST
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disabled woman forced to die
पत्नी माया को गोद में लेकर डीएम से मिलने जाता पति संजीत। - फोटो : अमर उजाला
कुछ समय पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विकलांगों की स्थिति को समझते हुए उन्हें नया नाम दिव्यांग दिया था। इसके पीछे मंशा थी कि विकलांग बुलाने से वह खुद को हीन न समझें। इन विकलांगों का जीवनस्तर संवारने के लिए केंद्र व प्रदेश सरकार कई योजनाएं चला रही हैं लेकिन इनका लाभ क्या संबंधित को मिल रहा है इसका जीता-जागता उदाहरण है पीतांबर नगर में रहने वाली दिव्यांग माया। यह दिव्यांग इलाज के अभाव में पिछले 10 साल से तिल-तिल मरने को मजबूर है। सरकारी योजनाएं आज तक माया के पास नहीं पहुंची। 
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मोहल्ला पीतांबरनगर में दिव्यांग माया अपने पति संजीत कुमार रैदास के साथ एक झोपड़ीनुमा मकान में छप्पर डालकर रहती है। माया शरीर से पूर्णयता विकलांग है और स्वयं चलने-फिरने में असमर्थ है। उसका पति संजीत कुमार रिक्शा चलाकर किसी तरह से दोजून की रोटी का बंदोबस्त करता है। दिव्यांग माया पिछले 10 सालों से बीमार चल रही है। माया के मुताबिक, जहां भी वह इलाज के लिए गई उससे मोटी रकम मांगी गई। उसे यह भी नहीं बताया गया कि उसे बीमारी क्या है। बस एक ही बात कहते हैं कि जब पैसे की व्यवस्था हो जाए तब आ जाना। इलाज के अभाव में माया तिल-तिल मरने को मजबूर हो रही है। उसके इलाज के लिए आर्थिक सहायता मांगने पति संजीत कुमार उसे गोद में लेकर नेताओं व अफसरों के चक्कर काटता रहा लेकिन कोई उसकी मदद को आगे नहीं आया। माया की स्थिति काफी दयनीय है। इसके बाद भी आज तक ना ही उसे विकलांग पेंशन मिली और ना ही ट्राईसाइकिल। 
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नहीं बना राशनकार्ड, कोटेदार ने देना बंद किया राशन

सरकार ने गरीबों के लिए राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम लागू किया है। इसके पीछे का उद्देश्य किसी गरीब को भूखा न सोना पड़े। लेकिन इस योजना का लाभ क्या वास्तव में पात्रों को मिल रहा है यह माया देवी के मामले से आसानी से समझा जा सकता है। जिले में 5 लाख लोगों के अस्थायी कार्ड बन चुके हैं लेकिन दिव्यांग माया का आज तक कार्ड नहीं बन पाया है। यह स्थिति तब है जब वह आनलाइन आवेदन भी कर चुकी है। कार्ड न होने के एवज में कोटेदार ने उसे राशन देना भी बंद कर दिया है।
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नहीं बना है शौचालय

पति संजीत कुमार की मानें तो वह छप्पर डालकर किसी तरह से गुजर-बसर कर रहा है। उसकी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि वह एक शौचालय बनवा सके। ऐसे में चलने-फिरने में असमर्थ पत्नी को वह शौंच प्लास्टिक के डिब्बे में कराता है। बताया कि उसके पूर्वज मुर्दा जानवरों की खाल निकालने का काम करते थे। इसके लिए उन्हें 2 बिसुवा जमीन दी गई थी। अब उस भूमि के किनारे आबादी हो गई। जिससे खाल निकालने का काम बंद हो गया। इसका फायदा उठाकर कुछ लोगों ने उस भूमि पर भी कब्जा कर लिया है।
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