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Kanpur News: 44 साल पुरानी कंपनी, सात माह से थी रडार पर
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इटावा। फैक्टरी संचालक राजीव ने गुप्ता फार्मा एवं कंपनी की शुरुआत 44 साल पहले की थी। तभी से वह लाइसेंस की आड़ में लोगों को दवाओं के नाम पर जहर देने का काम कर रहा था। हांलकि उस वक्त के जिम्मेदारों ने भी कभी फैक्टरी की दवाओं की जांच करना मुनासिब नहीं समझा। बीते सात माह से जरूर वह औषधि विभाग के रडार पर आया था, जिसके तहत ही मंगलवार को बड़ी कार्रवाई की गई।
औषधि विभाग के अधिकारियों ने बताया कि सात माह पहले गुप्ता फार्मा कंपनी ने शहर की आयुर्वेदिक दुकान पर घर में बनी दवा की सप्लाई की। औषधि निरीक्षक रजत पांडेय ने बताया कि उन्होंने चार अप्रैल को शहर पक्का बाग स्थित माया फार्मेसी में दवाइयों की जांच की। इसमें कुछ संदिग्ध दवाइयों के सैंपल लेकर उन्हें जांच के लिए भेजा। एक जून को आई रिपोर्ट में एमोफेक्स कैप्सूल का सैंपल फेल हो गया। इस पर माया फार्मेसी को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। साथ ही दुकान को निलंबित कर दिया।
माया फार्मेसी के मालिक शशिपाल सिंह ने डीआई को बताया कि उन्होंने यह दवा गुप्ता फार्मा एंड कंपनी से ली थी। इसके बाद गुप्ता फार्मा कंपनी खाद्य एवं औषधि विभाग के नजरों में आया। फार्मा कंपनी की जांच की गई तो पता चला कि इस कंपनी की शुरुआत 1980 में आरोपी राजीव कुमार गुप्ता के पिता देवी शंकर गुप्ता ने की थी।
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इसका समय-समय पर नवीनीकरण होता रहा, लेकिन पिता की मौत के बाद 2014 तक इसका नवीनीकरण नहीं कराया गया जो पंजीकरण निरस्त कर दिया लेकिन राजीव कुमार चोरी-छिपे इसका संचालन करता रहा। राजीव कुमार गुप्ता आयुर्वेदिक दवा की आड़ में एलोपैथिक एक्सपायर दवा का इस्तेमाल कर काली कमाई की। नतीजन उसने बेटे प्रतीक के नाम से एक और कंपनी खोल दी। इसमें कफ सीरप से लेकर फिनाइल व मच्छर लोशन के नाम शामिल है, जिनकी अस्पतालों समेत दुकानों पर खपत हो रही थी।
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औषधि विभाग के अधिकारियों ने बताया कि सात माह पहले गुप्ता फार्मा कंपनी ने शहर की आयुर्वेदिक दुकान पर घर में बनी दवा की सप्लाई की। औषधि निरीक्षक रजत पांडेय ने बताया कि उन्होंने चार अप्रैल को शहर पक्का बाग स्थित माया फार्मेसी में दवाइयों की जांच की। इसमें कुछ संदिग्ध दवाइयों के सैंपल लेकर उन्हें जांच के लिए भेजा। एक जून को आई रिपोर्ट में एमोफेक्स कैप्सूल का सैंपल फेल हो गया। इस पर माया फार्मेसी को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। साथ ही दुकान को निलंबित कर दिया।
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माया फार्मेसी के मालिक शशिपाल सिंह ने डीआई को बताया कि उन्होंने यह दवा गुप्ता फार्मा एंड कंपनी से ली थी। इसके बाद गुप्ता फार्मा कंपनी खाद्य एवं औषधि विभाग के नजरों में आया। फार्मा कंपनी की जांच की गई तो पता चला कि इस कंपनी की शुरुआत 1980 में आरोपी राजीव कुमार गुप्ता के पिता देवी शंकर गुप्ता ने की थी।
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इसका समय-समय पर नवीनीकरण होता रहा, लेकिन पिता की मौत के बाद 2014 तक इसका नवीनीकरण नहीं कराया गया जो पंजीकरण निरस्त कर दिया लेकिन राजीव कुमार चोरी-छिपे इसका संचालन करता रहा। राजीव कुमार गुप्ता आयुर्वेदिक दवा की आड़ में एलोपैथिक एक्सपायर दवा का इस्तेमाल कर काली कमाई की। नतीजन उसने बेटे प्रतीक के नाम से एक और कंपनी खोल दी। इसमें कफ सीरप से लेकर फिनाइल व मच्छर लोशन के नाम शामिल है, जिनकी अस्पतालों समेत दुकानों पर खपत हो रही थी।