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गरीबी थी तो फूलों के रंग से खेलते थे होली, अब आधुनिकता में सब भूल गए...

Wed, 17 Mar 2021 11:40 PM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Wed, 17 Mar 2021 11:40 PM IST
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If there was poverty, Holi used to play with the color of flowers, now everyone has forgotten in modernity
होली पर्व के आगमन को लेकर कोतवाली के पास सजी पिचकारी की दूकानें। संवाद - फोटो : JAUNPUR
बक्शा। पहले लोगों के पास आमदनी का जरिया सीमित था। कमाई कम थी, गरीबी ज्यादा थी, तब लोग फूलों के रंग बनाकर होली खेलते थे। आज धन और संसाधन दोनों बढ़ गए तो आधुनिकता की चकाचौंध में लोग सब भूल गए हैं। रंगों की जगह कीचड़, मोबिल से होली ने इस त्योहार की महत्ता को कम कर दिया है। होली का बिगड़ता रूप देखकर मन व्यथित है। यह कहना है सुजियामऊ के श्रीपति उपाध्याय का।
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पूर्व ब्लाक प्रमुख श्रीपति उपाध्याय पुराने दिनों को याद करते हुए कहा कि होली से एक माह पहले ही गांवों में फाग के स्वर गूंजने लगते थे। रोज शाम को गांव की चौपाल पर बुजुर्गों और युवाओं की टोली ढोलक और झाल-मजीरा लेकर बैठ जाती थी। अवधी और भोजपुरी के फाग गीतों की मधुरता ही सबको रस से भर देती थी। यह क्रम निरंतर होली तक चलता रहता था। अंतिम दिन भी लोग आपस के गिले-शिकवे मिटाकर प्रेम से मिलते थे। आज फाग गीतों में फगुआ, चौताल, चहका, धमार, उलारा, बेलवइया, चैता आदि लोक गीतों के संरक्षण की जरूरत है। फाग गीतों के नाम पर अश्लील गीतों का प्रदर्शन दुखद है। उमरक्षा गांव निवासी फगुआ गायक कैलाश शुक्ल कहते हैं कि एक दशक पहले तक होली के पहले व बाद तक क्षेत्र के राजनारायण सिंह, बंशराज सिंह, पंचदेव सहित दर्जनों लोग टोली बनाकर फगुआ गीतों से ढोल, हरमुनिया, झाल की ताल से गांव को गुलजार कर देते थे। चुरावनपुर, वीरभानपुर, सुजियामऊ, लखनीपुर, बक्शा, उमरक्षा, सिकरे, गोपालापुर, कौली भिवरहा, मालिकानपुर, बसारतपुर, सुल्तानपुर, धनियामऊ आदि गांव में फागुनी गीतों का बयार पूरे महीने बहती रहती थी। इसका लोप मन को कचोटता है। युवा पीढ़ी को इससे जोड़ने की जरुरत है।
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सज गई रंग और पिचकारी की दुकान
जौनपुर। होली नजदीक आने के साथ ही बाजार की रौनक बढ़ती जा रही है। त्योहार से जुड़े सामानों की दुकानें सज गई हैं। चिप्स-पापड़ के अलावा रंग-बिरंगी पिचकारी, मुखौटे आदि की दुकानें सज गई हैं। शहर के कोतवाली रोड, शकरमंडी, सब्जी मंडी, रुहट्टा, ओलंदगंज, पॉलीटेक्निक चौराहा क्षेत्र में सजी इन दुकानों ने ग्रामीण क्षेत्रों से खरीदार आ रहे हैं। दुकानदार संतोष कुमार का कहना है कि होली में अभी दस दिन होने के कारण स्थानीय खरीदार कम हैं। ज्यादातर लोग ग्रामीण क्षेत्रों से ही यहां आ रहे हैं। अब धीरे-धीरे बिक्री बढ़ेगी। पिछले साल कोरोना के कारण बिक्री प्रभावित हुई थी। इसलिए अभी सीमित मात्रा में ही माल मंगाया गया है।
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