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अजय से आदित्यनाथ बन 26 साल में चुने गए सांसद
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।
Updated Sun, 19 Mar 2017 01:53 AM IST
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योगी आदित्यनाथ मूलरूप से उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल के रहने वाले हैं। उनका असली नाम अजय सिंह नेगी है। ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ के सानिध्य में आने के बाद उन्होंने नाथ पंथ में आने का निर्णय लिया। पहले उत्तराधिकारी बने फिर पीठ के महंत बन गए। अब वह प्रदेश के मुख्यमंत्री बन गए हैं।
5 जून 1972 पौड़ी गढ़वाल में जन्मे योगी आदित्यनाथ विज्ञान विषय से स्नातक हैं। छात्र जीवन में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े अजय की दिल्ली में एक कार्यक्रम में तत्कालीन गोरक्षपीठाधीश्वर महंत अवेद्यनाथ से मुलाकात हुई। उनके विचारों से प्रभावित होकर अवेद्यनाथ ने उनसे मिलने को कहा। मुलाकातों का सिलसिला शुरू हो गया। इसी दौरान अवेद्यनाथ की तबीयत खराब हुई। वह दिल्ली में अस्पताल में भर्ती हुए तो आदित्यनाथ उनको देखने गए। उनकी सेवा से प्रभावित होकर अवेद्यनाथ ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी बनाने का प्रस्ताव रखा। तब उन्होंने घरवालों से राय लेकर बताने को कहा।
नवंबर 1993 में अजय सिंह नेगी गोरखनाथ मंदिर पहुंचे और ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ से कहा कि अब यहीं रहेंगे। करीब एक साल मंदिर में रहने के बाद 1994 की बसंत पंचमी के दिन नाथ पंथ की दीक्षा ली और गोरक्षपीठ के उत्तराधिकारी बने। इसी बीच वह अवेद्यनाथ के राजनीतिक कार्यों को भी देखते रहे। गोरखपुर संसदीय क्षेत्र से अवेद्यनाथ 1989 से लगातार सांसद चुने जा रहे थे। 1998 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने योगी आदित्यनाथ को मैदान में उतार दिया। योगी उस समय 26 साल की सबसे कम उम्र के सांसद चुने गए थे। उसके बाद लगातार 5 बार इसी संसदीय क्षेत्र से सांसद चुने गए। हर बार उनकी जीत का अंतर बढ़ता गया।
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मंत्री के खिलाफ खोला था मोर्चा
भाजपा सरकार में तत्कालीन कैबिनेट मंत्री रहे शिवप्रताप शुक्ला की कार्यप्रणाली से आहत आदित्यनाथ ने 2002 के विधानसभा चुनाव में बगावत का बिगुल फूंक दिया था। डॉ. राधामोहन दास अग्रवाल को मैदान में उतारकर उन्हें भारी मतों के अंतर से जीत दिलाई। इसके बाद से उनका कद बढ़ता गया। गोरखपुर की सरहद को लांघ कर पूरे पूर्वांचल में पैठ बनाई।
2002 में किया हिंदू युवा वाहिनी का गठन
प्रदेश सरकार के मंत्री को 2002 के चुनाव हराने के बाद उन्होंने रामनवमी के दिन हिंदू युवा वाहिनी का गठन कर पूरे पूर्वांचल में अपना संगठन खड़ा कर दिया। उनका यह संगठन आज पूरे प्रदेश में फैला हुआ है। 2007 में जब मुलायम सरकार में आदित्यनाथ की गिरफ्तारी हुई तो उस समय पूरा पूर्वांचल जल उठ था। हियुवा के कार्यकर्ताओं के विरोध प्रदर्शन के आगे सरकार को घुटने टेकने पड़े थे।
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5 जून 1972 पौड़ी गढ़वाल में जन्मे योगी आदित्यनाथ विज्ञान विषय से स्नातक हैं। छात्र जीवन में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े अजय की दिल्ली में एक कार्यक्रम में तत्कालीन गोरक्षपीठाधीश्वर महंत अवेद्यनाथ से मुलाकात हुई। उनके विचारों से प्रभावित होकर अवेद्यनाथ ने उनसे मिलने को कहा। मुलाकातों का सिलसिला शुरू हो गया। इसी दौरान अवेद्यनाथ की तबीयत खराब हुई। वह दिल्ली में अस्पताल में भर्ती हुए तो आदित्यनाथ उनको देखने गए। उनकी सेवा से प्रभावित होकर अवेद्यनाथ ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी बनाने का प्रस्ताव रखा। तब उन्होंने घरवालों से राय लेकर बताने को कहा।
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नवंबर 1993 में अजय सिंह नेगी गोरखनाथ मंदिर पहुंचे और ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ से कहा कि अब यहीं रहेंगे। करीब एक साल मंदिर में रहने के बाद 1994 की बसंत पंचमी के दिन नाथ पंथ की दीक्षा ली और गोरक्षपीठ के उत्तराधिकारी बने। इसी बीच वह अवेद्यनाथ के राजनीतिक कार्यों को भी देखते रहे। गोरखपुर संसदीय क्षेत्र से अवेद्यनाथ 1989 से लगातार सांसद चुने जा रहे थे। 1998 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने योगी आदित्यनाथ को मैदान में उतार दिया। योगी उस समय 26 साल की सबसे कम उम्र के सांसद चुने गए थे। उसके बाद लगातार 5 बार इसी संसदीय क्षेत्र से सांसद चुने गए। हर बार उनकी जीत का अंतर बढ़ता गया।
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मंत्री के खिलाफ खोला था मोर्चा
भाजपा सरकार में तत्कालीन कैबिनेट मंत्री रहे शिवप्रताप शुक्ला की कार्यप्रणाली से आहत आदित्यनाथ ने 2002 के विधानसभा चुनाव में बगावत का बिगुल फूंक दिया था। डॉ. राधामोहन दास अग्रवाल को मैदान में उतारकर उन्हें भारी मतों के अंतर से जीत दिलाई। इसके बाद से उनका कद बढ़ता गया। गोरखपुर की सरहद को लांघ कर पूरे पूर्वांचल में पैठ बनाई।
2002 में किया हिंदू युवा वाहिनी का गठन
प्रदेश सरकार के मंत्री को 2002 के चुनाव हराने के बाद उन्होंने रामनवमी के दिन हिंदू युवा वाहिनी का गठन कर पूरे पूर्वांचल में अपना संगठन खड़ा कर दिया। उनका यह संगठन आज पूरे प्रदेश में फैला हुआ है। 2007 में जब मुलायम सरकार में आदित्यनाथ की गिरफ्तारी हुई तो उस समय पूरा पूर्वांचल जल उठ था। हियुवा के कार्यकर्ताओं के विरोध प्रदर्शन के आगे सरकार को घुटने टेकने पड़े थे।