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ठगा महसूस कर रहे यूनिवर्सिटी के छात्रनेता
डॉ. राकेश राय, अमर उजाला, गोरखपुर।
Updated Thu, 08 Sep 2016 12:26 AM IST
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गोरखपुर यूनिवर्सिटी
घोषित तिथि मेें प्रशासनिक दखलंदाजी से टले यूनिवर्सिटी के छात्रसंघ चुनाव ने ऐसे छात्रनेताओं की नींद उड़ा दी है, जिन्होंने महज तीन दिन में अपनी चुनावी गतिविधियों को चरम पर पहुंचा दिया था। कल तक परिसर में पूरी गर्मजोशी से दस्तक दे रहे ये छात्रनेता ठगा सा महसूस कर रहे हैं। फिलहाल वे इस असमंजस में फंसे हैं कि किसे दोषी ठहराएं यूनिवर्सिटी को या फिर प्रशासन को। पूरे दिन के असमंजस के बाद बुधवार की देर शाम कोई प्रशासन और शासन पर निशाना साधता दिखा तो किसी ने यूनिवर्सिटी प्रशासन को कटघरे में लिया। कुछ छात्रनेता तो इसे लेकर प्रदेश सरकार को दोषी ठहरा रहे हैं। छात्र नेताओं का कहना है कि बिना प्रशासनिक तालमेल के छात्रसंघ चुनाव के तारीख घोषणा उनके साथ धोखा है।
यूनिवर्सिटी छात्रसंघ के पूर्व मंत्री नीरज शाही इसके लिए यूनिवर्सिटी को दोषी ठहरा रहे हैं। उनका कहना है कि छात्रसंघ चुनाव कराना कुलपति की जिम्मेदारी है और उन्हें हर हाल मेें प्रशासनिक तालमेल बैठाकर चुनाव कराना चाहिए। हालांकि इसे लेकर पूर्व मंत्री ने प्रदेश सरकार को भी घेरा है। उनका कहना है कि प्रदेश सरकार या तो छात्रसंघ विरोधी चरित्र स्वीकार करे या फिर प्रशासन को चुनाव की राह में रोड़ा बनने से रोके। जल्द इसे लेकर कोई निर्णय नहीं लिया जाता तो छात्रों के बड़े आंदोलन का सामना यूनिवर्सिटी और प्रशासन दोनों को करना पड़ेगा।
यूनिवर्सिटी के पूर्व उपाध्यक्ष डॉ. योगेश प्रताप सिंह का कहना है कि एक तरफ डीआईजी का छात्रनेताओं की आपराधिक रिकार्ड खंगालने की बात कहना और दूसरी तरफ एसएसपी का चुनाव में रोड़ा बनना इस बात को साबित करता है कि कहीं न कहीं कुछ खेल है। पूर्व उपाध्यक्ष ने इस खेल के पीछे प्रदेश सरकार को दायरे में लिया और कहा कि उसके इशारे पर ही छात्रनेताओं के साथ यह खिलवाड़ किया जा रहा है।
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अंबेडकरवादी छात्र सभा के अध्यक्ष अमर पासवान ने तो यूनिवर्सिटी को दोषी मानते हुए पिछले तीन दिनों में छात्रनेताओं द्वारा खर्च रकम की वापसी की बात रखी है। उनका कहना है कि यह यूनिवर्सिटी, प्रशासन और प्रदेश सरकार की मिली-जुली साजिश है, जिसका खामियाजा छात्र और छात्रनेता भुगत रहे हैं। बहुत जल्द इसका परिणाम आंदोलन के रूप में सामने आएगा, इसे लेकर रणनीति तैयार की जा रही है।
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यूनिवर्सिटी छात्रसंघ के पूर्व मंत्री नीरज शाही इसके लिए यूनिवर्सिटी को दोषी ठहरा रहे हैं। उनका कहना है कि छात्रसंघ चुनाव कराना कुलपति की जिम्मेदारी है और उन्हें हर हाल मेें प्रशासनिक तालमेल बैठाकर चुनाव कराना चाहिए। हालांकि इसे लेकर पूर्व मंत्री ने प्रदेश सरकार को भी घेरा है। उनका कहना है कि प्रदेश सरकार या तो छात्रसंघ विरोधी चरित्र स्वीकार करे या फिर प्रशासन को चुनाव की राह में रोड़ा बनने से रोके। जल्द इसे लेकर कोई निर्णय नहीं लिया जाता तो छात्रों के बड़े आंदोलन का सामना यूनिवर्सिटी और प्रशासन दोनों को करना पड़ेगा।
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यूनिवर्सिटी के पूर्व उपाध्यक्ष डॉ. योगेश प्रताप सिंह का कहना है कि एक तरफ डीआईजी का छात्रनेताओं की आपराधिक रिकार्ड खंगालने की बात कहना और दूसरी तरफ एसएसपी का चुनाव में रोड़ा बनना इस बात को साबित करता है कि कहीं न कहीं कुछ खेल है। पूर्व उपाध्यक्ष ने इस खेल के पीछे प्रदेश सरकार को दायरे में लिया और कहा कि उसके इशारे पर ही छात्रनेताओं के साथ यह खिलवाड़ किया जा रहा है।
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अंबेडकरवादी छात्र सभा के अध्यक्ष अमर पासवान ने तो यूनिवर्सिटी को दोषी मानते हुए पिछले तीन दिनों में छात्रनेताओं द्वारा खर्च रकम की वापसी की बात रखी है। उनका कहना है कि यह यूनिवर्सिटी, प्रशासन और प्रदेश सरकार की मिली-जुली साजिश है, जिसका खामियाजा छात्र और छात्रनेता भुगत रहे हैं। बहुत जल्द इसका परिणाम आंदोलन के रूप में सामने आएगा, इसे लेकर रणनीति तैयार की जा रही है।