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रहमत की बारिश से रोशन हुई रमजान की रात
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।
Updated Wed, 08 Jun 2016 01:19 AM IST
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तरावीह की नमाज के बाद बड़ी मस्जिद के पास बातचीत करते लोग ।
- फोटो : rajesh kumar
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रात के साढ़े 10 बज रहे थे, लेकिन घंटाघर का माहौल दिन के साढ़े 10 की गवाही दे रहा था। दिलो-दिमाग को पाकीजगी अदा करने वाले रमजान महीने की पहली रात जो थी। हल्की बारिश भी लोगों के हौसले के सामने पस्त थी। चहुंओर से आ रही इत्र की खुशबू इसकी तस्दीक कर रही थी कि यह पाक महीना जिंदगी में खुशहाली भरने के लिए तैयार है। दरअसल, यह हलचल जामा मस्जिद में तरावीह के बाद की थी, जिसने घंटाघर की रात को दिन से ज्यादा गुलजार कर दिया।
डेढ़ घंटे की तरावीह के बाद जब लोग मस्जिद से निकले तो सबकी जुबां पर रोजे की पहले दिन की चर्चा आम रही। दुआ-सलाम के बाद पास खड़े ठेले से टेक लगाकर तनवीर अहमद बोले- आसान नहीं है इस गर्मी में शिद्दत की प्यास का मुकाबला करना, पर साहब यही तो अल्लाह का इम्तिहान है। इसे तो देना ही होगा। यूं ही रहमत तो नहीं बरसेगी ना? तभी शहाब आलम बोले- अरे अभी तो शुरू हुआ है रोजा। दिन बढ़ने के साथ बढ़ेगा धूप का ताप, तब होगा असली इम्तिहान। लेकिन फिक्र नहीं इसे ही तो रोजा कहते हैं।
तनवीर और शहाब की बात सुन मोहम्मद शमीम को रहा नहीं गया तो सवालिया अंदाज में बोल पडे़े। अरे भाई! क्यों भूल रहे हो कि इस बार 17 घंटे का रोजा है। कई तो चक्कर खाकर गिर पड़े हैं। अब जब जाड़े के छोटे दिन का रोजा भी तो हमें मिलता है, फिर गर्मी के बडे़े दिन रोजा किसके खाते में आएगा? यह तो अल्लाह का करम और कुदरत का न्याय है। बातचीत का सिलसिला चल ही रहा था कि तभी पास से फैजान मियां तेज कदमों से गुजरते दिखे। तनवीर भाई ने जब उन्हें रोकने की कोशिश की तो बारिश आने की बात कहकर उन्होंने कदम और तेज कर दिए।
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तनवीर को नहीं रहा गया और बोले- अरे ये तो रहमत की बारिश है, इससे क्यों घबराते हो। लेकिन जब बारिश तेज हुई तो तनवीर भाई की महफिल बिखरी लेकिन फिर ठीहा खोजने में वक्त नहीं लगा। यह महफिल फिर पास के हबीब होटल में जाकर जम गई। वह हबीब होटल जो आज के पहले इस वक्त तक बंद हो चुका होता था लेकिन आज इस ताजगी के साथ खुला था कि जैसे सुबह सहरी तक का मोर्चा संभालने के लिए तैयार हो। चर्चा का दौर देर रात तक चलता रहा।
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डेढ़ घंटे की तरावीह के बाद जब लोग मस्जिद से निकले तो सबकी जुबां पर रोजे की पहले दिन की चर्चा आम रही। दुआ-सलाम के बाद पास खड़े ठेले से टेक लगाकर तनवीर अहमद बोले- आसान नहीं है इस गर्मी में शिद्दत की प्यास का मुकाबला करना, पर साहब यही तो अल्लाह का इम्तिहान है। इसे तो देना ही होगा। यूं ही रहमत तो नहीं बरसेगी ना? तभी शहाब आलम बोले- अरे अभी तो शुरू हुआ है रोजा। दिन बढ़ने के साथ बढ़ेगा धूप का ताप, तब होगा असली इम्तिहान। लेकिन फिक्र नहीं इसे ही तो रोजा कहते हैं।
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तनवीर और शहाब की बात सुन मोहम्मद शमीम को रहा नहीं गया तो सवालिया अंदाज में बोल पडे़े। अरे भाई! क्यों भूल रहे हो कि इस बार 17 घंटे का रोजा है। कई तो चक्कर खाकर गिर पड़े हैं। अब जब जाड़े के छोटे दिन का रोजा भी तो हमें मिलता है, फिर गर्मी के बडे़े दिन रोजा किसके खाते में आएगा? यह तो अल्लाह का करम और कुदरत का न्याय है। बातचीत का सिलसिला चल ही रहा था कि तभी पास से फैजान मियां तेज कदमों से गुजरते दिखे। तनवीर भाई ने जब उन्हें रोकने की कोशिश की तो बारिश आने की बात कहकर उन्होंने कदम और तेज कर दिए।
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तनवीर को नहीं रहा गया और बोले- अरे ये तो रहमत की बारिश है, इससे क्यों घबराते हो। लेकिन जब बारिश तेज हुई तो तनवीर भाई की महफिल बिखरी लेकिन फिर ठीहा खोजने में वक्त नहीं लगा। यह महफिल फिर पास के हबीब होटल में जाकर जम गई। वह हबीब होटल जो आज के पहले इस वक्त तक बंद हो चुका होता था लेकिन आज इस ताजगी के साथ खुला था कि जैसे सुबह सहरी तक का मोर्चा संभालने के लिए तैयार हो। चर्चा का दौर देर रात तक चलता रहा।